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Rohtak News: खुद के बनाए कीटनाशकों व जीवामृत का इस्तेमाल कर प्राकृतिक खेती कर रहे रामनिवास
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12- रोहतक के चिड़ी गांव निवासी प्रगतिशील किसान रामनिवास।
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रोहतक। जिले के लाखनमाजरा खंड के गांव चिड़ी निवासी रामनिवास 15 वर्षों से प्राकृतिक एवं औषधीय पौधों की खेती कर रहे हैं। वह फसलों से खरपतवार हटाने के लिए स्वयं तैयार किए गए कीटनाशक व जीवामृत का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके लिए उनको 23 मार्च को हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित कृषि मेले में प्रगतिशील किसान के रूप में सम्मानित किया गया।
12 वीं पास और आईटीआई कर चुके रामनिवास ने बताया कि पहले वह गांव में ही वर्कशॉप चलाते थे। वर्ष 2000 में हुए नुकसान के बाद उन्होंने अपनी ढाई एकड़ जमीन पर खेती शुरू की। उन्हें प्राकृतिक खेती की प्रेरणा अपने पिता से मिली। इसके बाद कृषि विभाग के कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर खेती की बारीकियां सीखीं।
उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती से उत्पादन में प्रति एकड़ लगभग 6 क्विंटल तक की कमी आती है लेकिन इसकी गुणवत्ता और स्वाद अलग ही होता है। घर में कई बार आटा खत्म होने पर पड़ोस का बनाते हैं तो वो स्वाद ही नहीं आता है। उन्होंने सरकार से मांग की कि प्राकृतिक खेती करने वाले छोटे किसानों को कृषि उपकरणों पर सब्सिडी और अन्य प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि वे संसाधनों के अभाव में पीछे न रहें।
रामनिवास ने बताया कि प्राकृतिक खेती में श्रम (लेबर) की अधिक आवश्यकता पड़ती है। इससे लागत बढ़ जाती है। वर्तमान में वे डेढ़ एकड़ से लगभग 60,000 रुपये तक का मुनाफा कमा रहे हैं जबकि लागत सामान्य खेती के मुकाबले डेढ़ गुना है। संवाद
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दूसरों को कर रहे जागरूक
वह अब विभिन्न जिलों में जाकर अन्य किसानों को भी प्राकृतिक खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अब तक करीब 60 प्रशिक्षण कार्यक्रमों और तकनीकी कार्यशालाओं में भाग ले चुके हैं। उन्होंने किसानों को शुरुआत में थोड़ी जमीन से ही प्राकृतिक खेती का प्रयोग करने की सलाह दी है। वह खेत में हर तीन साल में जीवामृत और गोबर की खाद डालते हैं। खरपतवार हटाने के लिए दवाइयों की जगह खुद बनाए कीटनाशक का उपयोग करते हैं। इसमें विभिन्न पौधों के पत्तों को उबालकर, उनमें पानी और लस्सी जैसी चीजें मिलाकर छिड़काव किया जाता है।
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12 वीं पास और आईटीआई कर चुके रामनिवास ने बताया कि पहले वह गांव में ही वर्कशॉप चलाते थे। वर्ष 2000 में हुए नुकसान के बाद उन्होंने अपनी ढाई एकड़ जमीन पर खेती शुरू की। उन्हें प्राकृतिक खेती की प्रेरणा अपने पिता से मिली। इसके बाद कृषि विभाग के कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर खेती की बारीकियां सीखीं।
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उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती से उत्पादन में प्रति एकड़ लगभग 6 क्विंटल तक की कमी आती है लेकिन इसकी गुणवत्ता और स्वाद अलग ही होता है। घर में कई बार आटा खत्म होने पर पड़ोस का बनाते हैं तो वो स्वाद ही नहीं आता है। उन्होंने सरकार से मांग की कि प्राकृतिक खेती करने वाले छोटे किसानों को कृषि उपकरणों पर सब्सिडी और अन्य प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि वे संसाधनों के अभाव में पीछे न रहें।
रामनिवास ने बताया कि प्राकृतिक खेती में श्रम (लेबर) की अधिक आवश्यकता पड़ती है। इससे लागत बढ़ जाती है। वर्तमान में वे डेढ़ एकड़ से लगभग 60,000 रुपये तक का मुनाफा कमा रहे हैं जबकि लागत सामान्य खेती के मुकाबले डेढ़ गुना है। संवाद
दूसरों को कर रहे जागरूक
वह अब विभिन्न जिलों में जाकर अन्य किसानों को भी प्राकृतिक खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अब तक करीब 60 प्रशिक्षण कार्यक्रमों और तकनीकी कार्यशालाओं में भाग ले चुके हैं। उन्होंने किसानों को शुरुआत में थोड़ी जमीन से ही प्राकृतिक खेती का प्रयोग करने की सलाह दी है। वह खेत में हर तीन साल में जीवामृत और गोबर की खाद डालते हैं। खरपतवार हटाने के लिए दवाइयों की जगह खुद बनाए कीटनाशक का उपयोग करते हैं। इसमें विभिन्न पौधों के पत्तों को उबालकर, उनमें पानी और लस्सी जैसी चीजें मिलाकर छिड़काव किया जाता है।