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हिमाचल: हाईकोर्ट ने कहा- गबन के आरोपी को नियमित करना उसके कृत्य को बढ़ावा देने जैसा

Sat, 15 Aug 2026 06:30 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 15 Aug 2026 06:30 AM IST
सार

हाईकोर्ट ने हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) की बसों में बिना टिकट यात्रियों से किराया वसूलने और गबन के आरोपी परिचालक की बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा है। 

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Himachal High Court said- Regularizing the accused of embezzlement is like encouraging his act.
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) की बसों में बिना टिकट यात्रियों से किराया वसूलने और गबन के आरोपी परिचालक की बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने याचिकाकर्ता की सेवा बहाली और नियमितीकरण की मांग को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि गबन में शामिल कर्मचारी को नियमित करना उसके गलत कार्यों को बढ़ावा देने जैसा होगा। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने अनुशासनिक और अपीलीय प्राधिकरणों के बर्खास्तगी के फैसले में हस्तक्षेप करने से साफ इन्कार कर दिया। याचिकाकर्ता एचआरटीसी में समेकित वेतन पर टीएमपीए के रूप में कार्यरत था।

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चेकिंग के दौरान पाया गया कि बस में यात्री बिना टिकट सफर कर रहे थे, जबकि याचिकाकर्ता उनसे किराया वसूल चुका था। एक मामले में बस ओवरलोड होने के बावजूद याचिकाकर्ता ने यात्रियों को टिकट जारी नहीं किए, जिन्होंने चेकिंग पॉइंट तक 8 किलोमीटर का सफर तय कर लिया था। अनुशासनिक प्राधिकरण ने अपने आदेश में ऐसे कई अन्य मामलों का भी उल्लेख किया था। याचिकाकर्ता ने बर्खास्तगी के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और बर्खास्तगी के आदेशों को रद्द करने तथा सेवा में बहाल कर नियमित करने की मांग की। अदालत ने कहा कि गबन करने वाले के लिए बर्खास्तगी के अलावा और क्या सजा होगी। अदालत यह समझने में असमर्थ है कि गबन में शामिल व्यक्ति के साथ उसकी सेवाओं की समाप्ति के अलावा और क्या व्यवहार किया जाना चाहिए। यदि ऐसे कर्मचारी को विभागीय कार्रवाई के बजाय नियमितीकरण से पुरस्कृत किया जाए, तो यह उसके गबन के कृत्य को बढ़ावा देने जैसा होगा।

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काम लेने के बाद अनुदान देने से इन्कार नहीं कर सकती सरकार : हाईकोर्ट
 प्रदेश हाईकोर्ट ने स्कूल प्रबंधन समिति (एसएमसी) के तहत कार्यरत शिक्षकों के हित में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि राज्य सरकार किसी शिक्षक से स्वीकृत पद पर निरंतर काम ले रही है, तो वह उसकी नियुक्ति प्रक्रिया में खामी या बैकडोर एंट्री का हवाला देकर देय अनुदान (ग्रांट इन एड) रोकने से इन्कार नहीं कर सकती। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि उन्हें नियमानुसार देय ग्रांट-इन-एड जारी की जाए और याचिका दायर करने से तीन साल पहले तक की अवधि का बकाया भी दिया जाए। अदालत की टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि शिक्षक की नियुक्ति में कोई अनियमितता थी तो सरकार को उसे तुरंत पद से हटाने से किसने रोका था।

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स्वीकृत पद पर काम लेने के बाद सरकार केवल नियुक्ति में खामी का तर्क देकर अनुदान देने से पीछे नहीं हट सकती। जब तक एसएमसी की ओर से नियुक्त शिक्षक सरकारी स्कूल में स्वीकृत पद पर अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं, तब तक सरकार उन्हें नियमानुसार ग्रांट-इन-एड देने के दायित्व से नहीं बच सकती। अदालत ने साफ किया कि वह याचिकाकर्ता की नियुक्ति को कानूनी रूप से वैध नहीं ठहरा रही है, लेकिन लगातार काम लेने के आधार पर वित्तीय लाभ रोकने के रवैये को गलत मानती है। याचिकाकर्ता संदीप कुमार को 20 फरवरी 2013 को सिरमौर जिले के राजकीय उच्च विद्यालय कांसर में एसएमसी के माध्यम से पीईटी के पद पर तैनात किया गया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह रिक्त स्वीकृत पद पर लगातार सेवाएं दे रहा है, लेकिन उसे ग्रांट-इन-एड नहीं दी जा रही है। वहीं राज्य सरकार और शिक्षा विभाग ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति बिना किसी विज्ञापन या साक्षात्कार प्रक्रिया के केवल एसएमसी प्रस्ताव के आधार पर हुई थी। सरकार ने इसे बैकडोर एंट्री बताते हुए कहा कि यह नियुक्ति राज्य पर बाध्यकारी नहीं है।

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