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Kangra News: गेहूं में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार में करें छिड़काव
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पालमपुर (कांगड़ा)। प्रदेश में फरवरी के प्रथम पखवाड़े में होने वाले कृषि-बागबानी कार्यों के लिए विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह जारी की है जिससे किसानों की फसल और सब्जी उत्पादन अच्छा हो सके। प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के कृषि वैज्ञानिकों की ओर से जारी की गई सलाह में कहा गया है कि गेहूं की बुआई के 30 से 35 दिन बाद जहां संकरी एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार में 2-3 पत्तियां आ गई हों, उसके नियंत्रण के लिए खरपतवारनाशी वेस्टा (मेटसल्फयूरॉन मिथाइल 20 डव्ल्यूपी + क्लोडिनाफॉप प्रोपार्जिल 15 डब्ल्यूपी 16 ग्राम प्रति 30 लीटर पानी में घोलकर एक कनाल में छिड़काव करें। जहां फसल में सिर्फ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार हों, उसके नियंत्रण के लिए 2,4-डी की 50 ग्राम मात्रा अथवा मेटसल्फयूरॉन मिथाइल (20 डब्ल्यूपी) की 0.8 मिली प्रति 30 लीटर पानी में घोलकर एक कनाल में छिड़काव करें।
गेहूं के साथ चौड़ी पत्ती वाली फसल की खेती की गई हो तो 2,4-डी या मेटसल्फयूरॉन मिथाइल का प्रयोग न करें। छिड़काव से दो-तीन दिन पहले हल्की सिंचाई करें। छिड़काव के बाद एक सप्ताह सिंचाई न करें। कृषि विवि के प्रसार निदेशक डॉ. विनोद कुमार शर्मा ने कहा कि गोभी सरसों में फूल आने से पहले यूरिया प्रयोग करें। पौधे की संख्या अगर खेत में अधिक हो तो यूरिया प्रयोग से पहले फालतू पौधे को निकालें, जबकि मूली की सुधरी किस्म पूसा हिमानी की बीजाई समतल खेतों में या मेढ़ें बनाकर 20-25 सेंटीमीटर की दूरी पर करें। फूलगोभी, बंदगोभी, प्याज और लहसुन आदि में निराई-गुड़ाई करें व यूरिया दें। इस समय लहसुन एवं प्याज की निराई गुड़ाई के बाद ही सिंचाई करें।
लहसुन में बीमारी के नियंत्रण के लिए यह करें
उन्होंने कहा कि प्याज में डाउनी मिल्डयू व परपल ब्लोच तथा लहसुन में बीमारी के नियंत्रण के लिए मैंकोजेब या रिडोमिल एमजैड का छिड़काव करें। गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग के प्रबंधन के लिए टिल्ट (प्रापिकोनाजोल 25 ईसी) या फॉलीक्योर टैवुकोनाजोल 25 ईसी या बेलाटान 25 डब्ल्यूपी का 0.1 का छिड़काव करें और 15 दिन के बाद फिर करें। तिलहनी फसलों में तेला एफिड के नियंत्रण के लिए डाईमिथोएट (30 ईसी) या ऑक्सीडेमेटोन मिथाइल (25 ईसी) दवा का छिड़काव करें। चने में फली-छेदक सुंडी के आक्रमण के प्रति सावधान रहें तथा इसका अधिक प्रकोप होने की स्थिति में वैज्ञानिकों या कृषि अधिकारियों से संपर्क करें।
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गेहूं के साथ चौड़ी पत्ती वाली फसल की खेती की गई हो तो 2,4-डी या मेटसल्फयूरॉन मिथाइल का प्रयोग न करें। छिड़काव से दो-तीन दिन पहले हल्की सिंचाई करें। छिड़काव के बाद एक सप्ताह सिंचाई न करें। कृषि विवि के प्रसार निदेशक डॉ. विनोद कुमार शर्मा ने कहा कि गोभी सरसों में फूल आने से पहले यूरिया प्रयोग करें। पौधे की संख्या अगर खेत में अधिक हो तो यूरिया प्रयोग से पहले फालतू पौधे को निकालें, जबकि मूली की सुधरी किस्म पूसा हिमानी की बीजाई समतल खेतों में या मेढ़ें बनाकर 20-25 सेंटीमीटर की दूरी पर करें। फूलगोभी, बंदगोभी, प्याज और लहसुन आदि में निराई-गुड़ाई करें व यूरिया दें। इस समय लहसुन एवं प्याज की निराई गुड़ाई के बाद ही सिंचाई करें।
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लहसुन में बीमारी के नियंत्रण के लिए यह करें
उन्होंने कहा कि प्याज में डाउनी मिल्डयू व परपल ब्लोच तथा लहसुन में बीमारी के नियंत्रण के लिए मैंकोजेब या रिडोमिल एमजैड का छिड़काव करें। गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग के प्रबंधन के लिए टिल्ट (प्रापिकोनाजोल 25 ईसी) या फॉलीक्योर टैवुकोनाजोल 25 ईसी या बेलाटान 25 डब्ल्यूपी का 0.1 का छिड़काव करें और 15 दिन के बाद फिर करें। तिलहनी फसलों में तेला एफिड के नियंत्रण के लिए डाईमिथोएट (30 ईसी) या ऑक्सीडेमेटोन मिथाइल (25 ईसी) दवा का छिड़काव करें। चने में फली-छेदक सुंडी के आक्रमण के प्रति सावधान रहें तथा इसका अधिक प्रकोप होने की स्थिति में वैज्ञानिकों या कृषि अधिकारियों से संपर्क करें।
