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Karnal News: अपनों ने मुंह मोड़ा पर नर्सों ने साथ नहीं छोड़ा
Tue, 12 May 2026 02:12 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
Updated Tue, 12 May 2026 02:12 AM IST
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सुलोचना भास्कर।
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राम सारस्वत
करनाल। कोरोना महामारी का वह दौर आज भी लोगों के जहन में डर और दर्द की तस्वीर बनकर मौजूद है। अस्पतालों में भर्ती मरीज अपनों से दूर थे, चारों तरफ संक्रमण का भय था और हर दिन मौत की खबरें लोगों का हौसला तोड़ रही थीं। ऐसे समय में नर्सें मरीजों के लिए सिर्फ स्वास्थ्यकर्मी नहीं बल्कि परिवार का सहारा बनकर सामने आईं थी।
पीपीई किट पहनकर घंटों ड्यूटी करना, खुद संक्रमित होने का डर और परिवार से दूरी… इन सबके बावजूद नर्सों ने मरीजों का मनोबल टूटने नहीं दिया। मरीज जब अपनों को याद कर रोते थे, तब नर्सें उनका हाथ पकड़कर उन्हें जीने का हौसला देती थीं। कई बार मरीजों के लिए वही बेटी, बहन और मां की भूमिका निभाती नजर आईं।
विश्व नर्स दिवस पर जिले की नर्सों ने कोरोना काल की यादें साझा करते हुए बताया कि वह समय जिंदगी का सबसे कठिन लेकिन सबसे गर्व भरा अध्याय था। उन्होंने कहा कि मरीजों की आंखों में लौटती उम्मीद और स्वस्थ होकर घर लौटते लोगों की मुस्कान ही उनकी सबसे बड़ी जीत थी।
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कोविड वार्ड में हर पल मौत का डर था : सुलोचना
नर्स सुलोचना भास्कर आज भी कोरोना काल को याद कर भावुक हो जाती हैं। उन्होंने बताया कि कोविड की दूसरी लहर के दौरान अस्पताल का माहौल बेहद भयावह था। वार्ड में भर्ती कई मरीज ऑक्सीजन पर थे और हर समय किसी अनहोनी का डर बना रहता था। सुलोचना बताया कि पीपीई किट पहनकर लगातार कई घंटे काम करना आसान नहीं था। गर्मी, घुटन और थकान के बीच भी मरीजों को संभालना सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी। कई मरीज अपने परिवार से बात कर रो पड़ते थे। ऐसे में नर्सों को ही उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाना पड़ता था। उन्होंने कहा कि कई बार खुद का डर भी मन में आता था लेकिन ड्यूटी के दौरान सिर्फ मरीजों की जिंदगी बचाने का लक्ष्य सामने रहता था। के अनुसार कोरोना काल ने उन्हें सिखाया कि नर्सिंग सिर्फ नौकरी नहीं बल्कि इंसानियत की सेवा है।
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अपने भी डर गए थे लेकिन मरीजों का साथ नहीं छोड़ा : सुखविंदर
वरिष्ठ नर्स सुखविंदर कौर ने बताया कि अपने लंबे सेवाकाल में उन्होंने ऐसा भयावह समय कभी नहीं देखा था। कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा था और हर कोई संक्रमित मरीजों से दूरी बना रहा था। ऐसे माहौल में अस्पताल पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं था। सुखविंदर कौर ने कहा कि शुरुआत में उन्हें भी संक्रमण का डर था। परिवार के लोग भी लगातार चिंता जताते थे। लेकिन ड्यूटी से पीछे हटना उनके लिए संभव नहीं था। उन्होंने बताया कि कोविड वार्ड में कई मरीज ऐसे थे, जिनके परिवार वाले भी पास आने से डर रहे थे। ऐसे में नर्सें ही मरीजों के लिए सबसे बड़ा सहारा बनीं। उन्होंने मरीजों को दवाइयों के साथ मानसिक हिम्मत भी दी। कई बार मरीजों के साथ बैठकर उन्हें समझाना पड़ता था कि डरने की जरूरत नहीं है। सुखविंदर ने कहा कि मरीजों के चेहरे पर लौटती मुस्कान उन्हें आगे काम करने की ताकत देती थी।
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सेवा का फर्ज सबसे ऊपर रहा : रीना
नर्स रीना ने बताया कि कोरोना काल में ड्यूटी निभाना भावनात्मक रूप से बेहद कठिन रहा। उन्होंने बताया कि जब परिवार को पता चला कि वह कोविड मरीजों के बीच काम कर रही हैं तो सभी काफी चिंतित हो गए थे। हर दिन घर से फोन आता था और सावधानी बरतने की सलाह दी जाती थी। उन्होंने बताया कि मैं कोरोना के दौरान गर्भवती थी फिर भी मैंने रिस्क लेते हुए 12-12 घंटे पीपीपी किट पहनकर ड्यूटी की। उन्होंने बताया कि अस्पताल में हालात इतने तनावपूर्ण थे कि कई बार खुद को संभालना मुश्किल हो जाता था। मरीजों के लगातार बढ़ते आंकड़े और गंभीर हालत देखकर मन डर जाता था। इसके बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा कि कोविड वार्ड में काम करते हुए सबसे मुश्किल काम खुद को संक्रमण से बचाना था। घंटों पीपीई किट में रहना और परिवार से दूरी बनाए रखना मानसिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण था। उस दौर ने उन्हें मजबूत बनाया और सेवा का असली अर्थ समझाया।
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जिला नागरिक अस्पताल में लंबे समय से खाली पड़े 6 स्टाफ नर्स के पद
करनाल। पूरे जिले में स्टाफ नर्सों के 299 स्वीकृत पद हैं जिनमें से 47 पद लंबे समय से खाली पड़े हुए हैं। इसको लेकर मौजूदा नर्सों पर भी दवाब की स्थिति रहती है। उधर, जिला नागरिक अस्पताल में पिछले एक साल से अधिक समय से 6 स्टाफ नर्सों के पद रिक्त पड़े हुए हैं। ऐसे में अस्पताल पर मरीजों के बढ़ते दवाब के कारण मौजूदा स्टाफ नर्सों पर काफी अधिक भार पड़ा हुआ है। सीएमओ डॉ. पूनम चौधरी ने बताया कि मुख्यालय को रिक्त पदों के विषय में जानकारी दे दी गई है जल्द ही तैनाती कि संभावना है। ब्यूरो
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करनाल। कोरोना महामारी का वह दौर आज भी लोगों के जहन में डर और दर्द की तस्वीर बनकर मौजूद है। अस्पतालों में भर्ती मरीज अपनों से दूर थे, चारों तरफ संक्रमण का भय था और हर दिन मौत की खबरें लोगों का हौसला तोड़ रही थीं। ऐसे समय में नर्सें मरीजों के लिए सिर्फ स्वास्थ्यकर्मी नहीं बल्कि परिवार का सहारा बनकर सामने आईं थी।
पीपीई किट पहनकर घंटों ड्यूटी करना, खुद संक्रमित होने का डर और परिवार से दूरी… इन सबके बावजूद नर्सों ने मरीजों का मनोबल टूटने नहीं दिया। मरीज जब अपनों को याद कर रोते थे, तब नर्सें उनका हाथ पकड़कर उन्हें जीने का हौसला देती थीं। कई बार मरीजों के लिए वही बेटी, बहन और मां की भूमिका निभाती नजर आईं।
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विश्व नर्स दिवस पर जिले की नर्सों ने कोरोना काल की यादें साझा करते हुए बताया कि वह समय जिंदगी का सबसे कठिन लेकिन सबसे गर्व भरा अध्याय था। उन्होंने कहा कि मरीजों की आंखों में लौटती उम्मीद और स्वस्थ होकर घर लौटते लोगों की मुस्कान ही उनकी सबसे बड़ी जीत थी।
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कोविड वार्ड में हर पल मौत का डर था : सुलोचना
नर्स सुलोचना भास्कर आज भी कोरोना काल को याद कर भावुक हो जाती हैं। उन्होंने बताया कि कोविड की दूसरी लहर के दौरान अस्पताल का माहौल बेहद भयावह था। वार्ड में भर्ती कई मरीज ऑक्सीजन पर थे और हर समय किसी अनहोनी का डर बना रहता था। सुलोचना बताया कि पीपीई किट पहनकर लगातार कई घंटे काम करना आसान नहीं था। गर्मी, घुटन और थकान के बीच भी मरीजों को संभालना सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी। कई मरीज अपने परिवार से बात कर रो पड़ते थे। ऐसे में नर्सों को ही उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाना पड़ता था। उन्होंने कहा कि कई बार खुद का डर भी मन में आता था लेकिन ड्यूटी के दौरान सिर्फ मरीजों की जिंदगी बचाने का लक्ष्य सामने रहता था। के अनुसार कोरोना काल ने उन्हें सिखाया कि नर्सिंग सिर्फ नौकरी नहीं बल्कि इंसानियत की सेवा है।
अपने भी डर गए थे लेकिन मरीजों का साथ नहीं छोड़ा : सुखविंदर
वरिष्ठ नर्स सुखविंदर कौर ने बताया कि अपने लंबे सेवाकाल में उन्होंने ऐसा भयावह समय कभी नहीं देखा था। कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा था और हर कोई संक्रमित मरीजों से दूरी बना रहा था। ऐसे माहौल में अस्पताल पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं था। सुखविंदर कौर ने कहा कि शुरुआत में उन्हें भी संक्रमण का डर था। परिवार के लोग भी लगातार चिंता जताते थे। लेकिन ड्यूटी से पीछे हटना उनके लिए संभव नहीं था। उन्होंने बताया कि कोविड वार्ड में कई मरीज ऐसे थे, जिनके परिवार वाले भी पास आने से डर रहे थे। ऐसे में नर्सें ही मरीजों के लिए सबसे बड़ा सहारा बनीं। उन्होंने मरीजों को दवाइयों के साथ मानसिक हिम्मत भी दी। कई बार मरीजों के साथ बैठकर उन्हें समझाना पड़ता था कि डरने की जरूरत नहीं है। सुखविंदर ने कहा कि मरीजों के चेहरे पर लौटती मुस्कान उन्हें आगे काम करने की ताकत देती थी।
सेवा का फर्ज सबसे ऊपर रहा : रीना
नर्स रीना ने बताया कि कोरोना काल में ड्यूटी निभाना भावनात्मक रूप से बेहद कठिन रहा। उन्होंने बताया कि जब परिवार को पता चला कि वह कोविड मरीजों के बीच काम कर रही हैं तो सभी काफी चिंतित हो गए थे। हर दिन घर से फोन आता था और सावधानी बरतने की सलाह दी जाती थी। उन्होंने बताया कि मैं कोरोना के दौरान गर्भवती थी फिर भी मैंने रिस्क लेते हुए 12-12 घंटे पीपीपी किट पहनकर ड्यूटी की। उन्होंने बताया कि अस्पताल में हालात इतने तनावपूर्ण थे कि कई बार खुद को संभालना मुश्किल हो जाता था। मरीजों के लगातार बढ़ते आंकड़े और गंभीर हालत देखकर मन डर जाता था। इसके बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा कि कोविड वार्ड में काम करते हुए सबसे मुश्किल काम खुद को संक्रमण से बचाना था। घंटों पीपीई किट में रहना और परिवार से दूरी बनाए रखना मानसिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण था। उस दौर ने उन्हें मजबूत बनाया और सेवा का असली अर्थ समझाया।
जिला नागरिक अस्पताल में लंबे समय से खाली पड़े 6 स्टाफ नर्स के पद
करनाल। पूरे जिले में स्टाफ नर्सों के 299 स्वीकृत पद हैं जिनमें से 47 पद लंबे समय से खाली पड़े हुए हैं। इसको लेकर मौजूदा नर्सों पर भी दवाब की स्थिति रहती है। उधर, जिला नागरिक अस्पताल में पिछले एक साल से अधिक समय से 6 स्टाफ नर्सों के पद रिक्त पड़े हुए हैं। ऐसे में अस्पताल पर मरीजों के बढ़ते दवाब के कारण मौजूदा स्टाफ नर्सों पर काफी अधिक भार पड़ा हुआ है। सीएमओ डॉ. पूनम चौधरी ने बताया कि मुख्यालय को रिक्त पदों के विषय में जानकारी दे दी गई है जल्द ही तैनाती कि संभावना है। ब्यूरो

सुलोचना भास्कर।

सुलोचना भास्कर।