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Fatehabad News: आठ लाख कक्ष पर खर्चे फिर भी ठंडे बस्ते में ब्लड कंपोनेट सेपरेटर प्रोजेक्ट, नियमों में उलझा
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
Updated Mon, 16 Feb 2026 01:00 AM IST
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फतेहाबाद के नागरिक अस्पताल में बना ब्लड बैंक।
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फतेहाबाद। जिला नागरिक अस्पताल के ब्लड बैंक में कंपोनेंट सेपरेटर प्रोजेक्ट आठ साल से प्रक्रिया में ही उलझा हुआ है। लोक निर्माण विभाग प्रोजेक्ट के लिए कक्ष तैयार चुका है लेकिन स्वास्थ्य विभाग प्रोजेक्ट को सिरे नहीं चढ़ा पाया है। सीनियर ड्रग कंट्रोलर की टीम पिछले दिनों निरीक्षण कर चुकी है लेकिन यहां पर खामियां पाई गई हैं। कमियों को दूर करने के बाद टीम दोबारा निरीक्षण करेगी। इसके बाद लाइसेंस जारी होने की उम्मीद है। फिलहाल हालात ये है कि ब्लड कंपोनेट सेपरेटर प्रोजेक्ट सिरे न चढ़ने से मरीजों को प्लेटलेट्स के लिए दूसरे जिले में जाना पड़ रहा है।
वर्ष 2018 में इसको लेकर प्रक्रिया शुरू हुई थी और मशीनें भी भेजी गईं लेकिन जगह न होने का हवाला देकर मशीनें अग्रोहा मेडिकल भेज दी गई थीं। डेंगू मरीजों को प्लेटलेट्स की जरूरत रहती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर प्लेटलेट्स कई मरीजों में कम हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।
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हॉल की डिमांड पूरी, लाइसेंस का इंतजार
कंपोनेंट सेपरेटर मशीन कोरोना महामारी शुरू होने से पहले वर्ष 2018 में ही जारी कर दी थी लेकिन भवन न होने के चलते मशीन पड़ी रही। इन मशीनों को कोरोना महामारी के दौरान अग्रोहा मेडिकल में भेज दी थी। इसके बाद कुछ मशीनें दोबारा भेजी गई। ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर प्रोजेक्ट को लेकर वर्ष 2021 में डीजी कार्यालय के अधिकारियों ने स्टेटस देखने के लिए निरीक्षण किया था। यहां डिब्बे में बंद मशीनें देखकर फटकार लगाई थी और इनके लिए जल्द हॉल बनाने के लिए एस्टीमेट भेजने के निर्देश दिए थे। वर्ष 2023 में एस्टीमेट बना और डिमांड की गई। फरवरी 2024 में हॉल का निर्माण शुरू हुआ था, जो कि बनकर तैयार भी हो चुका है।
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एक यूनिट रक्त से चार मरीजों को मिलता है फायदा
ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन अगर लगती है तो एक यूनिट रक्त से चार मरीजों को फायदा हो सकता है। थैलेसीमिया में ऐसे मरीजों को लाल रक्त कणिकाओं (आरबीसी) की जरूरत होती है। ब्लड से आरबीसी अलग करके थैलेसीमिया के मरीजों को चढ़ाना आसान होगा। डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स चढ़ाए जाते हैं। इस मशीन से खून से प्लेटलेट्स अलग किए जा सकते हैं। बर्न केस के मरीजों को बचाने के लिए प्लाजमा की जरूरत होती है। एड्स के मरीजों को श्वेत रक्त कणिकाओं (डब्ल्यूबीसी) की जरूरत होती है।
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ब्लड कंपोनेट सेपरेटर प्रोजेक्ट को लेकर टीम ने पिछले दिनों निरीक्षण किया है। टीम ने कुछ कमियां बताई है उन्हें दूर किया जाएगा। उम्मीद है जल्द शुरू हो सकता है।
-डॉ.बुधराम, सिविल सर्जन
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वर्ष 2018 में इसको लेकर प्रक्रिया शुरू हुई थी और मशीनें भी भेजी गईं लेकिन जगह न होने का हवाला देकर मशीनें अग्रोहा मेडिकल भेज दी गई थीं। डेंगू मरीजों को प्लेटलेट्स की जरूरत रहती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर प्लेटलेट्स कई मरीजों में कम हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।
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हॉल की डिमांड पूरी, लाइसेंस का इंतजार
कंपोनेंट सेपरेटर मशीन कोरोना महामारी शुरू होने से पहले वर्ष 2018 में ही जारी कर दी थी लेकिन भवन न होने के चलते मशीन पड़ी रही। इन मशीनों को कोरोना महामारी के दौरान अग्रोहा मेडिकल में भेज दी थी। इसके बाद कुछ मशीनें दोबारा भेजी गई। ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर प्रोजेक्ट को लेकर वर्ष 2021 में डीजी कार्यालय के अधिकारियों ने स्टेटस देखने के लिए निरीक्षण किया था। यहां डिब्बे में बंद मशीनें देखकर फटकार लगाई थी और इनके लिए जल्द हॉल बनाने के लिए एस्टीमेट भेजने के निर्देश दिए थे। वर्ष 2023 में एस्टीमेट बना और डिमांड की गई। फरवरी 2024 में हॉल का निर्माण शुरू हुआ था, जो कि बनकर तैयार भी हो चुका है।
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एक यूनिट रक्त से चार मरीजों को मिलता है फायदा
ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन अगर लगती है तो एक यूनिट रक्त से चार मरीजों को फायदा हो सकता है। थैलेसीमिया में ऐसे मरीजों को लाल रक्त कणिकाओं (आरबीसी) की जरूरत होती है। ब्लड से आरबीसी अलग करके थैलेसीमिया के मरीजों को चढ़ाना आसान होगा। डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स चढ़ाए जाते हैं। इस मशीन से खून से प्लेटलेट्स अलग किए जा सकते हैं। बर्न केस के मरीजों को बचाने के लिए प्लाजमा की जरूरत होती है। एड्स के मरीजों को श्वेत रक्त कणिकाओं (डब्ल्यूबीसी) की जरूरत होती है।
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ब्लड कंपोनेट सेपरेटर प्रोजेक्ट को लेकर टीम ने पिछले दिनों निरीक्षण किया है। टीम ने कुछ कमियां बताई है उन्हें दूर किया जाएगा। उम्मीद है जल्द शुरू हो सकता है।
-डॉ.बुधराम, सिविल सर्जन