कुरुक्षेत्र। दयानंद कॉलोनी में श्रीमद्भागवत कथा के दौरान भक्ति प्रवचन हुए। कथावाचक अनिल शास्त्री ने कहा कि भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र की अंधेरी रात में भगवान कृष्ण ने देवकी की आठवीं संतान के रूप में जन्म लिया। श्रीकृष्ण के जन्म लेते ही कोठरी प्रकाशमय हो गई। तब तक आकाशवाणी हुई कि विष्णु जी ने कृष्ण जी के अवतार में देवकी की कोख में जन्म लिया है। भगवान श्री कृष्ण को गोकुल में बाबा नंद के पास छोड़ आएं और उनके घर एक कन्या जन्मी है, उसे मथुरा लाकर कंस को सौंप दें।
उन्होंने बताया कि भगवान विष्णु के आदेश से वासुदेव जी भगवान कृष्ण को सूप में अपने सिर पर रखकर नंद जी के घर की ओर चल दिए। भगवान विष्णु की माया से सभी पहरेदार सो गए, कारागार के दरवाजे खुल गए। आकाशवाणी सुनते ही वासुदेव के हाथों की हथकड़ी खुल गई। वासुदेव जी ने सूप में बाल गोपाल को रखकर सिर पर रख लिया और गोकुल की ओर चल पड़े। वासुदेव भगवान कृष्ण को लेकर नंद जी के यहां सकुशल पहुंच गए और वहां से उनकी नवजात कन्या को लेकर वापस आ गए। जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिली। वह तत्काल कारागार में आया और उस कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटकना चाहा लेकिन वह कन्या उसके हाथ से निकल कर आसमान में चली गई।
फिर कन्या ने कहा- ‘हे मूर्ख कंस! तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है और वृंदावन पहुंच गया है। वह कन्या कोई और नहीं, स्वयं योग माया थीं। बाबा नंद और उनकी पत्नी मां यशोदा ने कृष्ण जी का पालन-पोषण किया। राजा कंस ने कृष्ण जी का पता लगाकर उन्हें मारने की खूब कोशिश की। कंस की सारी कोशिशें विफल हुई और कृष्ण जी को कोई मार नहीं सका। अंत में श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया। राजा उग्रसेन को फिर मथुरा की राजगद्दी सौंप दी। इस अवसर पर मुख्य आयोजक सुरेश मित्तल, सीमा, अभिषेक, शैली, आशीष, सोनाक्षी, कनव, तृषिका और काव्या ने व्यासपीठ व अपने पितरों का पूजन किया।

कुरुक्षेत्र। दयानंद कॉलोनी में कथा के दौरान आशीर्वाद लेने पहुंचे श्रद्धालु। स्वयं