{"_id":"6a385ee0315ac099a10b6856","slug":"harappan-sand-dune-surrounded-by-bushes-and-garbage-kaithal-news-c-245-1-kht1013-151248-2026-06-22","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kaithal News: झाड़ियों और कूड़े से घिरा बालू का हड़प्पाकालीन टीला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kaithal News: झाड़ियों और कूड़े से घिरा बालू का हड़प्पाकालीन टीला
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Mon, 22 Jun 2026 03:30 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
अजय कुमार
कसान। इतिहास की अमूल्य विरासत को अपने भीतर समेटे हुए गांव बालू का हड़प्पाकालीन टीला आज उपेक्षा और बदहाली का शिकार बना हुआ है। करीब 24 एकड़ क्षेत्र में फैला यह ऐतिहासिक स्थल न केवल जिले बल्कि पूरे प्रदेश की महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों में शामिल है, लेकिन संरक्षण के अभाव में इसकी पहचान धीरे-धीरे मिटती नजर आ रही है। चारों ओर फैली कंटीली झाड़ियां, गंदगी के ढेर, अवैध खनन और सुरक्षा व्यवस्था का अभाव इस धरोहर की दुर्दशा की कहानी बयां कर रहे हैं।
गांव बालू से सारण की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित इस टीले को वर्ष 1976 में पुरातत्व विभाग ने चिह्नित किया था। इसके बाद यहां शोध और उत्खनन का कार्य शुरू हुआ। हालांकि स्थानीय लोग इससे पहले इस स्थान को ‘थेह खेड़ा’ के नाम से जानते थे। ग्रामीण क्षेत्रों में ‘थेह’ शब्द का उपयोग किसी उजड़ी हुई या प्राचीन बस्ती के अवशेषों के लिए किया जाता है। लंबे समय तक यह क्षेत्र ग्रामीणों के लिए चरागाह के रूप में उपयोग होता रहा।
बॉक्स-
खुदाई में मिले थे प्राचीन सभ्यता के प्रमाण
वर्ष 1979 में हुई खुदाई के दौरान यहां से हड़प्पाकालीन और उससे भी पुरानी सभ्यताओं के कई महत्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए थे। उत्खनन में मिट्टी की ईंटों से बनी संरचनाएं, भट्ठियां, बर्तन, तांबे की वस्तुएं, मोती और चूड़ियां मिली थीं। इन खोजों ने बालू को पुरातत्व मानचित्र पर विशेष स्थान दिलाया। खुदाई में प्राप्त अधिकांश सामग्री वर्तमान में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संग्रहालय में संरक्षित है।
विज्ञापन
बॉक्स-
सूचना बोर्ड लगाकर पूरी कर ली जिम्मेदारी
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुरातत्व विभाग ने वर्षों पहले यहां सूचना बोर्ड लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली। टीले पर विभाग की ओर से लगाए गए बोर्ड पर संरक्षित स्मारक से जुड़े नियम और प्रतिबंध अंकित हैं, लेकिन जमीन पर उनके पालन की कोई व्यवस्था दिखाई नहीं देती। स्थल पर न तो चारदीवारी है और न ही सुरक्षा कर्मियों की तैनाती।
बॉक्स-
अवैध खनन और अतिक्रमण से बढ़ रहा खतरा
ग्रामीणों के अनुसार प्रतिबंधित क्षेत्र होने के बावजूद यहां अवैध खनन और अतिक्रमण की गतिविधियां समय-समय पर होती रहती हैं। टीले का बड़ा हिस्सा कंटीली झाड़ियों से ढक चुका है। जगह-जगह कूड़ा-कचरा पड़ा हुआ है, जिससे ऐतिहासिक स्थल की गरिमा प्रभावित हो रही है। सुनसान होने के कारण यहां असामाजिक तत्वों की आवाजाही भी बनी रहती है।
बॉक्स-
ग्रामीण बोले- धरोहर के संरक्षण के लिए प्रशासन उठाए कदम
ग्रामीण संदीप कुमार ने बताया कि ऐतिहासिक महत्व होने के बावजूद इस स्थल की कोई देखरेख नहीं हो रही। इस कारण यहां कई प्रकार की अनैतिक गतिविधियां होने लगी हैं। वहीं ग्रामीण गुरदेव सिंह का कहना है कि प्रशासन और पुरातत्व विभाग को तत्काल इस धरोहर के संरक्षण के लिए कदम उठाने चाहिए। उन्होंने टीले के चारों ओर चारदीवारी बनाने, नियमित सफाई कराने तथा यहां मिले पुरातात्विक साक्ष्यों को प्रदर्शित करने के लिए संग्रहालय विकसित करने की मांग की।
बॉक्स-
धरोहर के रूप में विकसित करने की मांग
ग्राम पंचायत बालू गादड़ा पट्टी के सरपंच दिनेश कुमार ने बताया कि भूमि पुरातत्व विभाग के अधीन होने के कारण पंचायत की भूमिका सीमित है। इसके बावजूद पंचायत ने जिला प्रशासन को पत्र लिखकर इस स्थल के संरक्षण और विकास की मांग की थी। उन्होंने कहा कि यदि यहां पार्क, संग्रहालय और पर्यटन संबंधी सुविधाएं विकसित की जाएं तो यह क्षेत्र ऐतिहासिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। संवाद
कसान। इतिहास की अमूल्य विरासत को अपने भीतर समेटे हुए गांव बालू का हड़प्पाकालीन टीला आज उपेक्षा और बदहाली का शिकार बना हुआ है। करीब 24 एकड़ क्षेत्र में फैला यह ऐतिहासिक स्थल न केवल जिले बल्कि पूरे प्रदेश की महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों में शामिल है, लेकिन संरक्षण के अभाव में इसकी पहचान धीरे-धीरे मिटती नजर आ रही है। चारों ओर फैली कंटीली झाड़ियां, गंदगी के ढेर, अवैध खनन और सुरक्षा व्यवस्था का अभाव इस धरोहर की दुर्दशा की कहानी बयां कर रहे हैं।
गांव बालू से सारण की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित इस टीले को वर्ष 1976 में पुरातत्व विभाग ने चिह्नित किया था। इसके बाद यहां शोध और उत्खनन का कार्य शुरू हुआ। हालांकि स्थानीय लोग इससे पहले इस स्थान को ‘थेह खेड़ा’ के नाम से जानते थे। ग्रामीण क्षेत्रों में ‘थेह’ शब्द का उपयोग किसी उजड़ी हुई या प्राचीन बस्ती के अवशेषों के लिए किया जाता है। लंबे समय तक यह क्षेत्र ग्रामीणों के लिए चरागाह के रूप में उपयोग होता रहा।
विज्ञापन
विज्ञापन
बॉक्स-
खुदाई में मिले थे प्राचीन सभ्यता के प्रमाण
वर्ष 1979 में हुई खुदाई के दौरान यहां से हड़प्पाकालीन और उससे भी पुरानी सभ्यताओं के कई महत्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए थे। उत्खनन में मिट्टी की ईंटों से बनी संरचनाएं, भट्ठियां, बर्तन, तांबे की वस्तुएं, मोती और चूड़ियां मिली थीं। इन खोजों ने बालू को पुरातत्व मानचित्र पर विशेष स्थान दिलाया। खुदाई में प्राप्त अधिकांश सामग्री वर्तमान में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संग्रहालय में संरक्षित है।
बॉक्स-
सूचना बोर्ड लगाकर पूरी कर ली जिम्मेदारी
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुरातत्व विभाग ने वर्षों पहले यहां सूचना बोर्ड लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली। टीले पर विभाग की ओर से लगाए गए बोर्ड पर संरक्षित स्मारक से जुड़े नियम और प्रतिबंध अंकित हैं, लेकिन जमीन पर उनके पालन की कोई व्यवस्था दिखाई नहीं देती। स्थल पर न तो चारदीवारी है और न ही सुरक्षा कर्मियों की तैनाती।
बॉक्स-
अवैध खनन और अतिक्रमण से बढ़ रहा खतरा
ग्रामीणों के अनुसार प्रतिबंधित क्षेत्र होने के बावजूद यहां अवैध खनन और अतिक्रमण की गतिविधियां समय-समय पर होती रहती हैं। टीले का बड़ा हिस्सा कंटीली झाड़ियों से ढक चुका है। जगह-जगह कूड़ा-कचरा पड़ा हुआ है, जिससे ऐतिहासिक स्थल की गरिमा प्रभावित हो रही है। सुनसान होने के कारण यहां असामाजिक तत्वों की आवाजाही भी बनी रहती है।
बॉक्स-
ग्रामीण बोले- धरोहर के संरक्षण के लिए प्रशासन उठाए कदम
ग्रामीण संदीप कुमार ने बताया कि ऐतिहासिक महत्व होने के बावजूद इस स्थल की कोई देखरेख नहीं हो रही। इस कारण यहां कई प्रकार की अनैतिक गतिविधियां होने लगी हैं। वहीं ग्रामीण गुरदेव सिंह का कहना है कि प्रशासन और पुरातत्व विभाग को तत्काल इस धरोहर के संरक्षण के लिए कदम उठाने चाहिए। उन्होंने टीले के चारों ओर चारदीवारी बनाने, नियमित सफाई कराने तथा यहां मिले पुरातात्विक साक्ष्यों को प्रदर्शित करने के लिए संग्रहालय विकसित करने की मांग की।
बॉक्स-
धरोहर के रूप में विकसित करने की मांग
ग्राम पंचायत बालू गादड़ा पट्टी के सरपंच दिनेश कुमार ने बताया कि भूमि पुरातत्व विभाग के अधीन होने के कारण पंचायत की भूमिका सीमित है। इसके बावजूद पंचायत ने जिला प्रशासन को पत्र लिखकर इस स्थल के संरक्षण और विकास की मांग की थी। उन्होंने कहा कि यदि यहां पार्क, संग्रहालय और पर्यटन संबंधी सुविधाएं विकसित की जाएं तो यह क्षेत्र ऐतिहासिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। संवाद