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श्रीलंका में भी हिंदी भाषा महफूज : प्रो. सुभासिनी
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कुरुक्षेत्र। हिंदी छात्र काउंसलर सुभासिनी।
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कुरुक्षेत्र। भारत और श्रीलंका के बीच हिंदी के विस्तार को बढ़ावा देने के कदम उठाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पहुंची श्रीलंका से हिंदी छात्र काउंसलर प्रो. सुभासिनी से बातचीत की गई। उन्होंने बताया कि हिंदी आज श्रीलंका में भी महफूज है, क्योंकि हम पुरानी पद्धति और शुद्ध हिंदी पर खासा ध्यान देते हैं। काउंसलर सुभासिनी ने बताया कि हम मां शब्द पर आज भी चंद्रबिंदु लगाकर और अलंकारों का ध्यान रखकर बच्चों को हिंदी सिखा रहे हैं। इसी का नतीजा है कि आज श्रीलंका के 12 विश्वविद्यालयों में और 1500 स्कूलों में से 500 में हिंदी को बतौर पाठ्यक्रम के रूप में शामिल किया गया है। उन्होंने बताया कि 6 विश्वविद्यालय तो ऐसे हैं, जहां हिंदी को बतौर डिग्री कोर्स के रूप में शामिल किया हुआ है।
सुभासिनी ने बताया कि उन्होंने हिंदी भाषा अपने माता-पिता से सीखी। उन्होंने मुझे गानों के माध्यम से हिंदी की तरफ बढ़ाया। तब हमने सोचा कि हिंदी को अब भारत से बाहर श्रीलंका में भी स्थापित करना है जिसकी शुरुआत बतौर काउंसलर हमने केलनिया विश्वविद्यालय से की। इसके बाद यह कारवां बनता चला गया।
हिंदी को सीखना नहीं, समझना चाहिए
हिंदी की काउंसलर सुभासिनी ने कहा कि आज के समय में भारत में हिंदी को पूरी तरह से लागू करना चाहिए। यह केवल बोलने की भाषा नहीं बल्कि समझने की भाषा है। उन्होंने कहा कि श्रीलंका में सिंहली भाषा के कई शब्द हिंदी और संस्कृत से आते हैं। उसी को जोड़कर हम इसे आज व्यापार और पर्यटन में शामिल कर रहे हैं। श्रीलंका में सबसे ज्यादा भारत के ही नागरिक घूमने जाते हैं, जहां भगवान राम और रावण से जुड़ी आस्था का केंद्र माना जाता है।
इंजीनियरिंग कॉलेज में भी हिंदी लागू, कम हुआ मानसिक दबाव
सुभासिनी ने बताया कि उनकी सबसे बड़ी जीत तब हुई, जब उन्होंने प्रयास किया और मोरातुवा विश्वविद्यालय, जो पूरी तरह से इंजीनियरिंग का संस्थान है, जहां अलग-अलग इंजीनियरिंग कोर्स किए जाते हैं, वहां 2013 के बाद से हिंदी को भी पढ़ाया जाने लगा। यह प्रक्रिया लगातार जारी है जिससे बच्चों का मनोबल बढ़ता है।
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सुभासिनी ने बताया कि उन्होंने हिंदी भाषा अपने माता-पिता से सीखी। उन्होंने मुझे गानों के माध्यम से हिंदी की तरफ बढ़ाया। तब हमने सोचा कि हिंदी को अब भारत से बाहर श्रीलंका में भी स्थापित करना है जिसकी शुरुआत बतौर काउंसलर हमने केलनिया विश्वविद्यालय से की। इसके बाद यह कारवां बनता चला गया।
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हिंदी को सीखना नहीं, समझना चाहिए
हिंदी की काउंसलर सुभासिनी ने कहा कि आज के समय में भारत में हिंदी को पूरी तरह से लागू करना चाहिए। यह केवल बोलने की भाषा नहीं बल्कि समझने की भाषा है। उन्होंने कहा कि श्रीलंका में सिंहली भाषा के कई शब्द हिंदी और संस्कृत से आते हैं। उसी को जोड़कर हम इसे आज व्यापार और पर्यटन में शामिल कर रहे हैं। श्रीलंका में सबसे ज्यादा भारत के ही नागरिक घूमने जाते हैं, जहां भगवान राम और रावण से जुड़ी आस्था का केंद्र माना जाता है।
इंजीनियरिंग कॉलेज में भी हिंदी लागू, कम हुआ मानसिक दबाव
सुभासिनी ने बताया कि उनकी सबसे बड़ी जीत तब हुई, जब उन्होंने प्रयास किया और मोरातुवा विश्वविद्यालय, जो पूरी तरह से इंजीनियरिंग का संस्थान है, जहां अलग-अलग इंजीनियरिंग कोर्स किए जाते हैं, वहां 2013 के बाद से हिंदी को भी पढ़ाया जाने लगा। यह प्रक्रिया लगातार जारी है जिससे बच्चों का मनोबल बढ़ता है।
