{"_id":"6a4a9fb1d00f42b06a0e7dda","slug":"growing-seedling-mangoes-from-stones-an-effort-to-conserve-biodiversity-in-rambas-narnol-news-c-203-1-sroh1011-127943-2026-07-05","type":"story","status":"publish","title_hn":"Mahendragarh-Narnaul News: गुठली से उगा रहे बीजू आम, रामबास में जैव विविधता बचाने की कोशिश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Mahendragarh-Narnaul News: गुठली से उगा रहे बीजू आम, रामबास में जैव विविधता बचाने की कोशिश
विज्ञापन
फोटो संख्या:51- गांव रामबास पशु चिकित्सालय में आम के पौधे लगाते पर्यावरण प्रेमी मनोज कुमार--स्
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कनीना। गांव रामबास स्थित पशु चिकित्सालय परिसर में बीज (गुठली) से तैयार आम के पौधों की एक सार्वजनिक फल वाटिका विकसित की जा रही है। इस पहल का उद्देश्य केवल पौधारोपण करना नहीं, बल्कि भारत की पारंपरिक बीजू आम की समृद्ध विरासत को संरक्षित करना और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है।
पर्यावरण प्रेमी मनोज कुमार रामबास ने बताया कि भारत में सदियों से बीजू आम की हजारों स्थानीय किस्में प्राकृतिक रूप से विकसित होती रही हैं। आधुनिक कलमी आमों की तुलना में बीजू आम अपनी अलग पहचान रखता है। इसकी खासियत इसकी प्राकृतिक सुगंध, स्वाद, मजबूत पेड़ की संरचना और आनुवंशिक विविधता है।
बीजू आम सीधे गुठली से उगाया जाता है और इसमें किसी प्रकार की कलम या ग्राफ्टिंग तकनीक का उपयोग नहीं किया जाता। इसी कारण हर पेड़ अलग होता है और एक ही क्षेत्र में उगे पेड़ों के फल के स्वाद, रंग और आकार में भी भिन्नता देखी जाती है। यह विविधता इसकी सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती है।
विज्ञापन
मनोज कुमार के अनुसार बीजू आम के पेड़ों की जड़ें जमीन में काफी गहराई तक जाती हैं जिससे यह कम पानी, सूखा और बदलते मौसम की परिस्थितियों को आसानी से सहन कर लेता है। इसी वजह से विशेषज्ञ इसे भविष्य की जलवायु अनुकूल खेती के लिए बेहतर विकल्प मानते हैं।
इसके फलों में मैंगिफेरिन, कैरोटेनॉयड्स और पॉलीफेनॉल जैसे प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, हृदय स्वास्थ्य को बेहतर रखने और कोशिकाओं की सुरक्षा में सहायक माने जाते हैं। इसमें मौजूद फाइबर पाचन तंत्र के लिए भी लाभदायक है।
बीजू आम का पौधा फल देने में लगभग 7 से 10 वर्ष का समय लेता है लेकिन एक बार फल देने के बाद यह कई दशकों तक उत्पादन करता रहता है। इसी कारण इसे एक टिकाऊ और दीर्घकालिक फल वृक्ष माना जाता है।
मनोज कुमार ने कहा कि आज जरूरत है कि गांवों में मौजूद पुराने और उत्कृष्ट बीजू आम के वृक्षों की पहचान कर उनका संरक्षण किया जाए। साथ ही स्थानीय स्तर पर जर्मप्लाज्म बैंक तैयार करने, पारंपरिक किस्मों का दस्तावेजीकरण करने और किसानों को इनके संरक्षण के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। इससे न केवल जैव विविधता सुरक्षित रहेगी, बल्कि भविष्य में नई और बेहतर किस्मों के विकास का मार्ग भी खुलेगा।
विज्ञापन
पर्यावरण प्रेमी मनोज कुमार रामबास ने बताया कि भारत में सदियों से बीजू आम की हजारों स्थानीय किस्में प्राकृतिक रूप से विकसित होती रही हैं। आधुनिक कलमी आमों की तुलना में बीजू आम अपनी अलग पहचान रखता है। इसकी खासियत इसकी प्राकृतिक सुगंध, स्वाद, मजबूत पेड़ की संरचना और आनुवंशिक विविधता है।
विज्ञापन
बीजू आम सीधे गुठली से उगाया जाता है और इसमें किसी प्रकार की कलम या ग्राफ्टिंग तकनीक का उपयोग नहीं किया जाता। इसी कारण हर पेड़ अलग होता है और एक ही क्षेत्र में उगे पेड़ों के फल के स्वाद, रंग और आकार में भी भिन्नता देखी जाती है। यह विविधता इसकी सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती है।
विज्ञापन
मनोज कुमार के अनुसार बीजू आम के पेड़ों की जड़ें जमीन में काफी गहराई तक जाती हैं जिससे यह कम पानी, सूखा और बदलते मौसम की परिस्थितियों को आसानी से सहन कर लेता है। इसी वजह से विशेषज्ञ इसे भविष्य की जलवायु अनुकूल खेती के लिए बेहतर विकल्प मानते हैं।
इसके फलों में मैंगिफेरिन, कैरोटेनॉयड्स और पॉलीफेनॉल जैसे प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, हृदय स्वास्थ्य को बेहतर रखने और कोशिकाओं की सुरक्षा में सहायक माने जाते हैं। इसमें मौजूद फाइबर पाचन तंत्र के लिए भी लाभदायक है।
बीजू आम का पौधा फल देने में लगभग 7 से 10 वर्ष का समय लेता है लेकिन एक बार फल देने के बाद यह कई दशकों तक उत्पादन करता रहता है। इसी कारण इसे एक टिकाऊ और दीर्घकालिक फल वृक्ष माना जाता है।
मनोज कुमार ने कहा कि आज जरूरत है कि गांवों में मौजूद पुराने और उत्कृष्ट बीजू आम के वृक्षों की पहचान कर उनका संरक्षण किया जाए। साथ ही स्थानीय स्तर पर जर्मप्लाज्म बैंक तैयार करने, पारंपरिक किस्मों का दस्तावेजीकरण करने और किसानों को इनके संरक्षण के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। इससे न केवल जैव विविधता सुरक्षित रहेगी, बल्कि भविष्य में नई और बेहतर किस्मों के विकास का मार्ग भी खुलेगा।