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राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण को गति देने के लिए 317 सर्वेयर नियुक्त : डीसी
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जींद। डीसी मोहम्मद इमरान रजा ने बताया कि जिले में राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण कार्य को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने के लिए कुल 317 सर्वेयर नियुक्त किए गए हैं। इनमें से 219 सर्वेयर ग्रामीण क्षेत्रों में और 98 सर्वेयर शहरी क्षेत्रों में तैनात किए गए हैं।
डीसी ने बताया कि सर्वेयरों की नियुक्ति का उद्देश्य जिले में उपलब्ध दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण, डिजिटलीकरण और सूचीकरण सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही सर्वेक्षण के दौरान सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देने और नागरिकों को अपनी धरोहर की जानकारी साझा करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
बुधवार को लधु सचिवालय के सभागार में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उच्च अधिकारियों की ओर से बैठक ली जिसमें सभी जिलों से इस महत्वपूर्ण कार्य की प्रगति की समीक्षा की गई। बैठक में संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि सर्वेक्षण कार्य को निर्धारित समय सीमा में पूर्ण करते हुए नियमित रूप से प्रगति रिपोर्ट और डैशबोर्ड अपडेट सुनिश्चित करें।
अभी भी बिखरी हुई हैं दुर्लभ पांडुलिपियां
देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक दुर्लभ पांडुलिपियां अभी भी बिखरी हुई हैं जो समय के साथ नष्ट होने के खतरे में हैं या मंदिरों, मठों और निजी संग्रहों में सुरक्षित हैं। ऐसे में इन धरोहरों की पहचान कर उन्हें डिजिटल रूप में संरक्षित करना अत्यंत आवश्यक है ताकि हमारी समृद्ध प्राचीन ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखा जा सके।
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डीसी ने बताया कि सर्वेयरों की नियुक्ति का उद्देश्य जिले में उपलब्ध दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण, डिजिटलीकरण और सूचीकरण सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही सर्वेक्षण के दौरान सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देने और नागरिकों को अपनी धरोहर की जानकारी साझा करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
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बुधवार को लधु सचिवालय के सभागार में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उच्च अधिकारियों की ओर से बैठक ली जिसमें सभी जिलों से इस महत्वपूर्ण कार्य की प्रगति की समीक्षा की गई। बैठक में संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि सर्वेक्षण कार्य को निर्धारित समय सीमा में पूर्ण करते हुए नियमित रूप से प्रगति रिपोर्ट और डैशबोर्ड अपडेट सुनिश्चित करें।
अभी भी बिखरी हुई हैं दुर्लभ पांडुलिपियां
देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक दुर्लभ पांडुलिपियां अभी भी बिखरी हुई हैं जो समय के साथ नष्ट होने के खतरे में हैं या मंदिरों, मठों और निजी संग्रहों में सुरक्षित हैं। ऐसे में इन धरोहरों की पहचान कर उन्हें डिजिटल रूप में संरक्षित करना अत्यंत आवश्यक है ताकि हमारी समृद्ध प्राचीन ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखा जा सके।
