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Bilaspur News: भाखड़ा डैम विस्थापितों की चौथी, पांचवीं पीढ़ी को भूमिहीन घोषित करने की मांग
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Wed, 28 Jan 2026 11:55 PM IST
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विस्थापित सभा ने सरकार से पुनर्वास नीति में बदलाव की मांग उठाई
कागजों में जमीन, हकीकत में बेघर हो रहीं विस्थापित पीढ़ियां।
मंडी मानवां में बसे विस्थापित परिवारों ने घर बनाने के लिए जमीन मांगी
पांच बिस्वा जमीन में कई पीढ़ियों के बसाव से बढ़ी विस्थापितों की परेशानी
भाखड़ा डैम विस्थापितों को आज भी स्थायी पुनर्वास का इंतजार।
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। भाखड़ा डैम के निर्माण से वर्ष 1954 में उजड़े परिवारों की चौथी और पांचवीं पीढ़ी आज भी पुनर्वास के अभाव में संघर्षपूर्ण जीवन जीने को मजबूर है। सदर विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत नौणी के गांव मंडी मानवां में बसे भाखड़ा डैम विस्थापित परिवारों ने सरकार से मांग की है कि उनकी वर्तमान पीढ़ियों को भूमिहीन श्रेणी में शामिल कर घर बनाने के लिए 2 से 3 बिस्वा भूमि प्रदान की जाए।
भाखड़ा डैम विस्थापित सभा मानवां के अध्यक्ष रमेश चंद कौंडल ने बताया कि भाखड़ा डैम के कारण बिलासपुर शहर तथा आसपास के गांव पुड्ड, दन्दियुटी, कशनीऊर, तबतण, नडोआ, बरोटा, ज्योरी, कुरीघाट सहित कई क्षेत्रों के लोग उजड़ गए थे। तत्कालीन प्रशासन द्वारा इन परिवारों को गांव मंडी मानवां में बसाया गया और प्रत्येक परिवार को मकान योग्य केवल पांच बिस्वा भूमि दी गई। बताया कि घरों और खेतों के बदले विस्थापितों को मात्र 50 और 100 रुपये मुआवजा दिया गया, जो उस समय भी ऊंट के मुंह में जीरा के समान था। यह राशि परिवारों के बच्चों की दो वक्त की रोटी में ही खर्च हो गई। मजबूरी में विस्थापित परिवार अपने आठ–आठ बच्चों के साथ मंडी मानवां पहुंचे, जहां न तो पर्याप्त संसाधन थे और न ही रोजगार के साधन। विस्थापितों ने बताया कि गरीबी के कारण बच्चों की पढ़ाई छूट गई और जिन हाथों में कलम होनी चाहिए थी, उनमें गैंती, बेलचा और टोकरी थम गई। प्रारंभ में झोपड़ियां बनाकर जीवन शुरू किया गया। बाद में सरकार द्वारा दिए गए ऋण से कुछ परिवारों ने पक्के घर बनाए, लेकिन अत्यधिक गरीबी के चलते ऋण चुकाना संभव नहीं हो पाया, जिससे कई परिवारों पर कुर्की की नौबत तक आ गई। हालांकि बाद में राज्य सरकार ने इन ऋणों का ब्याज और मूलधन माफ किया, लेकिन आज स्थिति यह है कि जिन परिवारों को 5 बिस्वा भूमि दी गई थी, वह अब तीसरी, चौथी और पांचवीं पीढ़ी में बंट चुकी है। एक ही जमीन पर लगभग 70 हिस्सेदार हो चुके हैं। कागजों में ये परिवार भूमिधर माने जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में प्रति व्यक्ति के हिस्से में फुट भर भी जमीन नहीं बचती।
पटवारी रिकॉर्ड में भूमि होने के कारण इन परिवारों को भूमिहीन प्रमाण पत्र भी नहीं मिल पा रहा है, जिससे वे सरकारी आवास योजनाओं और अन्य सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। परिणामस्वरूप कई परिवारों के सामने दोबारा बेघर होने का संकट खड़ा हो गया है। रमेश चंद कौंडल सहित श्याम लाल, मस्त राम, प्रदीप कुमार, साक्षी कुमार, रज्जाक मोहम्मद, सुख राम, संजय कुमार, अनिल कुमार, प्रकाश चंद, दीप राम और रत्न लाल सहित दर्जनों विस्थापित परिवारों के सदस्यों ने सरकार से आग्रह किया है कि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए भाखड़ा डैम विस्थापितों की वर्तमान पीढ़ियों को भूमिहीन श्रेणी में लाकर उनके नाम से अलग मकान योग्य भूमि दी जाए, ताकि वे अपने परिवारों के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।
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मंडी मानवां में बसे विस्थापित परिवारों ने घर बनाने के लिए जमीन मांगी
पांच बिस्वा जमीन में कई पीढ़ियों के बसाव से बढ़ी विस्थापितों की परेशानी
भाखड़ा डैम विस्थापितों को आज भी स्थायी पुनर्वास का इंतजार।
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। भाखड़ा डैम के निर्माण से वर्ष 1954 में उजड़े परिवारों की चौथी और पांचवीं पीढ़ी आज भी पुनर्वास के अभाव में संघर्षपूर्ण जीवन जीने को मजबूर है। सदर विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत नौणी के गांव मंडी मानवां में बसे भाखड़ा डैम विस्थापित परिवारों ने सरकार से मांग की है कि उनकी वर्तमान पीढ़ियों को भूमिहीन श्रेणी में शामिल कर घर बनाने के लिए 2 से 3 बिस्वा भूमि प्रदान की जाए।
भाखड़ा डैम विस्थापित सभा मानवां के अध्यक्ष रमेश चंद कौंडल ने बताया कि भाखड़ा डैम के कारण बिलासपुर शहर तथा आसपास के गांव पुड्ड, दन्दियुटी, कशनीऊर, तबतण, नडोआ, बरोटा, ज्योरी, कुरीघाट सहित कई क्षेत्रों के लोग उजड़ गए थे। तत्कालीन प्रशासन द्वारा इन परिवारों को गांव मंडी मानवां में बसाया गया और प्रत्येक परिवार को मकान योग्य केवल पांच बिस्वा भूमि दी गई। बताया कि घरों और खेतों के बदले विस्थापितों को मात्र 50 और 100 रुपये मुआवजा दिया गया, जो उस समय भी ऊंट के मुंह में जीरा के समान था। यह राशि परिवारों के बच्चों की दो वक्त की रोटी में ही खर्च हो गई। मजबूरी में विस्थापित परिवार अपने आठ–आठ बच्चों के साथ मंडी मानवां पहुंचे, जहां न तो पर्याप्त संसाधन थे और न ही रोजगार के साधन। विस्थापितों ने बताया कि गरीबी के कारण बच्चों की पढ़ाई छूट गई और जिन हाथों में कलम होनी चाहिए थी, उनमें गैंती, बेलचा और टोकरी थम गई। प्रारंभ में झोपड़ियां बनाकर जीवन शुरू किया गया। बाद में सरकार द्वारा दिए गए ऋण से कुछ परिवारों ने पक्के घर बनाए, लेकिन अत्यधिक गरीबी के चलते ऋण चुकाना संभव नहीं हो पाया, जिससे कई परिवारों पर कुर्की की नौबत तक आ गई। हालांकि बाद में राज्य सरकार ने इन ऋणों का ब्याज और मूलधन माफ किया, लेकिन आज स्थिति यह है कि जिन परिवारों को 5 बिस्वा भूमि दी गई थी, वह अब तीसरी, चौथी और पांचवीं पीढ़ी में बंट चुकी है। एक ही जमीन पर लगभग 70 हिस्सेदार हो चुके हैं। कागजों में ये परिवार भूमिधर माने जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में प्रति व्यक्ति के हिस्से में फुट भर भी जमीन नहीं बचती।
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पटवारी रिकॉर्ड में भूमि होने के कारण इन परिवारों को भूमिहीन प्रमाण पत्र भी नहीं मिल पा रहा है, जिससे वे सरकारी आवास योजनाओं और अन्य सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। परिणामस्वरूप कई परिवारों के सामने दोबारा बेघर होने का संकट खड़ा हो गया है। रमेश चंद कौंडल सहित श्याम लाल, मस्त राम, प्रदीप कुमार, साक्षी कुमार, रज्जाक मोहम्मद, सुख राम, संजय कुमार, अनिल कुमार, प्रकाश चंद, दीप राम और रत्न लाल सहित दर्जनों विस्थापित परिवारों के सदस्यों ने सरकार से आग्रह किया है कि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए भाखड़ा डैम विस्थापितों की वर्तमान पीढ़ियों को भूमिहीन श्रेणी में लाकर उनके नाम से अलग मकान योग्य भूमि दी जाए, ताकि वे अपने परिवारों के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।