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Chandigarh-Haryana News: अब इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी भी कर सकेंगे संगठित अपराध की जांच
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने संगठित अपराधों की जांच को लेकर मई 2025 में दिए गए कड़े निर्देशों में अहम संशोधन करते हुए ऐसे मामलों की जांच अनिवार्य रूप से केवल डीएसपी स्तर के अधिकारियों से कराने की बाध्यता समाप्त कर दी है। साथ ही पंजाब और हरियाणा के हर जिले में अलग–अलग विशेष टास्क फोर्स इकाई गठित करने की अनिवार्यता भी हटा दी गई है।
हरियाणा और पंजाब सरकार ने की ओर से दाखिल संशोधन अर्जी दाखिल करते हुए हाईकोर्ट से मई 2025 के निर्देश में बदलाव की मांग की थी। हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि संगठित अपराध के सभी मामलों की जांच डिप्टी सुपरिटेंडेंट आफ पुलिस स्तर के अधिकारी ही करेंगे। हरियाणा के हर जिले में स्पेशल टास्क फोर्स और पंजाब में एंटी गैंगस्टर टास्क फोर्स (एजीटीएफ) की इकाई गठित की जाएगी और इसकी कमान वरिष्ठ अधिकारियों के हाथ में होगी।
सुनवाई के दौरान हरियाणा ने बताया कि अधिकतर निर्देशों का पालन किया जा चुका है लेकिन राज्य में वरिष्ठ अधिकारियों की संख्या सीमित होने के चलते हर संगठित अपराध की जांच डीएसपी स्तर के अधिकारी से कराना व्यावहारिक नहीं है। 2017 से एक समर्पित एसटीएफ पहले से कार्यरत है। दिल्ली से सटे तथा संगठित अपराध से अधिक प्रभावित जिलों में इसकी फील्ड यूनिट तैनात हैं। पंजाब ने भी राज्य में डीएसपी रैंक के अधिकारियों की कमी बताई। सरकार ने कहा, अप्रैल 2025 में गठित एंटी गैंगस्टर टास्क फोर्स (एजीटीएफ) पहले से ही एक वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में राज्य स्तर पर काम कर रही है। हर जिले में अलग–अलग इकाइयां बनाना संसाधनों पर अत्यधिक बोझ डालेगा।
दोनों राज्यों की दलीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने अपने पहले के निर्देशों में संशोधन कर दिया। अब अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि इन मामलों की जांच इंस्पेक्टर रैंक या उससे ऊपर के अधिकारी भी कर सकेंगे लेकिन ऐसी जांच डीएसपी या उससे वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में ही होगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि हर क्षेत्र में संगठित अपराध की समस्या एक जैसी नहीं होती, इसलिए हर जिले में एक जैसा ढांचा बनाना जरूरी नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर की जांच इंस्पेक्टर कर रहा है जांच की गुणवत्ता खराब नहीं मानी जा सकती बशर्ते उस पर वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी बनी रहे।
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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने संगठित अपराधों की जांच को लेकर मई 2025 में दिए गए कड़े निर्देशों में अहम संशोधन करते हुए ऐसे मामलों की जांच अनिवार्य रूप से केवल डीएसपी स्तर के अधिकारियों से कराने की बाध्यता समाप्त कर दी है। साथ ही पंजाब और हरियाणा के हर जिले में अलग–अलग विशेष टास्क फोर्स इकाई गठित करने की अनिवार्यता भी हटा दी गई है।
हरियाणा और पंजाब सरकार ने की ओर से दाखिल संशोधन अर्जी दाखिल करते हुए हाईकोर्ट से मई 2025 के निर्देश में बदलाव की मांग की थी। हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि संगठित अपराध के सभी मामलों की जांच डिप्टी सुपरिटेंडेंट आफ पुलिस स्तर के अधिकारी ही करेंगे। हरियाणा के हर जिले में स्पेशल टास्क फोर्स और पंजाब में एंटी गैंगस्टर टास्क फोर्स (एजीटीएफ) की इकाई गठित की जाएगी और इसकी कमान वरिष्ठ अधिकारियों के हाथ में होगी।
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सुनवाई के दौरान हरियाणा ने बताया कि अधिकतर निर्देशों का पालन किया जा चुका है लेकिन राज्य में वरिष्ठ अधिकारियों की संख्या सीमित होने के चलते हर संगठित अपराध की जांच डीएसपी स्तर के अधिकारी से कराना व्यावहारिक नहीं है। 2017 से एक समर्पित एसटीएफ पहले से कार्यरत है। दिल्ली से सटे तथा संगठित अपराध से अधिक प्रभावित जिलों में इसकी फील्ड यूनिट तैनात हैं। पंजाब ने भी राज्य में डीएसपी रैंक के अधिकारियों की कमी बताई। सरकार ने कहा, अप्रैल 2025 में गठित एंटी गैंगस्टर टास्क फोर्स (एजीटीएफ) पहले से ही एक वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में राज्य स्तर पर काम कर रही है। हर जिले में अलग–अलग इकाइयां बनाना संसाधनों पर अत्यधिक बोझ डालेगा।
दोनों राज्यों की दलीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने अपने पहले के निर्देशों में संशोधन कर दिया। अब अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि इन मामलों की जांच इंस्पेक्टर रैंक या उससे ऊपर के अधिकारी भी कर सकेंगे लेकिन ऐसी जांच डीएसपी या उससे वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में ही होगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि हर क्षेत्र में संगठित अपराध की समस्या एक जैसी नहीं होती, इसलिए हर जिले में एक जैसा ढांचा बनाना जरूरी नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर की जांच इंस्पेक्टर कर रहा है जांच की गुणवत्ता खराब नहीं मानी जा सकती बशर्ते उस पर वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी बनी रहे।