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Panipat News: उग्राखेड़ी में लड़ी गई थी पानीपत की तीसरी लड़ाई

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 01 May 2026 03:45 AM IST
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The Third Battle of Panipat was fought at Ugrakhedi.
उग्रा खेड़ी गांव में बनाया गया पार्क। संवाद
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जगमहेंद्र सरोहा
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पानीपत। उग्राखेड़ी गांव की जमीन पर पानीपत की तीसरी लड़ाई लड़ी गई थी और उग्र सैन ने पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) से पहले गांव बसाया था। उन्हीं के नाम पर गांव का नाम उग्रा खेड़ी रखा गया है।
गांव तीसरी बार वर्तमान स्थान पर संत गरीब दास के आशीर्वाद से बसाया था। यहां आज दादा खेड़ा के रूप में उनकी पूजा की जाती है। इसी धरती पर हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठा सेना का इतना खून बहा था कि तालाब भर गया था।
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गांव में आज भी उस तालाब को गुहला तालाब और लड़ाई के मैदान को पापी थली के नाम से जाना जाता हैं। गांव के साथ तीसरी लड़ाई का सूचक पर्यटन स्थल काला आंब बना है। ग्रामीणों का मानना है कि यहां सदाशिवराव का कैंप था। उग्रा खेड़ी गांव पानीपत-हरिद्वार नेशनल हाईवे पर शहर से सटा हुआ है। गांव का कुछ रकबा नगर निगम के अंतर्गत आता है। इसमें बलजीत नगर, विद्यानंद कॉलोनी व धूप सिंह नगर आते हैं।
पानीपत की तीसरी लड़ाई में एक ग्रामीण हुआ था बलिदान

पानीपत की तीसरी लड़ाई 14 जनवरी 1761 को मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच लड़ी गई थी। ग्रामीण सतबीर सिंह ने बताया कि इसमें पंच गांव के प्रधान राजकुमार के परिवार से एक व्यक्ति मराठों की तरफ से युद्ध में बलिदान हुए थे। इस परिवार ने गांव को छोड़ दिया था। इनको बाद में गांव में लाया गया। पानीपत की लड़ाई के समय ग्रामीण आसपास के जंगल छुप गए थे। एक ग्रामीण ने पीपल के पेड़ पर चढ़कर पूरी लड़ाई देखी थी। मराठा सेना का खून तालाब में आकर जमा हो गया था। इसे पापी थली के नाम से जाना जाता है।
सिंधु नदी पर आकर किया था स्नान
67 वर्षीय सतबीर सिंह ने बताया कि पृथ्वीराज की हार के बाद 16 गोत्र के लोग अफगानिस्तान के गढ़ गजनी से चले और पाकिस्तान की सिंधु नदी पर आकर स्नान किया। उन्होंने गठजोड़ (इकट्ठा) होकर घाट पर कब्जा कर लिया। लोगों ने फिर गठवाला गोत्र बना लिया। यह आज मलिक गोत्र के नाम से जाना जाता है। वे वहां से आकर भिवानी जिले के मेहंदीपुर गांव में आकर रहने लगे। उस समय दिल्ली पर कुतुबुद्दीन ऐबक का राज था। कुतुबुद्दीन ने किले पर सेना भेज दी।
अलग-अलग जगह बसने का लिया था फैसला
एडवोकेट जुगविंद्र मलिक ने बताया कि पानीपत के वार्ड-11 में जटवाड़ा में मलिक गोत्र के लोग रहते थे। ग्रामीणों ने यहां से उठकर आसपास के क्षेत्र में अलग-अलग जगह बसने का फैसला लिया। मलिक गोत्र के पांच लोगों ने अलग-अलग जगह बसने का फैसला लिया। उग्रसेन ने उग्राखेड़ी, रिसाल सिंह रिसालू, राजा राम ने राजा खेड़ी, नंबरदार ने निंबरी और इसी तरह कुटानी गांव बसाया। उग्राखेड़ी पानीपत की पहली लड़ाई में बबैल नाके से कुछ आगे वर्तमान में कैप्टन मार्केट के नजदीक बसाया। दूसरी लड़ाई में यहां से उठा दिया गया।
पहले गांव के साथ ही बहती थी यमुना
इंजीनियर कृष्ण आर्य ने बताया कि महाराजा सुरजमल ने सेना के साथ एक महिला और पुरुष चिकित्सक को भेजा था। पहले गांव के साथ ही यमुना बहती थी। दोनों अलग-अलग कैंप में रहते थे। महिला चिकित्सक गिरजा ने आग लगाकर अपनी जान दे दी। इसके कुछ दिन बाद पुरुष चिकित्सक ने भी जान दे दी थी। अब यहां पर मेला लगता है और दिल्ली से यहां आकर लोग भंडारा लगाते हैं।
ग्रामीणों ने गांव में की थी सेवा
पूर्व सरपंच बिंटू मलिक ने बताया कि झज्जर जिला में गरीब दास हरिद्वार से स्नान कर हाथी पर सवार होकर वापस जा रहे थे। ग्रामीणों ने गांव में उनकी सेवा की। इसके बाद गरीबदास ने ग्रामीणों को पांच ईंट लाने को कहा। संत ने कुंड के पास पांच ईंट रखकर दादा खेड़ा बनाया। यहां आज भी ग्रामीण पूजा करते हैं। संत गरीबदास करीब 30 साल बाद फिर गांव में आए। उन्होंने गांव में कुआं बनवाया और उस समय कुआं से करीब 100 मीटर दूरी पर महिला शौचालय बनाया। इसे करीब 20 साल पहले गिराया गया है।

उग्रा खेड़ी गांव में बनाया गया पार्क। संवाद

उग्रा खेड़ी गांव में बनाया गया पार्क। संवाद

उग्रा खेड़ी गांव में बनाया गया पार्क। संवाद

उग्रा खेड़ी गांव में बनाया गया पार्क। संवाद

उग्रा खेड़ी गांव में बनाया गया पार्क। संवाद

उग्रा खेड़ी गांव में बनाया गया पार्क। संवाद

उग्रा खेड़ी गांव में बनाया गया पार्क। संवाद

उग्रा खेड़ी गांव में बनाया गया पार्क। संवाद

उग्रा खेड़ी गांव में बनाया गया पार्क। संवाद

उग्रा खेड़ी गांव में बनाया गया पार्क। संवाद

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