{"_id":"69810b5f56b4ed12cc0cb665","slug":"the-basis-of-an-organized-society-vedic-culture-was-discussed-kurukshetra-news-c-45-1-sknl1005-149522-2026-02-03","type":"story","status":"publish","title_hn":"व्यवस्थित समाज का आधार : वैदिक संस्कृति पर किया मंथन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
व्यवस्थित समाज का आधार : वैदिक संस्कृति पर किया मंथन
विज्ञापन
शाहाबाद। संगोष्ठी के शुभारंभ के दौरान मुख्यातिथि को स्मृति चिह्न देते आयोजक। स्वयं
- फोटो : bishnah news
विज्ञापन
शाहाबाद। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और वैदिक परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता को केंद्र में रखते हुए आर्य कन्या महाविद्यालय के संस्कृत विभाग की ओर से महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान उज्जैन के सहयोग से तीन दिवसीय अखिल भारतीय वैदिक संगोष्ठी का शुभारंभ किया गया। संगोष्ठी का विषय व्यवस्थित समाज का आधार : वैदिक संस्कृति रहा जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आए विद्वानों और शोधार्थियों ने भाग लिया।
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राच्य विद्या संस्थान के पूर्व अधिष्ठाता प्रो. डॉ. मानसिंह (रुड़की, उत्तराखंड) रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय प्रबंधकारिणी समिति के उपप्रधान कुलदीप गुप्ता ने की। बीज वक्ता के रूप में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत-पाली-प्राकृत विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डॉ. राजेश्वर प्रसाद मिश्र ने वैदिक संस्कृति को भारतीय सभ्यता की प्राणधारा बताया। हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी (संस्कृत प्रकोष्ठ) के निदेशक डॉ. चितरंजन दयाल सिंह कौशल ने सारस्वत अतिथि के रूप में सहभागिता की।
प्राचार्या प्रो. डॉ. आरती त्रेहन ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि वैदिक संस्कृति भारतीय समाज की आत्मा है और इसके संरक्षण में शिक्षण संस्थानों की अहम भूमिका है। संगोष्ठी की संयोजिका एवं संस्कृत विभागाध्यक्ष कैप्टन डॉ. ज्योति शर्मा ने विषयवस्तु पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि प्रो. डॉ. मानसिंह ने वैदिक संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और लोकजीवन में पुनर्स्थापना की आवश्यकता पर बल दिया। प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. देवेंद्र मिश्रा व देश बंधु ने और द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. रामराज उपाध्याय ने की। संगोष्ठी में 21 मुख्य वक्ताओं और 18 प्रतिभागियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
Trending Videos
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राच्य विद्या संस्थान के पूर्व अधिष्ठाता प्रो. डॉ. मानसिंह (रुड़की, उत्तराखंड) रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय प्रबंधकारिणी समिति के उपप्रधान कुलदीप गुप्ता ने की। बीज वक्ता के रूप में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत-पाली-प्राकृत विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डॉ. राजेश्वर प्रसाद मिश्र ने वैदिक संस्कृति को भारतीय सभ्यता की प्राणधारा बताया। हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी (संस्कृत प्रकोष्ठ) के निदेशक डॉ. चितरंजन दयाल सिंह कौशल ने सारस्वत अतिथि के रूप में सहभागिता की।
विज्ञापन
विज्ञापन
प्राचार्या प्रो. डॉ. आरती त्रेहन ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि वैदिक संस्कृति भारतीय समाज की आत्मा है और इसके संरक्षण में शिक्षण संस्थानों की अहम भूमिका है। संगोष्ठी की संयोजिका एवं संस्कृत विभागाध्यक्ष कैप्टन डॉ. ज्योति शर्मा ने विषयवस्तु पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि प्रो. डॉ. मानसिंह ने वैदिक संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और लोकजीवन में पुनर्स्थापना की आवश्यकता पर बल दिया। प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. देवेंद्र मिश्रा व देश बंधु ने और द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. रामराज उपाध्याय ने की। संगोष्ठी में 21 मुख्य वक्ताओं और 18 प्रतिभागियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

शाहाबाद। संगोष्ठी के शुभारंभ के दौरान मुख्यातिथि को स्मृति चिह्न देते आयोजक। स्वयं- फोटो : bishnah news
