{"_id":"69b5ccc5c807d6e163092d47","slug":"tea-and-snack-stalls-shut-down-due-to-expensive-gas-cylinders-bahadurgarh-news-c-200-1-bgh1003-121884-2026-03-15","type":"story","status":"publish","title_hn":"Jhajjar-Bahadurgarh News: महंगे सिलेंडर से चाय-नाश्ते की रेहड़ियां बंद","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Jhajjar-Bahadurgarh News: महंगे सिलेंडर से चाय-नाश्ते की रेहड़ियां बंद
विज्ञापन
फोटो नंबर 75: ईंट भट्ठा पर मजदूरों के ईंधन के लिए रखा कोयला। संवाद
विज्ञापन
बादली। रेहड़ी-पटरी वालों (टिक्की, पकोड़े, गोलगप्पे बेचने वालों) के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा होने लगा है। टिक्की-पकोड़े बेचने वाले वेंडरों को अपना काम बंद करना पड़ रहा है। प्रवासी मजदूरों की स्थिति भी खराब होने लगी है।
छोटे सिलिंडरों की अनुपलब्धता या महंगे होने के कारण प्रवासी मजदूर और छोटे दुकानदार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं जिससे पलायन जैसी स्थिति भी बन सकती है। चाय की रेहड़ी लगाने वाले अमित सैनी सुनील और कमला का कहना है कि अब मकान का किराया देने के लिए आर्थिक हालत खराब हो गए हैं।
ऐसे ही हालात रहे तो परिवार सहित पलायन करने पर मजबूर होंगे। ग्रामीण महिलाओं ने भी अपने पारंपरिक ईंधन के तौर पर लकड़ी और गोबर का प्रयोग शुरू कर दिया है। भट्ठा मालिकों के सामने मजदूरों को ईंधन उपलब्ध करवाना परेशानी बन गया है। भट्ठा संचालक आमतौर पर मजदूर की कमी झेलते हैं।
गैस सिलिंडर नहीं मिलने पर घरेलू ईंधन के तौर पर श्रमिकों को कोयला और लकड़ी देकर श्रमिकों की रसोई का काम चलाया जा रहा है। वहीं महिलाएं पूरा दिन लकड़ियां तोड़कर ईंधन का प्रबंध कर रही हैं।
Trending Videos
छोटे सिलिंडरों की अनुपलब्धता या महंगे होने के कारण प्रवासी मजदूर और छोटे दुकानदार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं जिससे पलायन जैसी स्थिति भी बन सकती है। चाय की रेहड़ी लगाने वाले अमित सैनी सुनील और कमला का कहना है कि अब मकान का किराया देने के लिए आर्थिक हालत खराब हो गए हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
ऐसे ही हालात रहे तो परिवार सहित पलायन करने पर मजबूर होंगे। ग्रामीण महिलाओं ने भी अपने पारंपरिक ईंधन के तौर पर लकड़ी और गोबर का प्रयोग शुरू कर दिया है। भट्ठा मालिकों के सामने मजदूरों को ईंधन उपलब्ध करवाना परेशानी बन गया है। भट्ठा संचालक आमतौर पर मजदूर की कमी झेलते हैं।
गैस सिलिंडर नहीं मिलने पर घरेलू ईंधन के तौर पर श्रमिकों को कोयला और लकड़ी देकर श्रमिकों की रसोई का काम चलाया जा रहा है। वहीं महिलाएं पूरा दिन लकड़ियां तोड़कर ईंधन का प्रबंध कर रही हैं।