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Chamba News: पांगी घाटी का पारंपरिक आहार बना वैश्विक पहचान
Fri, 31 Jul 2026 11:11 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
Updated Fri, 31 Jul 2026 11:11 PM IST
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शोध में पांगी घाटी की डाइट को मिला सुरक्षात्मक आहार का दर्जा
संवाद न्यूज एजेंसी
चंबा। जिले की दुर्गम पांगी घाटी की समृद्ध और अनूठी खाद्य परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। पंगवाल और भोट समुदाय के पारंपरिक खान-पान पर आधारित एक शोध प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन में पहली बार भारतीय हिमालय के किसी समुदाय के पारंपरिक आहार को एक नामित सुरक्षात्मक आहार के रूप में मान्यता देते हुए इसे पांगी घाटी की डाइट नाम दिया गया है।
शोध के अनुसार पांगी घाटी के लोगों के भोजन में शामिल मोटे अनाज, जैसे कुट्टू और जौ, याॅक के दुग्ध उत्पाद जैसे छांग और चुरपा और उच्च एंटी ऑक्सीडेंट वाले जंगली पौधे हृदय रोग, मधुमेह समेत कई गैर-संचारी रोगों के जोखिम को कम करने में सहायक हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि यहां के पारंपरिक, शुद्ध और बिना प्रसंस्कृत भोजन में सोडियम और पोटेशियम का अनुपात संतुलित है। यह बेहतर स्वास्थ्य बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस महत्वपूर्ण शोध का नेतृत्व डॉ. राजेंद्र प्रसाद राजकीय आयुर्विज्ञान महाविद्यालय टांडा के डॉ. सुनील कुमार रैना ने किया है। उनके इस प्रयास ने भारतीय पारंपरिक ज्ञान और हिमालयी जीवनशैली को वैश्विक वैज्ञानिक मंच पर नई पहचान दिलाई है। पांगी घाटी के पंगवाल और भोट समुदाय की पीढ़ियों से चली आ रही खाद्य परंपरा आज आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर भी खरी उतरी है। भरमौर-पांगी विधायक डॉ जनकराज ने भी डॉ सुनील कुमार रैना को बधाई दी है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
चंबा। जिले की दुर्गम पांगी घाटी की समृद्ध और अनूठी खाद्य परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। पंगवाल और भोट समुदाय के पारंपरिक खान-पान पर आधारित एक शोध प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन में पहली बार भारतीय हिमालय के किसी समुदाय के पारंपरिक आहार को एक नामित सुरक्षात्मक आहार के रूप में मान्यता देते हुए इसे पांगी घाटी की डाइट नाम दिया गया है।
शोध के अनुसार पांगी घाटी के लोगों के भोजन में शामिल मोटे अनाज, जैसे कुट्टू और जौ, याॅक के दुग्ध उत्पाद जैसे छांग और चुरपा और उच्च एंटी ऑक्सीडेंट वाले जंगली पौधे हृदय रोग, मधुमेह समेत कई गैर-संचारी रोगों के जोखिम को कम करने में सहायक हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि यहां के पारंपरिक, शुद्ध और बिना प्रसंस्कृत भोजन में सोडियम और पोटेशियम का अनुपात संतुलित है। यह बेहतर स्वास्थ्य बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस महत्वपूर्ण शोध का नेतृत्व डॉ. राजेंद्र प्रसाद राजकीय आयुर्विज्ञान महाविद्यालय टांडा के डॉ. सुनील कुमार रैना ने किया है। उनके इस प्रयास ने भारतीय पारंपरिक ज्ञान और हिमालयी जीवनशैली को वैश्विक वैज्ञानिक मंच पर नई पहचान दिलाई है। पांगी घाटी के पंगवाल और भोट समुदाय की पीढ़ियों से चली आ रही खाद्य परंपरा आज आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर भी खरी उतरी है। भरमौर-पांगी विधायक डॉ जनकराज ने भी डॉ सुनील कुमार रैना को बधाई दी है।
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