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Rohtak News: पाकिस्तान के साथ हुए तीनों युद्धों में टिटौली के जांबाजों ने दी शहादत
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12-टिटौली गांव के शहीदों के विषय में चर्चा करते ग्रामीण। संवाद
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संवाद न्यूज एजेंसी
रोहतक। टिटौली गांव के युवाओं के खून में ही देशभक्ति बसी हुई है। पाकिस्तान के साथ हुए भारत के तीनों युद्धों में इस गांव के जवानों ने अपने शौर्य का परिचय दिया है। करीब 14,000 आबादी वाले इस गांव में 1,000 से अधिक पूर्व सैनिक और सैनिक रहते हैं।
भारत- पाकिस्तान के बीच 1965, 1971 व कारगिल युद्ध में टिटौली गांव के तीन रणबांकुरों ने देश के लिए शहादत भी दी है। कारगिल युद्ध में शहीद हुए कृष्ण की गांव में प्रतिमा भी लगाई गई है। 1971 के युद्ध में शहीद हुए भगत सिंह के नाम से टिटौली-समरगोपालपुर रोड का नामकरण किया गया है।
इस रोड पर अब उनके नाम का कोई बोर्ड नहीं है। पुल निर्माण के चलते उसे हटा दिया गया था मगर शहीद के परिजनों ने उसे दोबारा से लागने की मांग की है। गांव में कुंडू भवन के पास लगाए गए गौरव पट्ट पर भी शहीदों के नाम अंकित है। गांव में बने स्टेडियम व तीन अखाड़ों में युवा कसरत के साथ ही सेना की तैयारी करते हैं।
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श्रीराम हैं टिटौली गांव से शहीद होने वाले पहले जवान
ग्रामीण सुरेंद्र व राम किशन का दावा है कि उनके चाचा श्रीराम इस गांव से शहीद होने वाले पहले जवान हैं। 1965 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध में वे करीब 22 साल की उम्र में शहीद हो गए थे। वह विवाहित थे। उनका नाम एमडीयू में लगाई गई शिलापट्ट पर भी अंकित है लेकिन गांव में लगे गौरव पट्ट पर उनका नाम नहीं है जबकि उनका नाम गांव में प्रथम स्थान पर होना चाहिए। शहीद श्रीराम की भाभी लक्ष्मी कहती हैं कि शहीदों का सम्मान किया जाना चाहिए।
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गौरव पट्ट पर किसी का नाम नहीं तो कहीं सन् गलत
शहीदों के स्वजनों का कहना है कि गांव में लगाए गए गौरव पट्ट पर किसी का नाम नहीं लिखा गया है तो किसी की शहादत का सन गलत लिखा है। गांव के मुख्य अड्डे पर कुंडू भवन के नजदीक स्थापित गौरव पट्ट पर गांव के दो शहीदों के ही नाम लिखे हैं जबकि तीन शहीद हुए हैं। गांव के प्रथम शहीद सिपाही श्रीराम का इस पर नाम नहीं है। वहीं, दफेदार शहीद भगत की पत्नी इंद्रावती बताती हैं कि उनके पति की शहादत का वर्ष इस गौरव पट्ट पर 1965 लिखा है जबकि वे सन् 1971 में शहीद हुए थे। इसमें सुधार की मांग की है।
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गांव में अब तक तीन शहीद हुए :
गांव के पहले शहीद 1965 की लड़ाई में सिपाही श्रीराम हुए थे, जो जाट रेजिमेंट में थे।
1971 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में दफेदार भगत सिंह शहीद हुए थे।
1999 में कारगिल युद्ध में नायक कृष्ण लाल शहीद हुए थे जो जाट रेजिमेंट में थे।
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दशकों पहले से टिटौली के युवाओं का रुझान खेल व देश सेवा की ओर रहा है। यही वजह है कि इस गांव में 1000 से अधिक पूर्व सैनिक व सैनिक है। -कैप्टन राज सिंह।
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टिटौली के युवाओं के खून में ही देशभक्ति है। पाकिस्तान के साथ हुए सभी युद्धों में इस गांव के जांबाज सैनिकों ने अपना अदम्य साहस दिखाते हुए शहादत दी है। -नायब सूबेदार जयवीर सिंह।
रोहतक। टिटौली गांव के युवाओं के खून में ही देशभक्ति बसी हुई है। पाकिस्तान के साथ हुए भारत के तीनों युद्धों में इस गांव के जवानों ने अपने शौर्य का परिचय दिया है। करीब 14,000 आबादी वाले इस गांव में 1,000 से अधिक पूर्व सैनिक और सैनिक रहते हैं।
भारत- पाकिस्तान के बीच 1965, 1971 व कारगिल युद्ध में टिटौली गांव के तीन रणबांकुरों ने देश के लिए शहादत भी दी है। कारगिल युद्ध में शहीद हुए कृष्ण की गांव में प्रतिमा भी लगाई गई है। 1971 के युद्ध में शहीद हुए भगत सिंह के नाम से टिटौली-समरगोपालपुर रोड का नामकरण किया गया है।
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इस रोड पर अब उनके नाम का कोई बोर्ड नहीं है। पुल निर्माण के चलते उसे हटा दिया गया था मगर शहीद के परिजनों ने उसे दोबारा से लागने की मांग की है। गांव में कुंडू भवन के पास लगाए गए गौरव पट्ट पर भी शहीदों के नाम अंकित है। गांव में बने स्टेडियम व तीन अखाड़ों में युवा कसरत के साथ ही सेना की तैयारी करते हैं।
श्रीराम हैं टिटौली गांव से शहीद होने वाले पहले जवान
ग्रामीण सुरेंद्र व राम किशन का दावा है कि उनके चाचा श्रीराम इस गांव से शहीद होने वाले पहले जवान हैं। 1965 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध में वे करीब 22 साल की उम्र में शहीद हो गए थे। वह विवाहित थे। उनका नाम एमडीयू में लगाई गई शिलापट्ट पर भी अंकित है लेकिन गांव में लगे गौरव पट्ट पर उनका नाम नहीं है जबकि उनका नाम गांव में प्रथम स्थान पर होना चाहिए। शहीद श्रीराम की भाभी लक्ष्मी कहती हैं कि शहीदों का सम्मान किया जाना चाहिए।
गौरव पट्ट पर किसी का नाम नहीं तो कहीं सन् गलत
शहीदों के स्वजनों का कहना है कि गांव में लगाए गए गौरव पट्ट पर किसी का नाम नहीं लिखा गया है तो किसी की शहादत का सन गलत लिखा है। गांव के मुख्य अड्डे पर कुंडू भवन के नजदीक स्थापित गौरव पट्ट पर गांव के दो शहीदों के ही नाम लिखे हैं जबकि तीन शहीद हुए हैं। गांव के प्रथम शहीद सिपाही श्रीराम का इस पर नाम नहीं है। वहीं, दफेदार शहीद भगत की पत्नी इंद्रावती बताती हैं कि उनके पति की शहादत का वर्ष इस गौरव पट्ट पर 1965 लिखा है जबकि वे सन् 1971 में शहीद हुए थे। इसमें सुधार की मांग की है।
गांव में अब तक तीन शहीद हुए :
गांव के पहले शहीद 1965 की लड़ाई में सिपाही श्रीराम हुए थे, जो जाट रेजिमेंट में थे।
1971 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में दफेदार भगत सिंह शहीद हुए थे।
1999 में कारगिल युद्ध में नायक कृष्ण लाल शहीद हुए थे जो जाट रेजिमेंट में थे।
दशकों पहले से टिटौली के युवाओं का रुझान खेल व देश सेवा की ओर रहा है। यही वजह है कि इस गांव में 1000 से अधिक पूर्व सैनिक व सैनिक है। -कैप्टन राज सिंह।
टिटौली के युवाओं के खून में ही देशभक्ति है। पाकिस्तान के साथ हुए सभी युद्धों में इस गांव के जांबाज सैनिकों ने अपना अदम्य साहस दिखाते हुए शहादत दी है। -नायब सूबेदार जयवीर सिंह।

12-टिटौली गांव के शहीदों के विषय में चर्चा करते ग्रामीण। संवाद

12-टिटौली गांव के शहीदों के विषय में चर्चा करते ग्रामीण। संवाद

12-टिटौली गांव के शहीदों के विषय में चर्चा करते ग्रामीण। संवाद

12-टिटौली गांव के शहीदों के विषय में चर्चा करते ग्रामीण। संवाद

12-टिटौली गांव के शहीदों के विषय में चर्चा करते ग्रामीण। संवाद