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Karnal News: क्लेम रोकने पर लगाया 36 हजार रुपये का जुर्माना
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करनाल। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आदित्य बिरला हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी को सेवा में लापरवाही और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी पाया है। अदालत ने बीमा कंपनी को आदेश दिया है कि वह शिकायतकर्ता का 4,02,510 रुपये का पूरा मेडिकल क्लेम नौ प्रतिशत ब्याज के साथ चुकाए। इसके साथ ही मानसिक प्रताड़ना के लिए 25 हजार रुपये और अदालती खर्च के रूप में 11 हजार रुपये का जुर्माना भी वहन करे।
आयोग के फैसले के अनुसार, इंद्री के ब्याना गांव निवासी वीरेंद्र कुमार ने आदित्य बिरला हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी से पांच लाख की स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थी। इसमें वे और उनकी पत्नी दोनों कवर थे। जून 2022 में वीरेंद्र कुमार और उनकी पत्नी शशि बाला बीमार पड़ गए और उन्हें जगाधरी के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके बाद वीरेंद्र कुमार का करनाल के निजी अस्पताल में भी इलाज चला। दोनों के इलाज पर 4,02,510 रुपये का खर्च आया। शिकायतकर्ता वीरेंद्र कुमार ने बीमा कंपनी के पास सारे बिल और दस्तावेज जमा कर क्लेम मांगा, तो कंपनी ने उनके रिकॉर्ड को फर्जी और मनगढ़ंत बताते हुए क्लेम खारिज कर दिया।
बीमा कंपनी ने अदालत में दलील दी कि अस्पताल के आईसीयू रिकॉर्ड सही नहीं थे और मरीज को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत ही नहीं थी, उनका इलाज ओपीडी के तौर पर भी हो सकता था। आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्यों नीरू अग्रवाल व सर्वजीत कौर ने मामले की जांच की। अदालत ने पाया कि बीमा कंपनी ने क्लेम खारिज करने के लिए केवल कयासों और अनुमानों का सहारा लिया और अपने आरोपों को साबित करने के लिए कोर्ट में कोई भी ठोस दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया।
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ब्याज सहित लौटाना होगा इलाज का खर्च
अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर अस्पताल के रिकॉर्ड में कोई कमी थी भी, तो उसके लिए उपभोक्ता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उपभोक्ता अदालत ने बीमा कंपनी के रवैये को अनुचित माना। आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिए कि वह इलाज खर्च ब्याज सहित उपभोक्ता को लौटाए। इसके साथ ही 36 हजार रुपये का मुआवजा भी दे।
आयोग के फैसले के अनुसार, इंद्री के ब्याना गांव निवासी वीरेंद्र कुमार ने आदित्य बिरला हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी से पांच लाख की स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थी। इसमें वे और उनकी पत्नी दोनों कवर थे। जून 2022 में वीरेंद्र कुमार और उनकी पत्नी शशि बाला बीमार पड़ गए और उन्हें जगाधरी के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके बाद वीरेंद्र कुमार का करनाल के निजी अस्पताल में भी इलाज चला। दोनों के इलाज पर 4,02,510 रुपये का खर्च आया। शिकायतकर्ता वीरेंद्र कुमार ने बीमा कंपनी के पास सारे बिल और दस्तावेज जमा कर क्लेम मांगा, तो कंपनी ने उनके रिकॉर्ड को फर्जी और मनगढ़ंत बताते हुए क्लेम खारिज कर दिया।
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बीमा कंपनी ने अदालत में दलील दी कि अस्पताल के आईसीयू रिकॉर्ड सही नहीं थे और मरीज को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत ही नहीं थी, उनका इलाज ओपीडी के तौर पर भी हो सकता था। आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्यों नीरू अग्रवाल व सर्वजीत कौर ने मामले की जांच की। अदालत ने पाया कि बीमा कंपनी ने क्लेम खारिज करने के लिए केवल कयासों और अनुमानों का सहारा लिया और अपने आरोपों को साबित करने के लिए कोर्ट में कोई भी ठोस दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया।
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अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर अस्पताल के रिकॉर्ड में कोई कमी थी भी, तो उसके लिए उपभोक्ता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उपभोक्ता अदालत ने बीमा कंपनी के रवैये को अनुचित माना। आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिए कि वह इलाज खर्च ब्याज सहित उपभोक्ता को लौटाए। इसके साथ ही 36 हजार रुपये का मुआवजा भी दे।