{"_id":"6a036e36b45f1ca1c5008ac2","slug":"training-given-to-farmers-for-good-yield-of-guar-narnol-news-c-203-1-sroh1011-126420-2026-05-12","type":"story","status":"publish","title_hn":"Mahendragarh-Narnaul News: ग्वार की अच्छी उपज के लिए किसानों को दिया गया प्रशिक्षण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Mahendragarh-Narnaul News: ग्वार की अच्छी उपज के लिए किसानों को दिया गया प्रशिक्षण
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Tue, 12 May 2026 11:45 PM IST
विज्ञापन
फोटो संख्या:59 करीरा में आयोजित कार्यक्रम में किसानों को जानकारी देते केवीके वक्ता। विज्ञप्ति
- फोटो : सांकेतिक
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
कनीना। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्र महेंद्रगढ़ की ओर से हिंदुस्तान एंड केमिकल्स लिमिटेड भिवानी की ओर से किसानों को ग्वार फसल की अच्छी पैदावार लेने का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण शिविर का आयोजन गांव करीरा में किया गया।
केंद्र संयोजक डॉ. सत्यजीत ने कहा कि ग्वार की फसल किसानों के लिए न सिर्फ अच्छी आय का स्रोत है बल्कि भूमि की उर्वरक शक्ति को भी बढ़ाती है। उन्होंने बताया कि उन्न्त किस्मों जैसे एचजी 2-20, एचजी 563 का चयन व उचित फसल प्रबंधन अपनाकर ग्वार के उत्पादन को ओर अधिक बढ़ाया जा सकता है।
उन्होंने किसानों से अपील की है कि वे फसलों में उर्वरकों का उपयोग संतुलित मात्रा में करें, ताकि उत्पादन लागत कम हो और भूमि की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहे।
केवल नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों के अधिक प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है और फसलों में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने बताया कि किसानों को मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए।
नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश के साथ-साथ जिंक, सल्फर और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों का भी संतुलित उपयोग आवश्यक है। जैविक खाद, वर्मी कंपोस्ट व हरी खाद के प्रयोग से मिट्टी की संरचना में सुधार होता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।
हिंदुस्तान गम एंड कैमिकल्स लि. से आए ग्वार विशेषज्ञ डॉ. बीडी यादव ने बताया कि ग्वार फसल में खरपतवार प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। ग्वार फसल में अनेक बार रस चूसने वाले कीटों का आक्रमण हो जाता है, इससे बचाव के लिए 200 मिली मैलाथियान 50 ईसी को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें।
ग्वार फसल में जड़ गलन रोग एक मुख्य बीमारी है इसके उपरांत बैक्टीरियल ब्लाएट बीमारी आती है। इसकी रोकथाम के लिए बिजाई के पहला छिड़काव बिजाई के 40-45 दिन पर स्ट्रेप्टोसाइकलिन 30 ग्राम प्रति एकड़ व कापर आक्सीक्लोराइड 400 ग्राम प्रति एकड को 200 लीटर पानी में मिलाकर 15-20 दिन के अंतराल पर दो छिड़काव करें।
केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र यादव ने किसानों को ग्वार फसल में लगने वाले कीड़ों व बीमारियों कि रोकथाम व दवाओं के प्रयोग में सावधानियों के बारे में जानकारी दी।
झुलसा रोग से बचाव हेतु 6 किग्रा ग्वार का बीज को 6 लीटर पानी में 6 ग्राम स्ट्रेपटोसाइकलिन के घोल में 20 मिनट तक भिगोकर व छाया में सुखाकर 2 ग्राम बाविस्टिन प्रति किग्रा बीज के हिसाब से सूखा उपचार करें।
कृषि महाविद्यालय के छात्रों ने किसानों को बताया कि यूरिया और डीएपी पर अत्यधिक निर्भरता न केवल मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को कम कर रही है, बल्कि भविष्य में फसल उत्पादकता के लिए भी बड़ा खतरा है। कार्यक्रम में करीरा व आसपास के गांवों से 100 से अधिक किसानों व महिलाओं ने भाग लिया।
Trending Videos
कनीना। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्र महेंद्रगढ़ की ओर से हिंदुस्तान एंड केमिकल्स लिमिटेड भिवानी की ओर से किसानों को ग्वार फसल की अच्छी पैदावार लेने का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण शिविर का आयोजन गांव करीरा में किया गया।
केंद्र संयोजक डॉ. सत्यजीत ने कहा कि ग्वार की फसल किसानों के लिए न सिर्फ अच्छी आय का स्रोत है बल्कि भूमि की उर्वरक शक्ति को भी बढ़ाती है। उन्होंने बताया कि उन्न्त किस्मों जैसे एचजी 2-20, एचजी 563 का चयन व उचित फसल प्रबंधन अपनाकर ग्वार के उत्पादन को ओर अधिक बढ़ाया जा सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
उन्होंने किसानों से अपील की है कि वे फसलों में उर्वरकों का उपयोग संतुलित मात्रा में करें, ताकि उत्पादन लागत कम हो और भूमि की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहे।
केवल नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों के अधिक प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है और फसलों में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने बताया कि किसानों को मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए।
नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश के साथ-साथ जिंक, सल्फर और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों का भी संतुलित उपयोग आवश्यक है। जैविक खाद, वर्मी कंपोस्ट व हरी खाद के प्रयोग से मिट्टी की संरचना में सुधार होता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।
हिंदुस्तान गम एंड कैमिकल्स लि. से आए ग्वार विशेषज्ञ डॉ. बीडी यादव ने बताया कि ग्वार फसल में खरपतवार प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। ग्वार फसल में अनेक बार रस चूसने वाले कीटों का आक्रमण हो जाता है, इससे बचाव के लिए 200 मिली मैलाथियान 50 ईसी को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें।
ग्वार फसल में जड़ गलन रोग एक मुख्य बीमारी है इसके उपरांत बैक्टीरियल ब्लाएट बीमारी आती है। इसकी रोकथाम के लिए बिजाई के पहला छिड़काव बिजाई के 40-45 दिन पर स्ट्रेप्टोसाइकलिन 30 ग्राम प्रति एकड़ व कापर आक्सीक्लोराइड 400 ग्राम प्रति एकड को 200 लीटर पानी में मिलाकर 15-20 दिन के अंतराल पर दो छिड़काव करें।
केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र यादव ने किसानों को ग्वार फसल में लगने वाले कीड़ों व बीमारियों कि रोकथाम व दवाओं के प्रयोग में सावधानियों के बारे में जानकारी दी।
झुलसा रोग से बचाव हेतु 6 किग्रा ग्वार का बीज को 6 लीटर पानी में 6 ग्राम स्ट्रेपटोसाइकलिन के घोल में 20 मिनट तक भिगोकर व छाया में सुखाकर 2 ग्राम बाविस्टिन प्रति किग्रा बीज के हिसाब से सूखा उपचार करें।
कृषि महाविद्यालय के छात्रों ने किसानों को बताया कि यूरिया और डीएपी पर अत्यधिक निर्भरता न केवल मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को कम कर रही है, बल्कि भविष्य में फसल उत्पादकता के लिए भी बड़ा खतरा है। कार्यक्रम में करीरा व आसपास के गांवों से 100 से अधिक किसानों व महिलाओं ने भाग लिया।