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राज्य आदर्श नियोक्ता, कर्मचारियों को वर्षों तक अस्थायी रखकर शोषण नहीं कर सकता : हाईकोर्ट

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अपने कर्मचारियों को लाभ देने में भेदभाव संविधान की भावना के विपरीत
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हाईकोर्ट ने चतुर्थ श्रेणी के याचिकाकर्ताओं को नियमित करने का दिया आदेश
चंडीगढ़। दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के अधिकारों पर हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य एक आदर्श नियोक्ता है और वह अपने कर्मचारियों को वर्षों तक अस्थायी बनाए रखकर उनका शोषण नहीं कर सकता। जस्टिस संदीप मोदगिल ने फूलवती व अन्य 18 याचिकाओं के समूह का निपटारा करते हुए उन्हें नियमित करने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने एक अक्तूबर 2024 को पारित आदेश को रद्द कर दिया है। इस आदेश में याचिकाकर्ताओं के नियमितीकरण के दावे खारिज कर दिए गए थे। कोर्ट के समक्ष यह तथ्य आया कि फूलवती को 1988 में हरियाणा के वन विभाग में माली के रूप में दैनिक वेतन पर नौकरी मिली थी। बिना किसी औपचारिक नियुक्ति पत्र के वह 31 वर्ष से अधिक समय तक विभाग के मस्टर रोल पर काम करती रहीं और उनकी सेवा कभी असंतोषजनक नहीं पाई गई। इसके बावजूद उन्हें नियमित नहीं किया गया जबकि उनसे कनिष्ठ कर्मचारियों को यह लाभ दे दिया गया।
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कोर्ट ने यह भी पाया कि याची की सेवाएं मौखिक रूप से समाप्त कर दी गई थीं जिसे लेबर कोर्ट ने अवैध ठहराते हुए बहाली और सेवा निरंतरता का आदेश दिया था। इस आदेश को बाद में हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। इसके बावजूद विभाग ने नियमितीकरण से इन्कार कर दिया।

अदालत ने कहा कि सेवा निरंतरता कोई प्रतीकात्मक राहत नहीं बल्कि कर्मचारी की कानूनी स्थिति की पूर्ण बहाली होती है और एक बार न्यायिक रूप से निरंतरता घोषित होने के बाद प्रशासनिक बहानों से उसे कमजोर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि फूलवती 31 जनवरी 1996 को सेवा में थीं और उस तिथि तक आवश्यक अवधि की सेवा भी पूरी कर चुकी थीं इसलिए वह नियमितीकरण की पूरी तरह पात्र थीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब एक ही विभाग में समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को नियमित किया गया है तो फूलवती को इससे वंचित रखना घोर भेदभाव है।
समानता का सिद्धांत यह मांग करता है कि समान स्थिति वालों के साथ समान व्यवहार हो। चुनिंदा कर्मचारियों को लाभ देकर बाकी को दशकों तक अस्थायी बनाए रखना संविधान की भावना के विपरीत है। अंतत हाईकोर्ट ने याचिकाएं स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि फूलवती को 1996 की नीति के तहत पात्रता तिथि से नियमित माना जाए वेतन का निर्धारण कर सभी बकाया अदा किए जाएं सेवानिवृत्ति लाभ जारी किए जाएं और सभी बकाया पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दिया जाए। अदालत ने चार सप्ताह के भीतर आदेश के अनुपालन के निर्देश भी दिए और स्पष्ट किया कि यह फैसला समान तथ्यों वाले सभी जुड़े मामलों पर लागू होगा।
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