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Hamirpur (Himachal) News: मंजू ने बगड़ घास और चीड़ की सूखी पत्तियों में तलाशा रोजगार
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
Updated Sat, 20 Jun 2026 01:13 AM IST
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अमरोह निवासी मंजू। संवाद
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हमीरपुर। कभी घरेलू जरूरतों तक सीमित रहने वाली पारंपरिक चंगेरटू कला आज अमरोह गांव की मंजू के लिए आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन गई है। उन्होंने इस प्राचीन हस्तकला को नया स्वरूप देकर न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनी हैं।
बगड़ घास, चीड़ की सूखी पत्तियों और रंग-बिरंगे ऊनी धागों से तैयार किए जाने वाले चंगेरटू अब शादियों, धार्मिक आयोजनों और सजावट के लिए लोगों की पसंद बनते जा रहे हैं।
मंजू ने बताया कि बचपन में उन्होंने अपनी दादी और गांव की बुजुर्ग महिलाओं को यह कला करते देखा था। पहले इसका उपयोग अनाज, फल और घरेलू सामान रखने तक सीमित था, लेकिन समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होने लगी। इसे पुनर्जीवित करने के लिए उन्होंने घर से ही कार्य शुरू किया और धीरे-धीरे इसे आगे बढ़ाया।
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शुरुआत में तैयार किए गए उत्पादों को स्थानीय मेलों और प्रदर्शनियों में रखा गया, जहां लोगों ने उन्हें खूब सराहा। इसके बाद उनके कार्य को नई दिशा मिली। आज वह विभिन्न आकार और डिजाइनों के चंगेरटू और टोकरियां तैयार कर रही हैं, जिनकी मांग आसपास के क्षेत्रों के साथ-साथ अन्य जिलों से भी आने लगी है।
वर्तमान में यह कला सजावट, उपहार सामग्री, पूजा सामग्री और शादी समारोहों में मेहमानों को देने के लिए भी उपयोग की जा रही है। मंजू विशेष ऑर्डर पर ग्राहकों की पसंद के अनुसार रंग, आकार और डिजाइन तैयार करती हैं। इससे उन्हें हर माह 10 से 15 हजार रुपये की आय हो रही है।
बगड़ घास, चीड़ की सूखी पत्तियों और रंग-बिरंगे ऊनी धागों से तैयार किए जाने वाले चंगेरटू अब शादियों, धार्मिक आयोजनों और सजावट के लिए लोगों की पसंद बनते जा रहे हैं।
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मंजू ने बताया कि बचपन में उन्होंने अपनी दादी और गांव की बुजुर्ग महिलाओं को यह कला करते देखा था। पहले इसका उपयोग अनाज, फल और घरेलू सामान रखने तक सीमित था, लेकिन समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होने लगी। इसे पुनर्जीवित करने के लिए उन्होंने घर से ही कार्य शुरू किया और धीरे-धीरे इसे आगे बढ़ाया।
शुरुआत में तैयार किए गए उत्पादों को स्थानीय मेलों और प्रदर्शनियों में रखा गया, जहां लोगों ने उन्हें खूब सराहा। इसके बाद उनके कार्य को नई दिशा मिली। आज वह विभिन्न आकार और डिजाइनों के चंगेरटू और टोकरियां तैयार कर रही हैं, जिनकी मांग आसपास के क्षेत्रों के साथ-साथ अन्य जिलों से भी आने लगी है।
वर्तमान में यह कला सजावट, उपहार सामग्री, पूजा सामग्री और शादी समारोहों में मेहमानों को देने के लिए भी उपयोग की जा रही है। मंजू विशेष ऑर्डर पर ग्राहकों की पसंद के अनुसार रंग, आकार और डिजाइन तैयार करती हैं। इससे उन्हें हर माह 10 से 15 हजार रुपये की आय हो रही है।

अमरोह निवासी मंजू। संवाद

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