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प्रशासनिक सुविधा के नाम पर कोटा नियमों से नहीं कर सकते छेड़छाड़ : हाईकोर्ट
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- वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित कोटा-रोटा प्रणाली अनिवार्य
- नगर अभियंताओं की पदोन्नति और वरिष्ठता मामला, कई पदोन्नति आदेश और वरिष्ठता सूची रद्द
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित कोटा-रोटा प्रणाली अनिवार्य है और इसे प्रशासनिक सुविधा या आवश्यकता के आधार पर कमजोर या नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने नगर अभियंताओं की पदोन्नति व वरिष्ठता से जुड़े मामलों में कई पदोन्नति आदेशों व वरिष्ठता सूचियों को रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने दो याचिकाएं स्वीकार करते हुए हरियाणा सरकार को निर्देश दिए कि वह हरियाणा म्युनिसिपल सर्विसेज (इंटीग्रेशन, रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस) नियम, 2010 के अनुसार वरिष्ठता का नए सिरे से निर्धारण करे और याचिकाकर्ता प्रत्यक्ष भर्ती अभियंताओं को तीन माह में सभी परिणामी लाभ प्रदान करे। कोर्ट ने कहा कि जब किसी सेवा नियम के तहत भर्ती या पदोन्नति के विभिन्न स्रोतों के बीच कोटा निर्धारित किया जाता है तो वह कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है।
उन्होंने कहा कि एक बार वैधानिक नियमों के अंतर्गत कोटा तय हो जाने के बाद उसे प्रशासन अपनी सुविधा, परिस्थितियों या तात्कालिक जरूरतों के आधार पर बदल नहीं सकता। अदालत ने कहा कि नियमों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए और उनसे किसी भी प्रकार का विचलन स्वीकार्य नहीं है।
मामले में याचिकाकर्ता प्रत्यक्ष भर्ती नगर अभियंता था जिसकी नियुक्ति 20 सितंबर 2012 को हुई थी। इसके बावजूद उसे उन अधिकारियों से नीचे वरिष्ठता में रखा गया जिन्हें बाद में पदोन्नत किया गया था लेकिन उन्हें पिछली तिथि से वरिष्ठ बना दिया गया।
हाईकोर्ट ने पाया कि 2010 के नियमों के तहत नगर अभियंता पदों पर 50:50 का कोटा निर्धारित है। इनमें 50 प्रतिशत पद प्रत्यक्ष भर्ती से और 50 प्रतिशत जूनियर इंजीनियरों में से पदोन्नति से भरे जाने हैं। स्वीकृत 99 पदों में से केवल 49 पद ही पदोन्नति से भरे जा सकते थे। रिकॉर्ड का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि वर्ष 2012 में ही 53 पदोन्नत अभियंता कार्यरत थे यानी कोटा पहले ही पार हो चुका था। इसके बावजूद नौ और अधिकारियों को पिछली तिथि से पदोन्नति देकर यह संख्या 62 तक पहुंचा दी गई जो स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन है।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि कोटा नियमों का उल्लंघन कर्मचारियों की वरिष्ठता और करियर प्रगति को प्रभावित करता है और इससे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और समान अवसर के अधिकार का हनन होता है। हाईकोर्ट ने वर्ष 2018 से 2022 के बीच जारी कई पदोन्नति आदेशों, 2021 की अस्थायी वरिष्ठता सूची, 2023 में याचिकाकर्ता की आपत्ति खारिज करने के आदेश और 23 अक्टूबर 2024 की अंतिम वरिष्ठता सूची को रद्द कर दिया।
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- नगर अभियंताओं की पदोन्नति और वरिष्ठता मामला, कई पदोन्नति आदेश और वरिष्ठता सूची रद्द
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित कोटा-रोटा प्रणाली अनिवार्य है और इसे प्रशासनिक सुविधा या आवश्यकता के आधार पर कमजोर या नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने नगर अभियंताओं की पदोन्नति व वरिष्ठता से जुड़े मामलों में कई पदोन्नति आदेशों व वरिष्ठता सूचियों को रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने दो याचिकाएं स्वीकार करते हुए हरियाणा सरकार को निर्देश दिए कि वह हरियाणा म्युनिसिपल सर्विसेज (इंटीग्रेशन, रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस) नियम, 2010 के अनुसार वरिष्ठता का नए सिरे से निर्धारण करे और याचिकाकर्ता प्रत्यक्ष भर्ती अभियंताओं को तीन माह में सभी परिणामी लाभ प्रदान करे। कोर्ट ने कहा कि जब किसी सेवा नियम के तहत भर्ती या पदोन्नति के विभिन्न स्रोतों के बीच कोटा निर्धारित किया जाता है तो वह कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है।
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उन्होंने कहा कि एक बार वैधानिक नियमों के अंतर्गत कोटा तय हो जाने के बाद उसे प्रशासन अपनी सुविधा, परिस्थितियों या तात्कालिक जरूरतों के आधार पर बदल नहीं सकता। अदालत ने कहा कि नियमों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए और उनसे किसी भी प्रकार का विचलन स्वीकार्य नहीं है।
मामले में याचिकाकर्ता प्रत्यक्ष भर्ती नगर अभियंता था जिसकी नियुक्ति 20 सितंबर 2012 को हुई थी। इसके बावजूद उसे उन अधिकारियों से नीचे वरिष्ठता में रखा गया जिन्हें बाद में पदोन्नत किया गया था लेकिन उन्हें पिछली तिथि से वरिष्ठ बना दिया गया।
हाईकोर्ट ने पाया कि 2010 के नियमों के तहत नगर अभियंता पदों पर 50:50 का कोटा निर्धारित है। इनमें 50 प्रतिशत पद प्रत्यक्ष भर्ती से और 50 प्रतिशत जूनियर इंजीनियरों में से पदोन्नति से भरे जाने हैं। स्वीकृत 99 पदों में से केवल 49 पद ही पदोन्नति से भरे जा सकते थे। रिकॉर्ड का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि वर्ष 2012 में ही 53 पदोन्नत अभियंता कार्यरत थे यानी कोटा पहले ही पार हो चुका था। इसके बावजूद नौ और अधिकारियों को पिछली तिथि से पदोन्नति देकर यह संख्या 62 तक पहुंचा दी गई जो स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन है।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि कोटा नियमों का उल्लंघन कर्मचारियों की वरिष्ठता और करियर प्रगति को प्रभावित करता है और इससे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और समान अवसर के अधिकार का हनन होता है। हाईकोर्ट ने वर्ष 2018 से 2022 के बीच जारी कई पदोन्नति आदेशों, 2021 की अस्थायी वरिष्ठता सूची, 2023 में याचिकाकर्ता की आपत्ति खारिज करने के आदेश और 23 अक्टूबर 2024 की अंतिम वरिष्ठता सूची को रद्द कर दिया।
