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Bilaspur News: झील का जलस्तर घटा, सांडू मैदान में बाहर आए ऐतिहासिक मंदिर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Sun, 15 Feb 2026 11:41 PM IST
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सांडू मैदान में पूरी तरह बाहर आए ऐतिहासिक मंदिर। संवाद
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छठी से 17वीं सदी के शिखर शैली के मंदिर फिर दिखाने लगे प्राचीन वैभव
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। गोबिंद सागर झील का जलस्तर लगातार घटने के साथ सांडू मैदान क्षेत्र में जलमग्न हुए कहलूर रियासत के ऐतिहासिक मंदिर अब पूरी तरह बाहर आ गए हैं। बीते करीब चार माह से पानी में डूबे रहे ये मंदिर अब गाद और नमी से बाहर निकलकर अपनी प्राचीन संरचना के साथ दिखाई देने लगे हैं। हर वर्ष की तरह इस बार भी फरवरी मध्य तक मंदिरों का अधिकांश हिस्सा बाहर आ गया और अब सभी मंदिर पूरी तरह दृष्टिगोचर हो रहे हैं। मार्च अंत तक झील में पानी न के बराबर रहता है।
भाखड़ा बांध बनने के बाद वर्ष 1960 में कहलूर रियासत के दर्जनों ऐतिहासिक मंदिर गोबिंद सागर में समा गए थे। वर्तमान में रंगनाथ मंदिर, खनेश्वर, नारदेश्वर, गोपाल मंदिर, मुरली मनोहर मंदिर, बाह का ठाकुरद्वारा, ककड़ी का ठाकुरद्वारा, नालू का ठाकुरद्वारा और खनमुखेश्वर मंदिर किसी तरह अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। जलस्तर बढ़ने पर ये मंदिर डूब जाते हैं और पानी घटते ही फिर बाहर आ जाते हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग कीरतपुर–मनाली से गुजरने वाले यात्रियों के लिए यह दृश्य किसी जीवित इतिहास से कम नहीं होता। गर्मियों के मौसम में जब झील का जलस्तर न्यूनतम रहता है, तब ये शिखर शैली के मंदिर अपनी नक्काशी और स्थापत्य के साथ पूरी भव्यता में नजर आते हैं। छठी से 17वीं सदी के स्थापत्य के प्रमाण आज भी मंदिरों की दीवारों और शिखरों पर स्पष्ट दिखाई देते हैं।
हालांकि हर वर्ष बढ़ रही गाद मंदिरों के अस्तित्व के लिए खतरा बनती जा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार आधा से एक फुट तक गाद बढ़ने से कई संरचनाएं दबती जा रही हैं। पानी उतरने के बाद संरक्षण के अभाव में यह क्षेत्र असामाजिक गतिविधियों का अड्डा भी बन जाता है।
पूर्व सरकार ने इन मंदिरों के संरक्षण और शिफ्टिंग के लिए करीब 1500 करोड़ रुपये की परियोजना तैयार की थी। योजना के तहत नाले के नौण क्षेत्र में टापू बनाकर मंदिरों को सुरक्षित स्थान पर स्थापित करने, नाव घाट, वॉकवे और पर्यटन सुविधाएं विकसित करने का प्रस्ताव था। वर्ष 2022 में मिट्टी परीक्षण और ब्लूप्रिंट भी तैयार हुए, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद योजना आगे नहीं बढ़ सकी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शीघ्र संरक्षण कार्य शुरू नहीं किया गया तो लगातार बढ़ती गाद के कारण भविष्य में इन मंदिरों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। फिलहाल जलस्तर घटने से मंदिरों के पूरी तरह बाहर आने से क्षेत्र में धार्मिक आस्था और पर्यटन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
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बिलासपुर। गोबिंद सागर झील का जलस्तर लगातार घटने के साथ सांडू मैदान क्षेत्र में जलमग्न हुए कहलूर रियासत के ऐतिहासिक मंदिर अब पूरी तरह बाहर आ गए हैं। बीते करीब चार माह से पानी में डूबे रहे ये मंदिर अब गाद और नमी से बाहर निकलकर अपनी प्राचीन संरचना के साथ दिखाई देने लगे हैं। हर वर्ष की तरह इस बार भी फरवरी मध्य तक मंदिरों का अधिकांश हिस्सा बाहर आ गया और अब सभी मंदिर पूरी तरह दृष्टिगोचर हो रहे हैं। मार्च अंत तक झील में पानी न के बराबर रहता है।
भाखड़ा बांध बनने के बाद वर्ष 1960 में कहलूर रियासत के दर्जनों ऐतिहासिक मंदिर गोबिंद सागर में समा गए थे। वर्तमान में रंगनाथ मंदिर, खनेश्वर, नारदेश्वर, गोपाल मंदिर, मुरली मनोहर मंदिर, बाह का ठाकुरद्वारा, ककड़ी का ठाकुरद्वारा, नालू का ठाकुरद्वारा और खनमुखेश्वर मंदिर किसी तरह अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। जलस्तर बढ़ने पर ये मंदिर डूब जाते हैं और पानी घटते ही फिर बाहर आ जाते हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग कीरतपुर–मनाली से गुजरने वाले यात्रियों के लिए यह दृश्य किसी जीवित इतिहास से कम नहीं होता। गर्मियों के मौसम में जब झील का जलस्तर न्यूनतम रहता है, तब ये शिखर शैली के मंदिर अपनी नक्काशी और स्थापत्य के साथ पूरी भव्यता में नजर आते हैं। छठी से 17वीं सदी के स्थापत्य के प्रमाण आज भी मंदिरों की दीवारों और शिखरों पर स्पष्ट दिखाई देते हैं।
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हालांकि हर वर्ष बढ़ रही गाद मंदिरों के अस्तित्व के लिए खतरा बनती जा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार आधा से एक फुट तक गाद बढ़ने से कई संरचनाएं दबती जा रही हैं। पानी उतरने के बाद संरक्षण के अभाव में यह क्षेत्र असामाजिक गतिविधियों का अड्डा भी बन जाता है।
पूर्व सरकार ने इन मंदिरों के संरक्षण और शिफ्टिंग के लिए करीब 1500 करोड़ रुपये की परियोजना तैयार की थी। योजना के तहत नाले के नौण क्षेत्र में टापू बनाकर मंदिरों को सुरक्षित स्थान पर स्थापित करने, नाव घाट, वॉकवे और पर्यटन सुविधाएं विकसित करने का प्रस्ताव था। वर्ष 2022 में मिट्टी परीक्षण और ब्लूप्रिंट भी तैयार हुए, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद योजना आगे नहीं बढ़ सकी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शीघ्र संरक्षण कार्य शुरू नहीं किया गया तो लगातार बढ़ती गाद के कारण भविष्य में इन मंदिरों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। फिलहाल जलस्तर घटने से मंदिरों के पूरी तरह बाहर आने से क्षेत्र में धार्मिक आस्था और पर्यटन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।