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Punjab: हजूर साहिब में प्रशासन के बढ़ते हस्तक्षेप से तख्त नाराज, महाराष्ट्र में नए कानून की तैयारी पर विवाद
संवाद न्यूज एजेंसी, अमृतसर (पंजाब)
Published by: Nivedita
Updated Thu, 25 Jun 2026 08:29 AM IST
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सार
सिख संगठनों का कहना है कि सिखों के सर्वोच्च तख्तों में से एक के प्रबंधन से जुड़ा कोई भी फैसला बिना व्यापक परामर्श और समुदाय की सहमति के नहीं लिया जा सकता। उनका आरोप है कि सरकार की ओर से लगातार बढ़ते प्रशासनिक हस्तक्षेप से धार्मिक स्वायत्तता प्रभावित हो रही है।
हरजिंदर धामी।
- फोटो : संवाद
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विस्तार
हजूर साहिब में प्रशासन के बढ़ते हस्तक्षेप से तख्त नाराज है। इसी बीच महाराष्ट्र सरकार द्वारा तख्त श्री हजूर साहिब बोर्ड एक्ट-1956 को समाप्त कर नया तख्त श्री हजूर साहिब बिल-2026 लाने की तैयारी ने विवाद को और गहरा दिया है। प्रस्तावित विधेयक को विधानसभा सत्र में पेश किए जाने की चर्चाओं के बीच शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी), तख्त के पांच प्यारों और कई सिख संगठनों ने इसका कड़ा विरोध जताया है।
सिख संगठनों का कहना है कि सिखों के सर्वोच्च तख्तों में से एक के प्रबंधन से जुड़ा कोई भी फैसला बिना व्यापक परामर्श और समुदाय की सहमति के नहीं लिया जा सकता। उनका आरोप है कि सरकार की ओर से लगातार बढ़ते प्रशासनिक हस्तक्षेप से धार्मिक स्वायत्तता प्रभावित हो रही है।
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एसजीपीसी प्रधान हरजिंदर सिंह धामी और दमदमी टकसाल के प्रमुख सेवादार भाई राम सिंह सहित कई पंथक संगठनों ने भी इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए सरकार से पुनर्विचार की मांग की है।
क्या है 1956 का बोर्ड एक्ट
तख्त श्री हजूर साहिब बोर्ड एक्ट-1956 के तहत नांदेड़ स्थित तख्त के प्रशासन, धार्मिक गतिविधियों, संपत्तियों और वित्तीय प्रबंधन के लिए वैधानिक बोर्ड की व्यवस्था की गई थी। इसी के आधार पर बोर्ड की संरचना और अधिकार तय हैं।
संभावित बदलावों पर आशंका
पंथक विशेषज्ञों के अनुसार नए कानून में बोर्ड की संरचना, सदस्य संख्या, नियुक्ति प्रक्रिया, वित्तीय प्रबंधन, ऑडिट व्यवस्था, प्रशासनिक भूमिका और धार्मिक अधिकारों के विभाजन जैसे बदलाव संभव हैं। हालांकि इसकी पुष्टि ड्राफ्ट सामने आने के बाद ही होगी।
सिख संगठनों की प्रमुख आपत्तियां
सिख संगठनों का कहना है कि बिना परामर्श कानून लाना धार्मिक स्वायत्तता के खिलाफ है। उनका आरोप है कि इससे सरकार का नियंत्रण बढ़ सकता है और तख्त की स्वतंत्र व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
विवाद की वजह और आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि ड्राफ्ट सार्वजनिक न किए जाने और परामर्श प्रक्रिया की कमी के कारण विवाद बढ़ा है। यदि बिना सहमति नया कानून लागू हुआ तो पंथक संस्थाओं और सरकार के बीच टकराव बढ़ सकता है और यह मुद्दा कानूनी चुनौती तक पहुंच सकता है।
फिलहाल सभी की नजरें महाराष्ट्र सरकार पर हैं कि वह कब तक विधेयक का मसौदा सार्वजनिक करती है और क्या सिख संगठनों से औपचारिक राय ली जाती है।