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राखीगढ़ी का हाल: पाॅलिथीन की पनाह में ऐतिहासिक धरोहर, लाइसेंस खत्म होने के बाद 13 जनवरी से बंद है खोदाई

Mon, 10 Feb 2025 01:48 PM IST
निवेदिता वर्मा गुरदीप सिंह/श्याम ओझा, हिसार
गुरदीप सिंह/श्याम ओझा, हिसार Published by: निवेदिता वर्मा Updated Mon, 10 Feb 2025 01:48 PM IST
सार

हिसार से करीब 65 किलोमीटर दूर बसा छोटा सा कस्बा राखीगढ़ी क्या जानता था, उसकी जड़ों में 5,000 साल पुरानी सभ्यता दफन है। हड़प्पा काल के पुरावशेष मिले तो एकाएक राखीगढ़ी वैश्विक पटल पर छा गया।

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Rakhigarhi Historical heritage under shelter of polythene hisar
राखीगढ़ी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राखीगढ़ी के जर्रे-जर्रे में बिखरे अवशेष अतीत की गौरव गाथा बयां करते हैं। खोदाई में मिले मिट्टी के बर्तन, पक्के निर्माण, सड़कें, कुआं, स्टेडियम व नदी के प्रमाण देख विकसित और व्यवस्थित शहर की तस्वीर आंखों में तैर जाती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस धरोहर को सहेजने के लिए हर मुमकिन प्रयास कर रहा है। हालांकि, पाॅलिथीन से अवशेष सुरक्षित रखना भी बड़ी चुनाैती है। पढ़ें विशेष रिपोर्ट...

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उपेक्षा की शिकार है साइट

पांच हजार साल पुरानी हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़ी पुरातात्विक साइट पहली नजर में आपको मिट्टी के टीले सी ही नजर आएगी। करीब जाने पर इसकी ऐतिहासिकता का अहसास होगा। मानव कंकाल, मटके, मर्तबान, ईंटें, चूड़ियां, गले में पहने जाने वाले मणके आदि को देखकर आप समझ सकते हैं कि धरती से निकला विरासत का यह खजाना कभी समृद्ध नगरी के रूप में गुलजार रहा होगा।  साइट आरजीआर-1 से 7 के बीच मिली यह धरोहर संरक्षित तो है मगर उपेक्षा की भी शिकार है। उत्खनन में मिले पुरावशेष यत्र-तत्र बिखरे हैं। जिन साइट पर खोदाई चल रही है, वहां संरक्षण की कोई आधुनिक तकनीक नहीं है। इसके अभाव में माटी से मिले हड़प्पन सभ्यता के प्रमाण मिट्टी हो रहे हैं। 



राखीगढ़ी में अब तक सात साइटों पर हड़प्पन सभ्यता के प्रमाण मिल चुके हैं, जिन्हें राखीगढ़ी (आरजीआर) -1 से 7 का नाम दिया है। हालांकि, दावा 11 साइट की खोज का है। साइट -1 और 3 पर खोदाई चल रही थी, जो वर्तमान में लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं होने से बंद है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग के चंडीगढ़ सर्कल ने 13 जनवरी से काम रोक दिया है। एएसआई के अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. संजय मंजुल शीघ्र ही खोदाई शुरू होने का दावा कर रहे हैं।  
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अब तक क्या-क्या प्रमाण मिल चुके

आरजीआर-5 का उत्खनन बताता है कि इस क्षेत्र में कभी सर्वाधिक घनी आबादी थी। इस समय भी इस साइट पर आबादी बसी है। इसलिए यहां ज्यादा खोदाई संभव नहीं है, लेकिन आरजीआर-4 के कुछ भागों में खोदाई हो सकती है। इसके कुछ हिस्से पर मकान भी बने हैं। आरजीआर-1, 2 और 3 के नीचे बड़ी आबादी के प्रमाण मिल चुके हैं। आरजीआर-7 में मानव कंकाल मिला, जिसे साइट-1 पर बनाए एक अस्थायी कमरे में रखा गया है। आरजीआर-7 के पास नदी होने के प्रमाण मिले हैं। माना जाता है कि यह नदी करीब पांच हजार वर्ष पहले सूख गई थी। उत्खनन में ईंटों से बनी सीवेज लाइन, मिट्टी की मूर्तियां, पीतल की कलाकृतियां, पीतल और सुइयों से बने मछली हुक, कब्रिस्तान, टेराकोटा चूड़ियां, शंख, आभूषण (जिनमें से कुछ 5,000 साल से अधिक पुराने हैं) मिल चुके हैं। दुर्ग-प्राचीर, अन्नागार, सड़कें, जल निकासी व्यवस्था, स्तम्भ युक्त वीथिका या मंडप, ऊंचे चबूतरे पर बनाई गईं अग्नि वेदिकाएं, खेल स्टेडियम इस नगर के समृद्ध और विकसित होने का संकेत देते हैं।

जानिए अब कहां क्या है स्थिति

साइट-1
फिलहाल यहां खोदाई का काम बंद है। टीले पर खोदाई स्थल को पॉलिथीन से ढक दिया गया है। पास ही इससे पहले की गई खोदाई के स्थल को भी पॉलिथीन से ढका गया था। यह जगह मिट्टी से अट चुकी। इस जगह पॉलिथीन के कुछ अवशेष ही नजर आते हैं। इसी साइट पर श्मशान गृह बना है, जहां गांव के लोग अब भी अंतिम संस्कार करने आ रहे हैं। बावजूद इसके कि पंचायत ने श्मशानघाट के लिए अलग जगह भी दे रखी है। इसी साइट पर बनाए एक अस्थायी कमरे में पुरावशेष रखे हैं। इनमें मिट्टी के घड़े, बर्तन, चूड़ियां, आभूषण, सजावटी सामान, मानव कंकाल, पत्थर आदि हैं। अधिकतर सामग्री बिखरी है, तो कुछ कट्टों में भरकर रखी गई हैं। कुछे को शीशे के शोकेस में सजा भी रखा है।



साइट-2
अतिक्रमण की भरमार है। लोगों ने पशु बांध रखे हैं। महिलाएं उपले थाप रही हैं। एएसआई की ओर से की गई चहारदीवारी की रेलिंग पर कपड़े सूख रहे हैं। आसपास गंदगी के ढेर हैं। हालांकि, जितनी जगह में यहां खोदाई की गई है, उसे शेड से ढका गया है। निगरानी में एक पुलिसकर्मी भी तैनात है।

साइट-3
खोदाई में मिले पक्के निर्माण, गलियां, कुआं, चूल्हे, सीढ़ियां आदि साफ नजर आते हैं। इसे भी शेड से कवर किया गया है। यहां एक साथ बने तीन चूल्हों के पास मानव कंकाल के अवशेष दफन हैं। इससे कुछ ही दूरी पर एक दीवार से सटी सीढि़यां दिखती हैं। इस साइट पर एक मजार भी बनी है, जिस पर लोग मन्नत मांगने आते हैं। अतिक्रमण यहां भी है।

साइट-4
यहां खोदाई हुए लंबा समय बीत चुका है। अब पूरी साइट पर अतिक्रमण हो चुका है। जब तक यहां से लोगों को विस्थापित नहीं किया जाएगा, आगे खोदाई संभव भी नहीं है। इस टीले पर अलग-अलग पुरातन सभ्यता के प्रमाण मिल चुके हैं। इसके एक तरफ राखीगढ़ी तो दूसरी तरफ राखी शाहपुर गांव है। बारिश में मिट्टी दरक रही है। यह कभी भी ढह सकती है। इसके कारण आसपास बने मकानों को भी खतरा है।
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क्या कहते हैं पुरातत्वविद

साइट 4 पर उत्खनन कर चुके डेक्कन कॉलेज, पुणे के सेवानिवृत्त खोदाई व पुरातत्व विशेषज्ञ प्रोफेसर वसंत शिंदे बताते हैं कि राखीगढी में खोदाई के आधार पर माना जा सकता है कि लगभग 5,500 हेक्टेअर में फैला यह क्षेत्र ईसा से लगभग 3,300 वर्ष पूर्व मौजूद था। पहली बार यहां 1963 में खोदाई हुई थी। मेरी टीम ने यहां पाया कि राखीगढ़ी लगभग साढ़े तीन किलोमीटर की परिधि में फैला नगर था। साइट चार पर अलग-अलग सभ्यताओं के प्रमाण मिले हैं। सरकार व एएसआई गंभीरता से काम करें तो यह आइकॉनिक साइट पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकती है।

उत्खनन के दौरान निकले पुरावशेषों को नुकसान न हो इसके लिए साइट -2 और 3 पर शेड लगाए गए हैं। अभी साइट-1 पर खोदाई स्थल को पॉलिथीन से ढका है ताकि बारिश के पानी से बचाया जा सके। यहां शेड लगाने का काम किया जाएगा। अन्य साइटों से कब्जे हट जाएं तो पुरासभ्यता के अनेक महत्वपूर्ण प्रमाण मिल सकते हैं। - डॉ. संजय मंजुल अतिरिक्त महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग

राखीगढ़ी की सभी साइटों पर पुरासभ्यता के प्रमाण बिखरे हैं। इन धरोहरों को संरक्षण की दरकार है। उत्खनन के दौरान निकली सामग्री व खोदाई स्थलों को उचित वैज्ञानिक विधि से संरक्षित किया जाना चाहिए ताकि देश की अमूल्य धरोहर को बचा सकें। यहां भ्रमण के लिए आने वाले कई विदेशी प्रोफेसर कहते हैं कि यूरोप में ऐतिहासिक धरोहरों की साइटों को बेहतर तरीके से संरक्षित किया जाता है। इनकी समृद्धता के बारे में लोगों को बताया जाता है। राखीगढ़ी साइट तो उनसे भी कहीं पुरानी है। इसका संरक्षण आधुनिक तकनीक से किया जाना चाहिए। वे टर्की और चीन के म्यूजियम का उदाहरण भी देते हैं। उनका यह भी कहना है कि खोदाई का काम भी यहां बहुत धीमा है। - दिनेश श्योराण, जिला पार्षद व पूर्व सरपंच राखीगढ़ी
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