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अंकों की अनदेखी कर जूनियर को नियुक्ति देना असंवैधानिक : हाईकोर्ट
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Sun, 03 May 2026 11:10 PM IST
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यमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की एकल पीठ का अहम फैसला
पूर्व सैनिक को सब-इंस्पेक्टर बनाने के दिए आदेश
17 साल बाद मिली न्यायिक राहत, सेवानिवृत्ति से पहले पदोन्नति का रास्ता साफ
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने पूर्व सैनिक नंद लाल ठाकुर के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सरकारी नियुक्तियों में मेरिट की अनदेखी कर केवल पंजीकरण वरिष्ठता के आधार पर चयन करना असंवैधानिक है। वर्तमान में बरमाणा थाना के अंतर्गत ट्रैफिक पुलिस में हेड कांस्टेबल के पद पर कार्यरत नंद लाल ठाकुर को अब वर्ष 2009 से सब-इंस्पेक्टर पद पर नियुक्ति का लाभ मिलेगा। उनकी सेवानिवृत्ति आगामी जून माह में प्रस्तावित है और इस फैसले से उनके डीएसपी पद से सेवानिवृत्त होने की संभावना भी बन गई है।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की एकल पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिए कि याचिकाकर्ता को 2009 से सब-इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त किया जाए और सभी सेवा लाभ प्रदान किए जाएं।यह मामला वर्ष 2009 की पुलिस भर्ती से जुड़ा है। नंद लाल ठाकुर ने सब-इंस्पेक्टर पद के लिए आवेदन किया था और साक्षात्कार में 37 अंक प्राप्त किए थे, जबकि चयनित उम्मीदवारों के अंक 35 थे। इसके बावजूद विभाग ने कम अंक पाने वाले उम्मीदवारों को सब-इंस्पेक्टर नियुक्त कर दिया और याचिकाकर्ता को निचले पद पर नियुक्त किया गया। राज्य सरकार ने दलील दी कि चयन प्रक्रिया में पंजीकरण की सीनियरिटी को आधार बनाया गया था और पहले से सेवानिवृत्त उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी गई। अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि चयन मानदंडों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिक अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवार की अनदेखी करना मनमाना और असंवैधानिक है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का सीधा उल्लंघन है। अदालत ने इसे चयन प्रक्रिया के उद्देश्य के विपरीत बताया।
अदालत ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देते हुए निर्देश दिए कि नंद लाल ठाकुर को सब-इंस्पेक्टर पद पर 2009 से नियुक्ति दी जाए। उन्हें सभी सेवा लाभ और वेतन का लाभ प्रदान किया जाए। वरिष्ठता सूची में उन्हें कम अंक पाने वाले उम्मीदवारों से ऊपर रखा जाए। यदि पद उपलब्ध न हो तो अतिरिक्त पद सृजित किया जाए। तीन महीने के भीतर आदेश लागू न होने पर 6% ब्याज के साथ बकाया भुगतान किया जाए। हालांकि अदालत ने पहले से नियुक्त कर्मचारियों की सेवाएं रद्द नहीं कीं। कोर्ट ने कहा कि उनकी नियुक्ति में उनकी कोई व्यक्तिगत गलती नहीं थी, इसलिए उन्हें हटाना न्यायसंगत नहीं होगा। फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए नंद लाल ठाकुर ने इसे न्याय की जीत बताया। उन्होंने न्यायालय का आभार व्यक्त करते हुए राज्य सरकार और पुलिस विभाग से आदेश को शीघ्र लागू करने की अपेक्षा जताई।
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने पूर्व सैनिक नंद लाल ठाकुर के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सरकारी नियुक्तियों में मेरिट की अनदेखी कर केवल पंजीकरण वरिष्ठता के आधार पर चयन करना असंवैधानिक है। वर्तमान में बरमाणा थाना के अंतर्गत ट्रैफिक पुलिस में हेड कांस्टेबल के पद पर कार्यरत नंद लाल ठाकुर को अब वर्ष 2009 से सब-इंस्पेक्टर पद पर नियुक्ति का लाभ मिलेगा। उनकी सेवानिवृत्ति आगामी जून माह में प्रस्तावित है और इस फैसले से उनके डीएसपी पद से सेवानिवृत्त होने की संभावना भी बन गई है।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की एकल पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिए कि याचिकाकर्ता को 2009 से सब-इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त किया जाए और सभी सेवा लाभ प्रदान किए जाएं।यह मामला वर्ष 2009 की पुलिस भर्ती से जुड़ा है। नंद लाल ठाकुर ने सब-इंस्पेक्टर पद के लिए आवेदन किया था और साक्षात्कार में 37 अंक प्राप्त किए थे, जबकि चयनित उम्मीदवारों के अंक 35 थे। इसके बावजूद विभाग ने कम अंक पाने वाले उम्मीदवारों को सब-इंस्पेक्टर नियुक्त कर दिया और याचिकाकर्ता को निचले पद पर नियुक्त किया गया। राज्य सरकार ने दलील दी कि चयन प्रक्रिया में पंजीकरण की सीनियरिटी को आधार बनाया गया था और पहले से सेवानिवृत्त उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी गई। अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि चयन मानदंडों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिक अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवार की अनदेखी करना मनमाना और असंवैधानिक है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का सीधा उल्लंघन है। अदालत ने इसे चयन प्रक्रिया के उद्देश्य के विपरीत बताया।
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अदालत ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देते हुए निर्देश दिए कि नंद लाल ठाकुर को सब-इंस्पेक्टर पद पर 2009 से नियुक्ति दी जाए। उन्हें सभी सेवा लाभ और वेतन का लाभ प्रदान किया जाए। वरिष्ठता सूची में उन्हें कम अंक पाने वाले उम्मीदवारों से ऊपर रखा जाए। यदि पद उपलब्ध न हो तो अतिरिक्त पद सृजित किया जाए। तीन महीने के भीतर आदेश लागू न होने पर 6% ब्याज के साथ बकाया भुगतान किया जाए। हालांकि अदालत ने पहले से नियुक्त कर्मचारियों की सेवाएं रद्द नहीं कीं। कोर्ट ने कहा कि उनकी नियुक्ति में उनकी कोई व्यक्तिगत गलती नहीं थी, इसलिए उन्हें हटाना न्यायसंगत नहीं होगा। फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए नंद लाल ठाकुर ने इसे न्याय की जीत बताया। उन्होंने न्यायालय का आभार व्यक्त करते हुए राज्य सरकार और पुलिस विभाग से आदेश को शीघ्र लागू करने की अपेक्षा जताई।
