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Rewari News: छोटे गैस सिलिंडर देने की घोषणा के बाद भी जूझ रहे प्रवासी श्रमिक

Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sun, 05 Apr 2026 11:40 PM IST
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Migrant Workers Continue to Struggle Even After Announcement of Small Gas Cylinders
राम बाबू, धारुहेड़ा
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रेवाड़ी/धारूहेड़ा।
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गैस संकट के चलते प्रवासी श्रमिकों, छात्रों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को पांच किलो का एलपीजी गैस सिलिंडर मिलेगा। यह घोषणा 1 अप्रैल को पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने गई थी लेकिन श्रमिकों को सिलिंडर नहीं मिल रहा है।

धारूहेड़ा, भिवाड़ी और बावल जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले हजारों प्रवासी श्रमिक छोटे सिलिंडर पर निर्भर हैं। गैस एजेंसी संचालकों का कहना है कि उनके पास पांच किलो वाले सिलिंडर पहुंचे ही नहीं हैं जिसके कारण वे उपभोक्ताओं को उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं।
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इससे श्रमिकों में नाराजगी और चिंता दोनों बढ़ रही है। श्रमिकों ने बताया कि शहर में किराये के कमरों में रहने के कारण वे लकड़ी या मिट्टी के चूल्हे का इस्तेमाल नहीं कर सकते। ऐसे में खाना बनाना मुश्किल हो गया है। इसका सीधा असर उनके काम और दिनचर्या पर पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि बच्चों की पढ़ाई तक प्रभावित हो रही है क्योंकि घर का पूरा संतुलन बिगड़ गया है। यदि किसी तरह सिलिंडर मिल भी जाए तो एक किलो गैस भरवाने के लिए 300 से 500 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं जो उनकी आमदनी के मुकाबले काफी अधिक है।
स्थिति से तंग आकर कई श्रमिकों ने अपने गांव लौटने का फैसला कर लिया है। उनका कहना है कि लगातार बढ़ते खर्च और जरूरी सुविधाओं की कमी के कारण शहर में रहना मुश्किल होता जा रहा है। तंग आकर 30 प्रतिशत श्रमिक पलायन कर चुके हैं।
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खाने-पीने की वस्तुओं के दाम बढ़े
होटल और ठेला संचालकों ने खाने-पीने की वस्तुओं के दाम बढ़ा दिए हैं। पहले 10 से 15 रुपये में मिलने वाला समोसा अब 20 से 25 रुपये तक पहुंच गया है। वहीं चार रोटी, सब्जी और सलाद वाली थाली पहले बावल और धारूहेड़ा में 40 से 50 रुपये में मिल जाती थी, अब 60 से 70 रुपये तक पहुंच गई है। रेवाड़ी शहर में 60 से 70 रुपये वाली थाली 80 रुपये तक पहुंच गई है। भिवाड़ी और धारूहेड़ा की कई कंपनियों ने अपनी कैंटीन सेवाएं बंद कर दी हैं। पहले जहां कर्मचारियों को सस्ती दरों पर भोजन उपलब्ध हो जाता था, अब उन्हें घर से खाना बनाकर लाना पड़ रहा है।
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मूल रूप से बिहार के छपरा का रहना वाला हूं। धारूहेड़ा में किराये के मकान में रहने और मजदूरी करने की वजह से कभी भी गैस कनेक्शन की रजिस्टर कॉपी बनवाने की कोशिश नहीं की। अब हालात बहुत कठिन हो गए हैं। सिलिंडर मुश्किल हो गया है।
- राम बाबू, धारूहेड़ा
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कंपनी में पहले कैंटीन व्यवस्था थी लेकिन गैस की किल्लत को देखते हुए कैंटीन बंद हो गई है। अब घर से ही भोजन बनाकर ले जाना पड़ता है जिससे खर्च का भार बढ़ गया है। पहले बिना गैस कनेक्शन के गुजारा करते थे लेकिन अब पलायन का डर सताने लगा है।
श्याम बाबू, भिवाड़ी
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एलपीजी गैस के लिए सभी श्रमिक परेशान हैं लेकिन कुछ नहीं हो पा रहा है। हालात सामान्य नहीं हुए तो हमारे जैसे लोगों के लिए समस्या और गंभीर हो जाएगी।
जय प्रकाश, धारूहेड़ा
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खाना पकाने का कोई साधन नहीं बचा है। पहले धारूहेड़ा में विभिन्न जगहों पर पहले गैस आसानी से मिल जाती थी। कई दुकानदार चोरी-छिपे सिलिंडर भर देते थे लेकिन अब कार्रवाई के डर से सिलिडर नहीं भरा जा रहा है।
दीपक कुमार, धारूहेड़ा

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वर्जन

अभी छोटे सिलिंडर एजेंसी पर नहीं आए हैं। जैसे ही एजेंसी पर उपलब्ध होंगे, तब लोगों को वितरित कर दिए जाएंगे।
कपिल देव, मैनेजर, जेएसके गैस एजेंसी, धारूहेड़ा
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हमारे पास भी छोटे सिलिंडर नहीं आए हैं। मिलने पर ही लोगों को दिया जा सकता है। कब आएंगे अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।

उमेश कुमार, मैनेजर, ओम शिव शक्ति, गैस एजेंसी धारूहेड़ा
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मौजूदा समय में श्रमिक वर्ग काफी प्रभावित हैं। श्रमिकों को विशेष सुविधाएं मिलनी चाहिए ताकि इस मुसीबत के समय में उन्हें परेशानी ना हो।

कॉमरेड राजेंद्र सिंह, राज्य अध्यक्ष, केन्द्रीय श्रमिक संगठन एआईयूटीयूसी

राम बाबू, धारुहेड़ा

राम बाबू, धारुहेड़ा

राम बाबू, धारुहेड़ा

राम बाबू, धारुहेड़ा

राम बाबू, धारुहेड़ा

राम बाबू, धारुहेड़ा

राम बाबू, धारुहेड़ा

राम बाबू, धारुहेड़ा

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