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स्वस्थ मिट्टी से ही होगी टिकाऊ खेती, मृदा संरक्षण अपनाएं किसान : डॉ. धीरज पंघाल
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03जेएनडी04: किसानों को मृदा संरक्षण के बारे में जागरूक करते हुए डॉ. पंघाल। स्रोत: विभाग
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जींद। कृषि विज्ञान केंद्र पांडु पिंडारा की ओर से बुधवार को गांव अकालगढ़ में खेत बचाओ अभियान के तहत किसान जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के जिला विस्तार विशेषज्ञ (मृदा विज्ञान) डॉ. धीरज पंघाल ने किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण और वैज्ञानिक खेती के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
डॉ. धीरज पंघाल ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक एवं असंतुलित प्रयोग तथा जैविक स्रोतों की अनदेखी के कारण मिट्टी की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इससे मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की कमी, सूक्ष्म पोषक तत्वों का असंतुलन और उर्वरता में गिरावट जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
उन्होंने कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही टिकाऊ और लाभकारी कृषि की आधारशिला है। उन्होंने किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करने की सलाह देते हुए कहा कि बिना मिट्टी जांच के खाद डालने से उत्पादन लागत बढ़ती है और भूमि की उत्पादकता प्रभावित होती है।
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डॉ. पंघाल ने बताया कि गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। इससे मिट्टी की जल धारण क्षमता और पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार होता है।
उन्होंने हरित खाद के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डैंचा और सनई जैसी फसलों को खेत में पलटने से नाइट्रोजन एवं कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। कार्यक्रम में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के एटीएम (आत्मा योजना) ऋषि ने किसानों को विभाग की विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी।
डॉ. धीरज पंघाल ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक एवं असंतुलित प्रयोग तथा जैविक स्रोतों की अनदेखी के कारण मिट्टी की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इससे मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की कमी, सूक्ष्म पोषक तत्वों का असंतुलन और उर्वरता में गिरावट जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
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उन्होंने कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही टिकाऊ और लाभकारी कृषि की आधारशिला है। उन्होंने किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करने की सलाह देते हुए कहा कि बिना मिट्टी जांच के खाद डालने से उत्पादन लागत बढ़ती है और भूमि की उत्पादकता प्रभावित होती है।
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डॉ. पंघाल ने बताया कि गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। इससे मिट्टी की जल धारण क्षमता और पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार होता है।
उन्होंने हरित खाद के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डैंचा और सनई जैसी फसलों को खेत में पलटने से नाइट्रोजन एवं कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। कार्यक्रम में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के एटीएम (आत्मा योजना) ऋषि ने किसानों को विभाग की विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी।