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Bilaspur News: बंदला धार से सीड बाल तकनीक का ट्रायल शुरू

Wed, 29 Jul 2026 11:47 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Wed, 29 Jul 2026 11:47 PM IST
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Trial of seed ball technique begins at Bandla Dhar.
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जंगलों को हरा-भरा करने की तैयारी

कम लागत, कम समय में दुर्गम क्षेत्रों में होगा प्राकृतिक वनीकरण
पहली बार बिलासपुर में सीड बॉल तकनीक से तैयार किए जाएंगे पौधे
खड़ी ढलानों और पथरीली भूमि वाले क्षेत्रों में कारगर साबित होगी पहल
पारंपरिक पौधारोपण की तुलना में कम खर्च और कम समय की जरूरत

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। जंगलों में हरियाली बढ़ाने और भूमि क्षरण से प्रभावित क्षेत्रों को फिर से हरा-भरा बनाने के लिए बिलासपुर वन मंडल ने नई पहल शुरू की है। सदर वन परिक्षेत्र के तहत पहली बार सीड बाल तकनीक से वनीकरण का ट्रायल शुरू किया है। इसकी शुरुआत बंदला धार के दुर्गम और क्षरणग्रस्त वन क्षेत्रों से की गई है। वन विभाग का उद्देश्य ऐसे स्थानों पर प्राकृतिक तरीके से नए पौधे तैयार करना है, जहां पारंपरिक पौधरोपण करना चुनौतीपूर्ण रहता है।
क्षेत्रीय वन अधिकारी नरेंद्र सिंह दयाल के मार्गदर्शन में शुरू किए अभियान के तहत मानसून के दौरान तैयार सीड बॉल जंगलों में बिखेरे जा रहे हैं। वन विभाग का मानना है कि यह तकनीक कम लागत और कम समय में अधिक क्षेत्र में हरित आवरण बढ़ाने में प्रभावी साबित हो सकती है। ट्रायल के परिणामों के आधार पर भविष्य में इसे वन मंडल के अन्य क्षेत्रों में भी लागू करने की योजना है।
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वन विभाग के अनुसार बंदला धार सहित कई वन क्षेत्रों में अधिक ढलान, पथरीली जमीन, मिट्टी के कटाव और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पारंपरिक तरीके से पौधरोपण करना कठिन होता है। कई स्थानों तक पौधे पहुंचाना और उनकी देखभाल करना भी चुनौतीपूर्ण रहता है। ऐसे क्षेत्रों में सीड बॉल तकनीक प्राकृतिक पुनर्जनन का प्रभावी विकल्प बन सकती है। बारिश के दौरान पर्याप्त नमी मिलने पर बीज स्वतः अंकुरित होकर नए पौधों में विकसित हो जाते हैं, जिससे उन क्षेत्रों में भी हरियाली बढ़ने की उम्मीद है जहां वन आवरण कम है।
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सीड बॉल तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें नर्सरी तैयार करने, गड्ढे खोदने, पौधे रोपने और उनकी सिंचाई जैसी प्रक्रियाओं की आवश्यकता काफी कम हो जाती है। इससे मानव श्रम और लागत दोनों में कमी आती है। साथ ही ऐसे दुर्गम क्षेत्रों में भी वनीकरण संभव हो पाता है, जहां सामान्य तरीके अपनाना कठिन होता है।
वन विभाग स्थानीय और पर्यावरण के अनुकूल वृक्ष प्रजातियों के बीजों का चयन कर उन्हें मिट्टी, वर्मी कम्पोस्ट और कोकोपीट अथवा सूखी घास के मिश्रण से तैयार गोलों में सुरक्षित रख रहा है। मिट्टी की बाहरी परत बीजों को पक्षियों, कीटों और प्रतिकूल मौसम से बचाती है। बारिश के दौरान नमी मिलने पर यह परत धीरे-धीरे गल जाती है और बीज अंकुरित होकर पौधे के रूप में विकसित होने लगता है।
क्या है सीड बॉल तकनीक?
सीड बॉल मिट्टी, वर्मी कम्पोस्ट तथा कोकोपीट या सूखी घास से तैयार छोटे-छोटे गोलाकार गोले होते हैं, जिनके भीतर पौधों के बीज सुरक्षित रखे जाते हैं। मानसून के दौरान इन्हें जंगलों और दुर्गम क्षेत्रों में बिखेर दिया जाता है। बारिश का पानी मिलने पर इनकी बाहरी परत नरम हो जाती है और बीजों को नमी व पोषण मिलता है। इसके बाद बीज स्वतः अंकुरित होकर पौधे का रूप ले लेते हैं।

सफलता का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा
वन विभाग ट्रायल की लगातार निगरानी करेगा। सीड बॉल से कितने बीज अंकुरित हुए, कितने पौधे विकसित हुए और उनकी जीवित रहने की दर क्या रही, इसका वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा। परिणाम उत्साहजनक रहे तो भविष्य में बिलासपुर वन मंडल के अन्य दुर्गम और क्षरणग्रस्त वन क्षेत्रों में भी इस तकनीक का विस्तार किया जाएगा। कम खर्च में बड़े स्तर पर वनीकरण के लिए यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है।
- नरेंद्र सिंह दयाल, क्षेत्रीय वन अधिकारी, बिलासपुर
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