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Independence Day: अंग्रेजी सेना छोड़कर आजाद हिंद फाैज में शामिल हुए थे ओंकार चंद, पूर्व पीएम ने दिया ताम्रपत्र

Sat, 15 Aug 2026 07:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर।
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 15 Aug 2026 07:00 AM IST
सार

उपमंडल हमीरपुर के पटेरा गांव के ओंकार चंद भी ऐसे ही गुमनाम नायकों में हैं। अंग्रेजी सेना की डोगरा रेजिमेंट में भर्ती होकर उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध में कई विदेशी मोर्चों पर लड़ाई लड़ी और बंदी जीवन भी बिताया। 

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Independence Day: Omkar Chand left the British Army and joined the Azad Hind Fauj.
स्वतंत्रता सेनानी ओंकार चंद। - फोटो : संवाद

विस्तार

देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले कई स्वतंत्रता सेनानी आज इतिहास के पन्नों और परिवार की स्मृतियों तक सीमित रह गए हैं। उपमंडल हमीरपुर के पटेरा गांव के ओंकार चंद भी ऐसे ही गुमनाम नायकों में हैं। अंग्रेजी सेना की डोगरा रेजिमेंट में भर्ती होकर उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध में कई विदेशी मोर्चों पर लड़ाई लड़ी और बंदी जीवन भी बिताया। बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने अंग्रेजी सेना छोड़ दी और आजाद हिंद फौज में शामिल होकर आजादी के लिए संघर्ष किया। ओंकार चंद का जन्म 1920 में हुआ था। बेटे देशराज के अनुसार, महज 16 वर्ष की उम्र में उनके पिता डोगरा रेजिमेंट में भर्ती हुए। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्हें सिंगापुर, जापान सहित कई देशों में भेजा गया। युद्ध के दौरान उन्हें कई बार बंदी बनाया गया। ंडमान में बोस के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने अंग्रेजों की ओर से लड़ने के बजाय देश की आजादी के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया और आजाद हिंद फौज का हिस्सा बन गए। परिवार के अनुसार, देश के लिए इतना बड़ा योगदान देने वाले ओंकार चंद का नाम आज नई पीढ़ी तक नहीं पहुंच पा रहा है। 

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प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिया ताम्रपत्र
वर्ष 1972 में बिलासपुर में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से उन्हें ताम्रपत्र दिया गया। परिवहन समेत अन्य सुविधाएं भी मिलीं। वर्ष 2004 में 84 वर्ष की उम्र में ओंकार चंद का निधन हो गया। देशराज बताते हैं कि परिवार को सरकार की ओर से मिली सुविधाओं से शिकायत नहीं है। मलाल इस बात का है कि उनके पिता और ऐसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को सार्वजनिक स्मृति में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। परिवार की मांग है कि ओंकार चंद जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के नाम स्कूलों में दर्ज किए जाएं।

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