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Charkhi Dadri News: घर-दुकान में रखने होंगे चार डस्टबिन, कचरा अलग नहीं किया तो गाड़ी नहीं उठाएंगी कूड़ा, लग सकता है जुर्माना
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
Updated Thu, 18 Jun 2026 11:50 PM IST
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शहर में महिलाओं को कचरा प्रबंधन के प्रति जागरूक करती हुई नप की टीम।
- फोटो : 1
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चरखी दादरी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर जिले में नया ठोस कचरा प्रबंधन नियम 1 अप्रैल से (एसडब्ल्यूएम-2026) पूरी तरह लागू कर दिया गया है। इसके तहत अब हर नागरिक और दुकानदार को कचरा अलग-अलग (सोर्स सेग्रिगेशन) करके ही देना होगा। ऐसा न करने पर नगर परिषद की गाडि़यां कचरा उठाने से मना कर देंगी और नियम तोड़ने वालों पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। नए नियमों के अनुसार अब घरों और दुकानों में दो की जगह चार डस्टबिन रखने होंगे।
स्पेशल मॉनिटरिंग सेल का गठन
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद नियमों का सख्ती से पालन करवाने के लिए उपायुक्त मनदीप कौर की अध्यक्षता में एक स्पेशल मॉनिटरिंग सेल का गठन किया गया है। यह सेल हर 15 दिन में जिले की सफाई व्यवस्था की प्रोग्रेस रिपोर्ट तैयार कर सरकार को भेजेगी। नियमों के अनुसार व्यावसायिक संस्थानों को सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) के पोर्टल पर पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। कचरा कलेक्शन से प्रोसेसिंग तक की पूरी जानकारी ऑनलाइन पोर्टल पर लाइव अपलोड करनी होगी ताकि आंकड़ों में हेरफेर न हो सके। सीधे तौर पर अधिकारियों की जवाबदेही तय करेंगे।
अलग-अलग रंगों के चार डस्टबिन
1. गीला कचरा (हरा डिब्बा) : रसोई का बचा हुआ खाना, चाय की पत्ती, सब्जी और फलों के छिलके।
2. सूखा कचरा (नीला डिब्बा): प्लास्टिक की थैलियां, गत्ता, रद्दी कागज और कांच की बोतलें।
3. सेनेटरी वेस्ट (लाल डिब्बा): बच्चों के डायपर और सेनेटरी पैड। इन्हें पॉलीथिन में अलग से लपेटकर देना होगा।
4. खतरनाक कचरा (काला डिब्बा) : खराब बिजली उपकरण, बैटरियां और एक्सपायर्ड दवाइयां।
बड़े प्रतिष्ठानों को खुद करना हो प्रबंध
बड़े संस्थानों के लिए तय नियमों के अनुसार प्रोसेसिंग प्लांट 20 हजार वर्ग मीटर या उससे अधिक के फ्लोर एरिया, या प्रतिदिन 40 हजार लीटर से अधिक पानी की खपत या 100 किलोग्राम से ज्यादा कचरा उत्पन्न करने वाली संस्थाओं को थोक कचरा उत्पादक माना गया हैं। इन्हें विस्तारित थोक कचरा उत्पादक जिम्मेदारी के तहत अपने कचरे के लिए स्वयं जवाबदेह बनाया गया है।
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कचरा प्रोसेसिंग प्लांट लगाना अनिवार्य
5 एकड़ से बड़े संस्थानों को अपने परिसर में कचरा प्रोसेसिंग प्लांट लगाना अनिवार्य है। इन्हें अपने स्तर पर ही गीला और सूखा कचरा अलग करना होगा। नए नियमों में बल्क वेस्ट जनरेटर (बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करने वाले संस्थान) का दायरा भी तय कर दिया गया है। जिले के ऐसे सभी संस्थान इसके दायरे में आएंगे।
हर 3 माह में दें रिपोर्ट
नए नियम केवल जनता के लिए ही नहीं बल्कि संबंधित विभागों की जवाबदेही तय करने के लिए भी बनाए गए हैं। उपायुक्त हर तीन महीने में नगर परिषद के कामकाज की समीक्षा करेंगे। समीक्षा के दौरान किसी भी प्रकार की लापरवाही मिलने पर सीधे कार्रवाई की जा सकेगी। शहरों में मुख्य डंपिंग प्वाइंट पर वर्षों से जमा लाखों टन पुराने कचरे के ढेर को खत्म करने के लिए बायोमाइनिंग और बायोरेमेडिएशन को अनिवार्य किया गया है। उपायुक्त स्वयं डंप साइट और कचरा प्रोसेसिंग प्लांटों की प्रगति की निगरानी करेंगे।
खुद का लगाए प्लांट
कोई भी मॉल, यूनिवर्सिटी, बड़ा अपार्टमेंट, सरकारी दफ्तर या होटल जो करीब 5 एकड़ या उससे अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। वह इस श्रेणी में शामिल होगा। जो संस्थान रोजाना 40 हजार लीटर से अधिक पानी का उपयोग करते हैं और जहां 100 किलो से ज्यादा कचरा निकलता है वे श्रेणी में है। ऐसे बड़े संस्थानों को अपना गीला कचरा खुद ही प्रोसेस करना होगा। वे नप के भरोसे कचरा नहीं छोड़ सकते। उन्हें अपने परिसर में खाद बनाने का प्लांट या बायोगैस प्लांट लगाना होगा।
स्पेशल मॉनिटरिंग सेल का गठन
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद नियमों का सख्ती से पालन करवाने के लिए उपायुक्त मनदीप कौर की अध्यक्षता में एक स्पेशल मॉनिटरिंग सेल का गठन किया गया है। यह सेल हर 15 दिन में जिले की सफाई व्यवस्था की प्रोग्रेस रिपोर्ट तैयार कर सरकार को भेजेगी। नियमों के अनुसार व्यावसायिक संस्थानों को सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) के पोर्टल पर पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। कचरा कलेक्शन से प्रोसेसिंग तक की पूरी जानकारी ऑनलाइन पोर्टल पर लाइव अपलोड करनी होगी ताकि आंकड़ों में हेरफेर न हो सके। सीधे तौर पर अधिकारियों की जवाबदेही तय करेंगे।
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अलग-अलग रंगों के चार डस्टबिन
1. गीला कचरा (हरा डिब्बा) : रसोई का बचा हुआ खाना, चाय की पत्ती, सब्जी और फलों के छिलके।
2. सूखा कचरा (नीला डिब्बा): प्लास्टिक की थैलियां, गत्ता, रद्दी कागज और कांच की बोतलें।
3. सेनेटरी वेस्ट (लाल डिब्बा): बच्चों के डायपर और सेनेटरी पैड। इन्हें पॉलीथिन में अलग से लपेटकर देना होगा।
4. खतरनाक कचरा (काला डिब्बा) : खराब बिजली उपकरण, बैटरियां और एक्सपायर्ड दवाइयां।
बड़े प्रतिष्ठानों को खुद करना हो प्रबंध
बड़े संस्थानों के लिए तय नियमों के अनुसार प्रोसेसिंग प्लांट 20 हजार वर्ग मीटर या उससे अधिक के फ्लोर एरिया, या प्रतिदिन 40 हजार लीटर से अधिक पानी की खपत या 100 किलोग्राम से ज्यादा कचरा उत्पन्न करने वाली संस्थाओं को थोक कचरा उत्पादक माना गया हैं। इन्हें विस्तारित थोक कचरा उत्पादक जिम्मेदारी के तहत अपने कचरे के लिए स्वयं जवाबदेह बनाया गया है।
कचरा प्रोसेसिंग प्लांट लगाना अनिवार्य
5 एकड़ से बड़े संस्थानों को अपने परिसर में कचरा प्रोसेसिंग प्लांट लगाना अनिवार्य है। इन्हें अपने स्तर पर ही गीला और सूखा कचरा अलग करना होगा। नए नियमों में बल्क वेस्ट जनरेटर (बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करने वाले संस्थान) का दायरा भी तय कर दिया गया है। जिले के ऐसे सभी संस्थान इसके दायरे में आएंगे।
हर 3 माह में दें रिपोर्ट
नए नियम केवल जनता के लिए ही नहीं बल्कि संबंधित विभागों की जवाबदेही तय करने के लिए भी बनाए गए हैं। उपायुक्त हर तीन महीने में नगर परिषद के कामकाज की समीक्षा करेंगे। समीक्षा के दौरान किसी भी प्रकार की लापरवाही मिलने पर सीधे कार्रवाई की जा सकेगी। शहरों में मुख्य डंपिंग प्वाइंट पर वर्षों से जमा लाखों टन पुराने कचरे के ढेर को खत्म करने के लिए बायोमाइनिंग और बायोरेमेडिएशन को अनिवार्य किया गया है। उपायुक्त स्वयं डंप साइट और कचरा प्रोसेसिंग प्लांटों की प्रगति की निगरानी करेंगे।
खुद का लगाए प्लांट
कोई भी मॉल, यूनिवर्सिटी, बड़ा अपार्टमेंट, सरकारी दफ्तर या होटल जो करीब 5 एकड़ या उससे अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। वह इस श्रेणी में शामिल होगा। जो संस्थान रोजाना 40 हजार लीटर से अधिक पानी का उपयोग करते हैं और जहां 100 किलो से ज्यादा कचरा निकलता है वे श्रेणी में है। ऐसे बड़े संस्थानों को अपना गीला कचरा खुद ही प्रोसेस करना होगा। वे नप के भरोसे कचरा नहीं छोड़ सकते। उन्हें अपने परिसर में खाद बनाने का प्लांट या बायोगैस प्लांट लगाना होगा।