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Bilaspur News: प्राकृतिक खेती से बदली धमतल के किसान रवि दत्त की जिंदगी

संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर Updated Wed, 01 Apr 2026 11:52 PM IST
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Natural farming has transformed the life of Dhamtal farmer Ravi Dutt.
धमतल जुखाला के किसान रवि दत्त अपने पशुओं के साथ। स्रोत: डीपीआरओ
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जुखाला क्षेत्र के गांव धमतल निवासी 47 वर्ष के किसान रवि दत्त ने प्राकृतिक खेती अपनाकर अपनी आजीविका को नई दिशा दी है। एक समय रासायनिक खेती पर निर्भर रहने वाले रवि दत्त आज प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से बेहतर उत्पादन कर रहे हैं और उनकी आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उनकी सफलता क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है।

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रवि दत्त ने बताया कि पहले वे भी पारंपरिक तरीके से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग कर खेती करते थे। लेकिन समय के साथ खेती की लागत लगातार बढ़ती गई और मिट्टी की उर्वरता में गिरावट आने लगी। उत्पादन तो मिल रहा था, लेकिन मुनाफा कम होता जा रहा था। इसी समस्या ने उन्हें खेती के वैकल्पिक तरीकों के बारे में सोचने पर मजबूर किया।

वर्ष 2018 में रवि दत्त ने प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी प्राप्त की और इसे अपनाने का निर्णय लिया। शुरुआती दौर में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इस पद्धति को समझा और अपने खेतों में लागू किया। आज वे पूरी तरह प्राकृतिक खेती आधारित मॉडल पर कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में रवि दत्त अपने खेतों में मक्की, गेहूं, कोदरा, विभिन्न प्रकार की दालें, मटर, टमाटर सहित अन्य सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं।

फसल विविधता के कारण उन्हें साल भर आय के स्रोत मिलते हैं और किसी एक फसल पर निर्भरता भी कम हुई है। इससे जोखिम भी घटा है और आमदनी स्थिर बनी रहती है। प्राकृतिक खेती अपनाने के साथ ही रवि दत्त ने वर्ष 2018 में देसी नस्ल की गिर गाय भी पाली। वर्तमान में उनके पास दो बड़ी गायें और एक बछड़ी है। वे बताते हैं कि देसी गाय के गोबर और गौमूत्र से तैयार जीवामृत, घनजीवामृत और अन्य प्राकृतिक घोल उनकी खेती की रीढ़ हैं। इनका उपयोग करने से मिट्टी की उर्वरता में सुधार हुआ है, फसलों की गुणवत्ता बेहतर हुई है और रासायनिक इनपुट की आवश्यकता समाप्त हो गई है।

कम लागत, ज्यादा मुनाफे ने बदली आर्थिक स्थिति
प्राकृतिक खेती के कारण रवि दत्त की खेती की लागत में भारी कमी आई है। पहले जहां उर्वरक और कीटनाशकों पर अधिक खर्च होता था, वहीं अब स्थानीय संसाधनों से ही खेती हो रही है। गत वर्ष उन्होंने लगभग 4 क्विंटल मक्की का उत्पादन किया, जिसे जिला आत्मा प्रोजेक्ट के माध्यम से 40 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचा गया और उन्हें 1600 रुपये की आय प्राप्त हुई। इसके अलावा गेहूं और अन्य फसलों से भी उन्हें अच्छे दाम मिल रहे हैं।

स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों को लाभ
रवि दत्त का कहना है कि प्राकृतिक खेती से तैयार फसलें न केवल रसायन मुक्त होती हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी सुरक्षित और पौष्टिक होती हैं। साथ ही यह पद्धति पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि इससे मिट्टी, जल और जैव विविधता को नुकसान नहीं पहुंचता।
 

सरकार की एमएसपी नीति से बढ़ा किसानों का भरोसा
रवि दत्त ने बताया कि प्रदेश सरकार द्वारा प्राकृतिक रूप से उगाई गई फसलों जैसे गेहूं, मक्की और हल्दी के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करना एक सराहनीय कदम है। इससे किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल रहा है और वे प्राकृतिक खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार ने कहा कि सरकार द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों को समयबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है, ताकि अधिक से अधिक पात्र किसानों और नागरिकों को इसका लाभ मिल सके। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रशासन पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।
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