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हिमाचल: उम्र 96, हौसला जवान, साक्षर बनने के लिए परसिनो ने दी परीक्षा; 86 वर्ष की बंती ने भी दिखाया जज्बा
प्रियंका ठाकुर, बिलासपुर।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Mon, 16 Mar 2026 11:58 AM IST
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सार
हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर में 96 वर्ष की परसिनो सहित अन्य निरक्षरों ने साक्षर बनने के लिए परीक्षा दी। वहीं, उपमंडल सदर के मंगरोट गांव की 86 वर्ष की बंती देवी ने भी अपने नजदीकी परीक्षा केंद्र में उत्साह के साथ परीक्षा में भाग लिया।
घर पर परीक्षा देतीं परसिनो और परीक्षा केंद्र के बाहर बंती देवी।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
बिलासपुर जिले में तीसरी बार निरक्षर लोगों को साक्षर करने के लिए रविवार को परीक्षा करवाई गई। परीक्षा में 96 वर्ष की परसिनो सहित अन्य निरक्षरों ने भाग लिया। परीक्षा को पास करने वाले लोगों को साक्षर घोषित किया जाएगा।
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उपमंडल सदर के रघुनाथपुरा गांव की 96 वर्ष की परसिनो ने अपने घर से ही उत्साह पूर्वक परीक्षा में भाग लिया। वह चलने फिरने में असमर्थ हैं, इसके चलते शिक्षा विभाग ने घर जाकर उनकी परीक्षा ली। वह जीवन में कभी स्कूल नहीं गईं। परसिनो ने बताया कि स्कूल घर से काफी दूर था। इसलिए उस समय में लड़कों की पढ़ाई को प्राथमिकता दी जाती थी। उल्लास नवभारत साक्षरता कार्यक्रम के बारे में रघुनाथपुरा स्कूल के अध्यापक नवदीप, निशा, प्रियंका से जानकारी मिली।
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उन्होंने घर आकर इस कार्यक्रम के बारे में पूरी जानकारी दी। उनके आग्रह पर वह परीक्षा देने के लिए तैयार हो गई। अध्यापकों ने परसिनो का पंजीकरण कार्यक्रम में करवाया। उसके बाद उनको पढ़ाया और परीक्षा के लिए तैयार किया।
परसिनो ने बताया कि यदि उन्हें बचपन में पढ़ाई करने का मौका मिला होता तो वह आज अपने पैरों पर खड़ी होती। शिक्षा जीवन का आधार है। यह सोचने, समझने, और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है। इसलिए सभी लोगों का पढ़ा लिखा होना जरूरी है।
वहीं, उपमंडल सदर के मंगरोट गांव की 86 वर्ष की बंती देवी ने भी अपने नजदीकी परीक्षा केंद्र में उत्साह के साथ परीक्षा में भाग लिया। उल्लास नवभारत साक्षरता कार्यक्रम के बारे में पता चलने पर पोत बहू रेणु ने दादी सास बंती देवी को साक्षर करने की ठानी। रेणु राजकीय प्राथमिक पाठशाला मंगरोट में अध्यापिका हैं।
उन्होंने ही बंती देवी को पढ़ाया और परीक्षा की तैयारी करवाई। बंती देवी ने बताया कि उनके समय में गरीबी होने के कारण बहुत कम लोग पढ़ाई कर पाते थे। अपने बच्चों को पढ़ता देख अपना बचपन याद आता था और मन करता था कि काश मैं भी पढ़ी-लिखी होती तो आज कुछ बन गई होती। इस कार्यक्रम में पढ़ाई करने के बाद अब मैं पैसों का हिसाब करने, पढ़ने, कहीं आने-जाने में सक्षम हूं।