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इतिहास: हड़प्पा काल की तकनीक से मेल खाती है हमारी तकनीक, जल निकासी के लिए मिले पक्की नालियों के प्रमाण

जय कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, नारनौंद, हिसार (हरियाणा) Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Mon, 09 May 2022 02:48 AM IST
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सार

8000 साल पहले भी राखी गढ़ी को सुनियोजित तरीके से बसाया गया था। जल निकासी के लिए पक्की नालियों के प्रमाण मिले। साइट नंबर तीन पर एक 18 फुट की दीवार मिली है। 

The technology of Harappan period corresponds to current technology
खोदाई में पक्की दीवार के साथ निकली मिली पक्की नाली। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार

हड़प्पा कालीन सभ्यता के समय में भी सिविल इंजीनियरिंग के जो तथ्य सामने आए हैं, उनको देखकर हर कोई आश्चर्यचकित है। हरियाणा के हिसार के राखीगढ़ी के विस्तार के सुबूत सामने आने से इतिहास को जानने व समझने वाले लोग हतप्रभ है। करीब 8000 वर्ष पहले भी ऐसी सिविल इंजीनियरिंग होती थी जिसका अनुसरण आज 21वीं शताब्दी में हो रहा है।



आए दिन राखीगढ़ी में अनेक रहस्यों से पर्दा उठने का सिलसिला लगातार जारी है। एएसआई के डायरेक्टर संजय मंजुल ने बताया कि हड़प्पा कालीन सभ्यता के समय के लोग सेक्टरों की तरह प्लॉट काटकर सुनियोजित तरीके से मकानों का निर्माण करते थे। शुरू में मकान कच्ची ईंटों की दीवारों से बनाए जाते थे।
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अब धीरे-धीरे पक्की ईंटों से मकान बनाने शुरू कर दिए गए हैं। जलनिकासी के लिए पक्की ईंटों की नालियों के सबूत यहां मिले हैं। साइट नंबर तीन पर एक 18 फुट की दीवार मिली है। दीवार को बनाने के लिए काफी अच्छी तकनीक का प्रयोग किया गया है। 
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दीवार में मिली ईंटों की होगी जांच 
साइट नंबर तीन में मिली ईंटों की लैब में जांच होगी। दीवार को देखकर ऐसा भी प्रतीत होता है कि यह घर के चारों तरफ बनाने वाली बाउंड्री हो सकती है। 

आधुनिक युग की सिविल इंजीनियरिंग से उस समय की तकनीक से काफी मेल खा रही है। चौड़ी गलियों के साथ-साथ जलनिकासी के लिए पक्की नालियों की व्यवस्था भी की गई थी। एक जैसे मकानों का निर्माण करना आज के सेक्टरों से मेल खा रहा है। 

दीवार के पास मिली तंदूर और भट्ठियां  
दीवार के साथ में एक तंदूर भी मिला है। वहीं तंदूर के कुछ ही दूरी पर स्टोन पकाने के भी सबूत मिले हैं। लोग स्टोन पकाकर उनके मनके बनाते थे और उनका उपयोग महिलाएं व पुरुष माला के रूप में करते थे। वह लोग मनको का व्यापार विदेशों में भी करते थे। 

हाथी के फोटो वाली सील मिली  
खोदाई के दौरान हाथी के चित्र अंकित वाली दो मोहरें मिली हैं, जिस पर उस समय की भाषा अंकित है। इस भाषा को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। डायरेक्टर संजय मंजुल का कहना है कि जल्द ही इस भाषा को पढ़ लिया जाएगा। इसके बाद कोई खास जानकारी निकलकर सामने आ सकती है। 

खोदाई में मिले मिट्टी के बर्तन  
हड़प्पाकालीन सभ्यता के लोग शुरुआत में खाना बनाने के लिए मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे। शुरुआती समय में साधारण तरीके से आग पर खाना पकाया जाता था। फिर भट्ठी पर खाना बनाना शुरू कर दिया था। खोदाई में काफी भट्ठियों के अवशेष भी मिले हैं।

खानपान भी खाता है काफी मेल 
हड़प्पा कालीन सभ्यता के समय में लोग दूध व दूध से बनी वस्तुओं जैसे कच्ची लस्सी, दही, मक्खन, पनीर इत्यादि वस्तुओं का प्रयोग अधिक करते थे। उसी समय की परंपरा आज भी पूरे भारत में चली आ रही है। 

राखी गढ़ी में कब-कब हुई खोदाई 
राखीगढ़ी में साइट नंबर तीन पर पहली बार, एक नंबर साइट पर दूसरी बार और सात नंबर साइट पर तीसरी बार खोदाई हो रही है। पहली बार एएसआई के डायरेक्टर डॉ.अमरेंद्र नाथ ने 1998 से 2000 तक खोदाई की थी। दूसरी बार डेक्कन यूनिवर्सिटी के पूर्व चांसलर प्रोफेसर वसंत शिंदे ने 2011 से 2016 तक और फिलहाल पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग दिल्ली के डिप्टी डायरेक्टर डॉ.संजय मंजुल की देखरेख में हो रही है।

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