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Kangra News: बिना अनुमति निजी भूमि पर नहीं लगा सकते बिजली पोल, हटाने के आदेश
Mon, 03 Aug 2026 07:51 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Mon, 03 Aug 2026 07:51 AM IST
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धर्मशाला। निजी भूमि पर बिना स्वामी की सहमति के वर्षों से सीना ताने खड़े बिजली बोर्ड के ढांचे पर जिला एवं सत्र न्यायालय धर्मशाला ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश चिराग भानु सिंह की अदालत ने हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड को आदेश दिए हैं कि निजी भूमि पर स्थापित चार-पोल फीडर ढांचे को तुरंत हटाए और वादी से परामर्श कर उसे उसी भूमि के किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर अपने खर्च पर स्थानांतरित करे।
अदालत ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति की अनुमति के बिना उसकी भूमि पर विद्युत पोल या ढांचा खड़ा किया जाता है और उससे संपत्ति के उपयोग या मूल्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो भू-स्वामी को उसे वहां से हटवाने या स्थानांतरित कराने का पूरा कानूनी अधिकार है।
मामला तहसील कांगड़ा के नटेहड़ निवासी प्रकाश चंद बनाम सचिव ऊर्जा विभाग हिमाचल प्रदेश व अन्य से जुड़ा है। अपीलकर्ता का आरोप था कि वर्ष 2004 में बोर्ड ने बिना किसी अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) या भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया के उनकी भूमि पर चार-पोल संरचना और हाई टेंशन लाइन बिछा दी, जिससे भूमि पर निर्माण कार्य लगभग असंभव हो गया।
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दूसरी ओर विद्युत बोर्ड ने तर्क दिया था कि यह संरचना सार्वजनिक हित में 1995-96 में सहमति से लगाई गई थी, जिससे पिछले 25 वर्षों से लगभग 6,000 उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति की जा रही है। हालांकि, सुनवाई के दौरान बोर्ड लिखित या मौखिक सहमति का कोई भी दस्तावेज या साक्ष्य पेश नहीं कर सका। यहां तक कि जिरह में बोर्ड के गवाह ने स्वीकार किया कि कोई एनओसी नहीं लिया गया था और न ही कोई मुआवजा दिया गया था।
न्यायाधीश ने ट्रायल कोर्ट के पूर्व आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 की धारा 17 के तहत प्रभावित भू-स्वामी स्थानांतरण की मांग कर सकता है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि स्थानांतरण का पूरा वित्तीय बोझ विद्युत बोर्ड खुद वहन करेगा।
25 साल की बिजली आपूर्ति और 6000 उपभोक्ताओं का तर्क भी कोर्ट में फेल
इस पूरे कानूनी विवाद में सबसे रोचक पहलू बिजली बोर्ड का वह तर्क रहा, जिसमें उसने 6,000 उपभोक्ताओं की दुहाई दी। बोर्ड ने अदालत में दावा किया कि यह फीडर पिछले 25 वर्षों से सार्वजनिक हित में चल रहा है और इससे हजारों लोगों के घरों में बिजली पहुंच रही है। हालांकि जब बात कागजी सबूत और एनओसी की आई तो बोर्ड का यह दावा ध्वस्त हो गया। अदालत ने साफ कर दिया कि सार्वजनिक हित की आड़ में किसी नागरिक के संवैधानिक भूमि अधिकारों को बिना सहमति या मुआवजे के नहीं छीना जा सकता।
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अदालत ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति की अनुमति के बिना उसकी भूमि पर विद्युत पोल या ढांचा खड़ा किया जाता है और उससे संपत्ति के उपयोग या मूल्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो भू-स्वामी को उसे वहां से हटवाने या स्थानांतरित कराने का पूरा कानूनी अधिकार है।
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मामला तहसील कांगड़ा के नटेहड़ निवासी प्रकाश चंद बनाम सचिव ऊर्जा विभाग हिमाचल प्रदेश व अन्य से जुड़ा है। अपीलकर्ता का आरोप था कि वर्ष 2004 में बोर्ड ने बिना किसी अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) या भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया के उनकी भूमि पर चार-पोल संरचना और हाई टेंशन लाइन बिछा दी, जिससे भूमि पर निर्माण कार्य लगभग असंभव हो गया।
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दूसरी ओर विद्युत बोर्ड ने तर्क दिया था कि यह संरचना सार्वजनिक हित में 1995-96 में सहमति से लगाई गई थी, जिससे पिछले 25 वर्षों से लगभग 6,000 उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति की जा रही है। हालांकि, सुनवाई के दौरान बोर्ड लिखित या मौखिक सहमति का कोई भी दस्तावेज या साक्ष्य पेश नहीं कर सका। यहां तक कि जिरह में बोर्ड के गवाह ने स्वीकार किया कि कोई एनओसी नहीं लिया गया था और न ही कोई मुआवजा दिया गया था।
न्यायाधीश ने ट्रायल कोर्ट के पूर्व आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 की धारा 17 के तहत प्रभावित भू-स्वामी स्थानांतरण की मांग कर सकता है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि स्थानांतरण का पूरा वित्तीय बोझ विद्युत बोर्ड खुद वहन करेगा।
25 साल की बिजली आपूर्ति और 6000 उपभोक्ताओं का तर्क भी कोर्ट में फेल
इस पूरे कानूनी विवाद में सबसे रोचक पहलू बिजली बोर्ड का वह तर्क रहा, जिसमें उसने 6,000 उपभोक्ताओं की दुहाई दी। बोर्ड ने अदालत में दावा किया कि यह फीडर पिछले 25 वर्षों से सार्वजनिक हित में चल रहा है और इससे हजारों लोगों के घरों में बिजली पहुंच रही है। हालांकि जब बात कागजी सबूत और एनओसी की आई तो बोर्ड का यह दावा ध्वस्त हो गया। अदालत ने साफ कर दिया कि सार्वजनिक हित की आड़ में किसी नागरिक के संवैधानिक भूमि अधिकारों को बिना सहमति या मुआवजे के नहीं छीना जा सकता।