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Yamuna Nagar News: डोडा में हुए सड़क हादसे में शेरपुर गांव के फौजी सुधीर नरवाल बलिदान
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Sat, 24 Jan 2026 01:25 AM IST
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गांव शेरपुर में बलिदानी सुधीर नरवाल के घर शोक व्यक्त करने पहुंचे ग्रामीण व रिश्तेदार। संवाद
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संवाद न्यूज एजेंसी
छछरौली (यमुनानगर)। शेरपुर गांव के फौजी सुधीर नरवाल जम्मू-कश्मीर के डोडा में हुए सड़क हादसे में शहीद हो गए। इस दुखद खबर के बाद परिवार और पूरे गांव में मातम पसरा हुआ है। शहीद सुधीर नरवाल की शहादत से हर आंख नम है। 27 जनवरी को उन्हें घर लौटना था, जिसे लेकर परिवार में खुशी का माहौल था, लेकिन अचानक आई इस खबर ने सब कुछ बदल दिया।
घटना के बाद से मां का रो-रोकर बुरा हाल है। पत्नी रूबी सुधीर की शहादत की खबर सुनते ही बेसुध हो गईं। गांव के लोग परिवार को ढांढस बंधाने पहुंच रहे हैं, लेकिन हर चेहरा गमगीन है। मां बिलखते हुए हर किसी से बेटे को वापस लाने की गुहार लगा रही है। गांव में हर ओर शोक की लहर है और लोग अपने लाल पर गर्व के साथ आंसू बहा रहे हैं।
परिवार के लोगों के अनुसार सुधीर नरवाल का बचपन से ही सेना में जाने का सपना था। उन्होंने इस सपने को साकार करने के लिए कड़ी मेहनत की। वे रोजाना गांव से करीब 20 किलोमीटर दूर जगाधरी के तेजली खेल परिसर में अभ्यास करने जाते थे। उनकी लगन और अनुशासन की मिसाल पूरे गांव में दी जाती थी। वर्ष 2016 में सुधीर सेना में भर्ती हुए और अपनी मेहनत के बल पर 27 आर्म्ड में नायक के पद तक पहुंचे।
सुधीर ने 12वीं कक्षा पास करने के बाद सेना ज्वाइन की थी और कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी। कुछ समय बाद उनके पिता हरपाल का निधन हो गया था, जिसके बाद परिवार की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर आ गई। वे दो बहनों में छोटे और इकलौते बेटे थे। बड़ी बहन कविता शादी के बाद न्यूजीलैंड में रहती हैं, जबकि दूसरी बहन कुलविंद्र की भी शादी हो चुकी है।
चार साल के बेटे के सिर से उठा पिता का साया
शहीद सुधीर नरवाल अपने पीछे पत्नी रूबी, चार साल के बेटे आयांश, मां और परिवार को छोड़ गए हैं। रूबी एक निजी कंपनी में नौकरी करती हैं। परिवार के पास करीब दो एकड़ जमीन है। परिवार के ही सुमित ने बताया कि 15 जनवरी को ही सुधीर से बात हुई थी। वे बेहद होनहार और जिम्मेदार थे। परिवार के सदस्य सुरेश पाल ने बताया कि सुधीर तीन-चार महीने में घर आते थे। पिछली बार वे दिवाली की छुट्टियों में आए थे और 12 नवंबर की शादी में शामिल होकर लौटे थे। इस बार 27 जनवरी को आने की खबर से घर में रौनक थी। फिलहाल खराब मौसम के कारण पार्थिव देह को गांव लाने में दिक्कत आ रही है। वहीं न्यूजीलैंड में रह रही बहन के पहुंचने में भी समय लगेगा।
घर आने के इंतजार में सजा था आंगन
संवाद न्यूज एजेंसी
छछरौली। शेरपुर गांव में परिवार का आंगन 27 जनवरी की तैयारी में सजा था। मां बेटे के पसंदीदा पकवानों की बात कर रही थीं, पत्नी रूबी ने घर लौटने की तारीख कैलेंडर पर घेर रखी थी और चार साल का आयांश हर आने-जाने वाले से पूछ रहा था पापा कब आएंगे? किसी को अंदेशा नहीं था कि यह इंतज़ार कभी पूरा नहीं होगा।
जम्मू-कश्मीर के डोडा में सड़क हादसे में फौजी सुधीर नरवाल के शहीद होने की खबर जैसे ही गांव पहुंची, खुशियों की जगह सन्नाटा पसर गया। मां का विलाप थम नहीं रहा। हर आंसू में बस एक ही सवाल मेरा बेटा कब आएगा?। पत्नी रूबी खबर सुनते ही बेसुध हो गईं। वह दरवाजे की ओर टकटकी लगाए बैठी हैं, मानो अभी सुधीर वर्दी में मुस्कुराते हुए भीतर आ जाएंगे।
सुधीर घर के इकलौता बेटे थे। दो बहनों के छोटे भाई, मां का सहारा और परिवार की ढाल। पिता के निधन के बाद उसने जिम्मेदारियों को चुपचाप अपने कंधों पर उठा लिया था। गांव वाले बताते हैं कि वे छुट्टियों में भी अनुशासन नहीं छोड़ते थे सुबह दौड़, शाम बच्चों को देशभक्ति की कहानियां। आज वही गांव अपने लाल पर गर्व करता है, लेकिन आंखें नम हैं। आयांश की मासूम उंगलियां मां पकड़े हैं, उसे अभी यह समझना बाकी है कि पिता अब तस्वीरों और यादों में रहेंगे।
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छछरौली (यमुनानगर)। शेरपुर गांव के फौजी सुधीर नरवाल जम्मू-कश्मीर के डोडा में हुए सड़क हादसे में शहीद हो गए। इस दुखद खबर के बाद परिवार और पूरे गांव में मातम पसरा हुआ है। शहीद सुधीर नरवाल की शहादत से हर आंख नम है। 27 जनवरी को उन्हें घर लौटना था, जिसे लेकर परिवार में खुशी का माहौल था, लेकिन अचानक आई इस खबर ने सब कुछ बदल दिया।
घटना के बाद से मां का रो-रोकर बुरा हाल है। पत्नी रूबी सुधीर की शहादत की खबर सुनते ही बेसुध हो गईं। गांव के लोग परिवार को ढांढस बंधाने पहुंच रहे हैं, लेकिन हर चेहरा गमगीन है। मां बिलखते हुए हर किसी से बेटे को वापस लाने की गुहार लगा रही है। गांव में हर ओर शोक की लहर है और लोग अपने लाल पर गर्व के साथ आंसू बहा रहे हैं।
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परिवार के लोगों के अनुसार सुधीर नरवाल का बचपन से ही सेना में जाने का सपना था। उन्होंने इस सपने को साकार करने के लिए कड़ी मेहनत की। वे रोजाना गांव से करीब 20 किलोमीटर दूर जगाधरी के तेजली खेल परिसर में अभ्यास करने जाते थे। उनकी लगन और अनुशासन की मिसाल पूरे गांव में दी जाती थी। वर्ष 2016 में सुधीर सेना में भर्ती हुए और अपनी मेहनत के बल पर 27 आर्म्ड में नायक के पद तक पहुंचे।
सुधीर ने 12वीं कक्षा पास करने के बाद सेना ज्वाइन की थी और कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी। कुछ समय बाद उनके पिता हरपाल का निधन हो गया था, जिसके बाद परिवार की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर आ गई। वे दो बहनों में छोटे और इकलौते बेटे थे। बड़ी बहन कविता शादी के बाद न्यूजीलैंड में रहती हैं, जबकि दूसरी बहन कुलविंद्र की भी शादी हो चुकी है।
चार साल के बेटे के सिर से उठा पिता का साया
शहीद सुधीर नरवाल अपने पीछे पत्नी रूबी, चार साल के बेटे आयांश, मां और परिवार को छोड़ गए हैं। रूबी एक निजी कंपनी में नौकरी करती हैं। परिवार के पास करीब दो एकड़ जमीन है। परिवार के ही सुमित ने बताया कि 15 जनवरी को ही सुधीर से बात हुई थी। वे बेहद होनहार और जिम्मेदार थे। परिवार के सदस्य सुरेश पाल ने बताया कि सुधीर तीन-चार महीने में घर आते थे। पिछली बार वे दिवाली की छुट्टियों में आए थे और 12 नवंबर की शादी में शामिल होकर लौटे थे। इस बार 27 जनवरी को आने की खबर से घर में रौनक थी। फिलहाल खराब मौसम के कारण पार्थिव देह को गांव लाने में दिक्कत आ रही है। वहीं न्यूजीलैंड में रह रही बहन के पहुंचने में भी समय लगेगा।
घर आने के इंतजार में सजा था आंगन
संवाद न्यूज एजेंसी
छछरौली। शेरपुर गांव में परिवार का आंगन 27 जनवरी की तैयारी में सजा था। मां बेटे के पसंदीदा पकवानों की बात कर रही थीं, पत्नी रूबी ने घर लौटने की तारीख कैलेंडर पर घेर रखी थी और चार साल का आयांश हर आने-जाने वाले से पूछ रहा था पापा कब आएंगे? किसी को अंदेशा नहीं था कि यह इंतज़ार कभी पूरा नहीं होगा।
जम्मू-कश्मीर के डोडा में सड़क हादसे में फौजी सुधीर नरवाल के शहीद होने की खबर जैसे ही गांव पहुंची, खुशियों की जगह सन्नाटा पसर गया। मां का विलाप थम नहीं रहा। हर आंसू में बस एक ही सवाल मेरा बेटा कब आएगा?। पत्नी रूबी खबर सुनते ही बेसुध हो गईं। वह दरवाजे की ओर टकटकी लगाए बैठी हैं, मानो अभी सुधीर वर्दी में मुस्कुराते हुए भीतर आ जाएंगे।
सुधीर घर के इकलौता बेटे थे। दो बहनों के छोटे भाई, मां का सहारा और परिवार की ढाल। पिता के निधन के बाद उसने जिम्मेदारियों को चुपचाप अपने कंधों पर उठा लिया था। गांव वाले बताते हैं कि वे छुट्टियों में भी अनुशासन नहीं छोड़ते थे सुबह दौड़, शाम बच्चों को देशभक्ति की कहानियां। आज वही गांव अपने लाल पर गर्व करता है, लेकिन आंखें नम हैं। आयांश की मासूम उंगलियां मां पकड़े हैं, उसे अभी यह समझना बाकी है कि पिता अब तस्वीरों और यादों में रहेंगे।

गांव शेरपुर में बलिदानी सुधीर नरवाल के घर शोक व्यक्त करने पहुंचे ग्रामीण व रिश्तेदार। संवाद

गांव शेरपुर में बलिदानी सुधीर नरवाल के घर शोक व्यक्त करने पहुंचे ग्रामीण व रिश्तेदार। संवाद

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