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Mahendragarh-Narnaul News: दो साल की उम्र में पोलियो, घरेलू हिंसा झेली, आया की नौकरी की...अब गोल्डन गर्ल
Wed, 29 Jul 2026 12:42 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Wed, 29 Jul 2026 12:42 AM IST
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फोटो-57 शर्मिला के भाई नवीन और मां संतोष देवी। संवाद
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कनीना (महेंद्रगढ़) वह दो साल की थीं जब मां-बाप ने पांव पर खड़ा करने की कोशिश की लेकिन उनके ही पांव की जमीन यह सुनकर खिसक गई कि बेटी को तो पोलियो है। गरीबी से घिरे घरवालों के लिए पोलियो ने संघर्षों का नया अखाड़ा खोद दिया था। लेकिन, संघर्षों से तपकर कुंदन बनीं शर्मिला धनखड़ ने कॉमनवेल्थ गेम्स की महिला शॉटपुट एफ-57 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर यह सिद्ध कर दिया कि उनके दृढ़ संकल्पों के आगे कष्टों की क्या बिसात। कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में पैरा एथलेटिक्स में स्वर्ण जीतने वाली वह पहली भारतीय एथलीट बन गई हैं। इससे 20 वर्षों से पदक का इंतजार भी खत्म हो गया है।
हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के गांव छितरौली की रहने वाली शर्मिला की पूरी उम्र कष्टों से तपकर ही निखरी है। 15 अगस्त 1986 को गांव में जन्मीं। खेलने-कूदने की उम्र से पहले बाएं पैर के पोलियोग्रस्त होने का पता चला। मां संतोष और किसान पिता जयलाल को सारी दुनिया खत्म-सी लगी। इतने सुख-साधन भी थे नहीं कि बचपन में ही पहाड़-सी दुश्वारियों से आ घिरी बेटी के लिए कुछ अच्छा भी सोच पाते।
शर्मिला ने 1996 में गांव के ही एसडी स्कूल के मैदान में कोच अजमेर डांगी की देखरेख में शॉट पुट खेलना शुरू किया। 2004 में विवाह हो गया। दो बेटियां हुईं लेकिन दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा ने जिंदगी नरक बना दी। 2012 में घर से निकाले जाने पर मायके लौटना पड़ा। मायके की माली हालत खराब देख शर्मिला ने दूसरों के घरों में आया की नौकरी की।
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ट्रेनिंग के खर्चों के लिए पति ने बेच दिया था घर
2014 में दूसरी शादी के बाद शर्मिला की जिंदगी फिर खुशियों की पटरी पर लौटी। रेवाड़ी के अजीत सिंह ने उनकी जिंदगी के सारे ख्वाब पूरे करने की ठानी और राव तुलाराम स्टेडियम में दाखिला कराया। पैरा एथलीट कोच टेकचंद और देवेंद्र ने शर्मिला को शॉटपुट में सोने-सा निखारा। ट्रेनिंग के खर्चे के लिए वर्ष 2023 में पति ने अपना घर भी बेच दिया।
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2021 में पहली स्वर्णिम-वर्षा
शर्मिला को पहला गोल्ड मेडल 2021 के नेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में मिला। 2022 में पहली बार बर्मिंघम में कॉमनवेल्थ गेम्स में पदार्पण किया लेकिन चौथे स्थान से ही संतोष करना पड़ा। वर्ष 2023 में एशियन गेम्स में प्रतिनिधित्व किया । 2025 में इंडियन ओपन पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। 2026 में दुबई की प्रतिष्ठित फज्जा इंटरनेशनल प्रतियोगिता में स्वर्ण और कांस्य, दो पदक अपने नाम किए। संवाद
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नेत्र दिव्यांग मां ने बेटे की नजरों से देखा मैच
कॉमनवेल्थ के मुकाबले को लेकर शर्मिला की मां संतोष देवी सुबह से ही बेचैन थीं। नेत्र दिव्यांग होने के कारण वह अपनी आंखों से मैच तो नहीं देख पाईं लेकिन बेटे नवीन से पल-पल अपडेट लेती रहीं। जैसे ही गोल्ड मेडल पक्का हुआ, वह निहाल हो गईं। संतोष देवी बताती हैं, बेटी पिछले मुकाबलों में तीसरे-चौथे नंबर पर आई थी। इस बार गोल्ड लाकर सारी कसर पूरी कर दी। बेटी के देश का नाम रोशन करने पर बेहद खुश हूं। शर्मिला से बात भी की है। वह इसी हफ्ते भारत लौटेगी।
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भाई को दिलाया रिक्शा
आर्थिक तंगी से घिरे माता-पिता को भी शर्मिला ने बड़ा सहारा दिया है। छोटे भाई नवीन बताते हैं कि जो ऑटो वह चलाते हैं, उसे बहन ने ही दिलाया है। इसी से गृहस्थी चल रही है।
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हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के गांव छितरौली की रहने वाली शर्मिला की पूरी उम्र कष्टों से तपकर ही निखरी है। 15 अगस्त 1986 को गांव में जन्मीं। खेलने-कूदने की उम्र से पहले बाएं पैर के पोलियोग्रस्त होने का पता चला। मां संतोष और किसान पिता जयलाल को सारी दुनिया खत्म-सी लगी। इतने सुख-साधन भी थे नहीं कि बचपन में ही पहाड़-सी दुश्वारियों से आ घिरी बेटी के लिए कुछ अच्छा भी सोच पाते।
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शर्मिला ने 1996 में गांव के ही एसडी स्कूल के मैदान में कोच अजमेर डांगी की देखरेख में शॉट पुट खेलना शुरू किया। 2004 में विवाह हो गया। दो बेटियां हुईं लेकिन दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा ने जिंदगी नरक बना दी। 2012 में घर से निकाले जाने पर मायके लौटना पड़ा। मायके की माली हालत खराब देख शर्मिला ने दूसरों के घरों में आया की नौकरी की।
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ट्रेनिंग के खर्चों के लिए पति ने बेच दिया था घर
2014 में दूसरी शादी के बाद शर्मिला की जिंदगी फिर खुशियों की पटरी पर लौटी। रेवाड़ी के अजीत सिंह ने उनकी जिंदगी के सारे ख्वाब पूरे करने की ठानी और राव तुलाराम स्टेडियम में दाखिला कराया। पैरा एथलीट कोच टेकचंद और देवेंद्र ने शर्मिला को शॉटपुट में सोने-सा निखारा। ट्रेनिंग के खर्चे के लिए वर्ष 2023 में पति ने अपना घर भी बेच दिया।
2021 में पहली स्वर्णिम-वर्षा
शर्मिला को पहला गोल्ड मेडल 2021 के नेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में मिला। 2022 में पहली बार बर्मिंघम में कॉमनवेल्थ गेम्स में पदार्पण किया लेकिन चौथे स्थान से ही संतोष करना पड़ा। वर्ष 2023 में एशियन गेम्स में प्रतिनिधित्व किया । 2025 में इंडियन ओपन पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। 2026 में दुबई की प्रतिष्ठित फज्जा इंटरनेशनल प्रतियोगिता में स्वर्ण और कांस्य, दो पदक अपने नाम किए। संवाद
नेत्र दिव्यांग मां ने बेटे की नजरों से देखा मैच
कॉमनवेल्थ के मुकाबले को लेकर शर्मिला की मां संतोष देवी सुबह से ही बेचैन थीं। नेत्र दिव्यांग होने के कारण वह अपनी आंखों से मैच तो नहीं देख पाईं लेकिन बेटे नवीन से पल-पल अपडेट लेती रहीं। जैसे ही गोल्ड मेडल पक्का हुआ, वह निहाल हो गईं। संतोष देवी बताती हैं, बेटी पिछले मुकाबलों में तीसरे-चौथे नंबर पर आई थी। इस बार गोल्ड लाकर सारी कसर पूरी कर दी। बेटी के देश का नाम रोशन करने पर बेहद खुश हूं। शर्मिला से बात भी की है। वह इसी हफ्ते भारत लौटेगी।
भाई को दिलाया रिक्शा
आर्थिक तंगी से घिरे माता-पिता को भी शर्मिला ने बड़ा सहारा दिया है। छोटे भाई नवीन बताते हैं कि जो ऑटो वह चलाते हैं, उसे बहन ने ही दिलाया है। इसी से गृहस्थी चल रही है।

फोटो-57 शर्मिला के भाई नवीन और मां संतोष देवी। संवाद