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Chandigarh-Haryana News: 60 प्रतिशत दिव्यांग अधिकारी को सेवामुक्त करने के आदेश पर हाईकोर्ट की रोक
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- दिव्यांगता के आधार पर अधिकारी ने रिलीविंग आदेश को दी थी चुनौती
- निष्कलंक और लंबी सेवा अवधि को याचिका में बनाया गया आधार
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के उस रिलीविंग आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है जिसके तहत 60 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता से पीड़ित एक अधिकारी को सेवा से मुक्त किया गया था। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की अदालत ने स्पष्ट किया कि इस याचिका को समान प्रकृति के अन्य मामले के साथ सुना जाएगा। याचिका दायर करने वाले विशंभर सिंह डेयरी सुपरवाइजर से पदोन्नत होकर डिप्टी जनरल मैनेजर बने थे। उन्होंने अपने रिलीविंग आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि वह 60 प्रतिशत स्थायी लोकोमोटर दिव्यांगता से पीड़ित हैं और विधिवत जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर ‘बेंचमार्क दिव्यांग’ श्रेणी में आते हैं। याचिका में बताया कि उनकी नियुक्ति वर्ष 1998 में हुई थी और उनका सेवा रिकॉर्ड निष्कलंक रहा है। वर्ष 2021 में उन्हें पदोन्नति भी मिली थी। याचिकाकर्ता के वकील विकास चतरथ ने अदालत को बताया कि हरियाणा सरकार ने 31 जनवरी 2006 के निर्देशों के तहत शारीरिक रूप से दिव्यांग कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 58 से बढ़ाकर 60 वर्ष की थी।
इसके अलावा हरियाणा सिविल सेवा (सामान्य) नियम, 2016 के नियम 143 में भी ऐसे कर्मचारियों को अपवाद के रूप में रखा गया था। अदालत को बताया गया कि 3 फरवरी 2026 को नियम 143 में संशोधन कर दिव्यांगता संबंधी अपवाद हटा दिया गया। हालांकि याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह संशोधन भविष्य के लिए लागू होना चाहिए और इससे पहले अर्जित अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि इसी तरह के एक अन्य मामले में हाईकोर्ट पहले ही अंतरिम संरक्षण दे चुका है।
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- निष्कलंक और लंबी सेवा अवधि को याचिका में बनाया गया आधार
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के उस रिलीविंग आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है जिसके तहत 60 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता से पीड़ित एक अधिकारी को सेवा से मुक्त किया गया था। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की अदालत ने स्पष्ट किया कि इस याचिका को समान प्रकृति के अन्य मामले के साथ सुना जाएगा। याचिका दायर करने वाले विशंभर सिंह डेयरी सुपरवाइजर से पदोन्नत होकर डिप्टी जनरल मैनेजर बने थे। उन्होंने अपने रिलीविंग आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि वह 60 प्रतिशत स्थायी लोकोमोटर दिव्यांगता से पीड़ित हैं और विधिवत जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर ‘बेंचमार्क दिव्यांग’ श्रेणी में आते हैं। याचिका में बताया कि उनकी नियुक्ति वर्ष 1998 में हुई थी और उनका सेवा रिकॉर्ड निष्कलंक रहा है। वर्ष 2021 में उन्हें पदोन्नति भी मिली थी। याचिकाकर्ता के वकील विकास चतरथ ने अदालत को बताया कि हरियाणा सरकार ने 31 जनवरी 2006 के निर्देशों के तहत शारीरिक रूप से दिव्यांग कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 58 से बढ़ाकर 60 वर्ष की थी।
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इसके अलावा हरियाणा सिविल सेवा (सामान्य) नियम, 2016 के नियम 143 में भी ऐसे कर्मचारियों को अपवाद के रूप में रखा गया था। अदालत को बताया गया कि 3 फरवरी 2026 को नियम 143 में संशोधन कर दिव्यांगता संबंधी अपवाद हटा दिया गया। हालांकि याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह संशोधन भविष्य के लिए लागू होना चाहिए और इससे पहले अर्जित अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि इसी तरह के एक अन्य मामले में हाईकोर्ट पहले ही अंतरिम संरक्षण दे चुका है।