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Kangra News: फूलों की खुशबू से महकी रोजगार की राह
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पालमपुर (कांगड़ा)। प्रदेश की सुरम्य वादियों में बागवानी मात्र फलों के उत्पादन तक सीमित होकर नहीं रह गई है, बल्कि फूलों की खुशबू भी स्वरोजगार के नए द्वार खोल रही है। इसी कड़ी में ऊना जिले के कुटलैहड़ निवासी डॉ. नरेंद्र पाठक ने फ्लोरीकल्चर में पीएचडी की है।
अपने जुनून को हकीकत में बदलने के लिए उन्होंने पालमपुर के राख क्षेत्र में जमीन लीज पर लेकर पॉलीहाउस स्थापित कर फूलों की खेती शुरू की। यह फूल मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत की पहचान माना जाता है। सिंबिडियम ऑर्किड को अपनी खूबसूरती और लंबे जीवन काल के लिए जाना जाता है। एक बार गमले से तोड़ने के बाद यह फूल 5 से 7 सप्ताह तक तरोताजा रहता है। शादी सहित अन्य समारोहों और होटल उद्योग में इन फूलों की अच्छी खासी मांग है। यूं तो यह हिमालयी क्षेत्र का फूल है, लेकिन अमूमन भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में ही फलता-फूलता और उगाया जाता है।
डॉ. नरेंद्र ने इस चुनौती को स्वीकार किया और इसके कंद (बीज) नॉर्थ-ईस्ट से लेकर आए। आज पालमपुर के राख में उनके तीन अत्याधुनिक पॉलीहाउस में सिंबिडियम के फूलों की 50 से ज्यादा रंग बिरंगी प्रजातियां लहलहा रही हैं। लगभग 1000 वर्ग फीट में फैली यह खेती न केवल डॉ. नरेंद्र की मेहनत का परिणाम है, बल्कि उत्तर भारत में विविधतापूर्ण बागवानी का एक नया और अनूठा मॉडल भी है। विभाग की ओर से उन्हें पुष्प क्रांति योजना और अन्य योजनाओं की विभिन्न मदों में लगभग 18.50 लाख रुपये की सब्सिडी प्रदान की गई। डॉ. नरेंद्र पाठक का कहना है कि सही तकनीक और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाया जाए, तो हिमाचल का हर युवा आत्मनिर्भर बन सकता है। वह अन्य युवाओं और बागवानों को भी सिंबिडियम की खेती के गुर सिखाने के लिए तैयार हैं।
सिंबिडियम की खेती स्वरोजगार के द्वार खोलती है और कोई बागवान इस आधुनिक खेती को शुरू करना चाहता है, तो वह कांगड़ा जिले के बागवानी विभाग में संपर्क कर सकता है। - डॉ. सरिता शर्मा, विषय विशेषज्ञ उद्यान पालमपुर
विभाग पुष्प खेती के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत बागवानों की सहायता के लिए तत्पर है। डॉ. नरेंद्र पाठक ने इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है। - डॉ. अलक्ष पठानिया, उप निदेशक उद्यान जिला कांगड़ा
जिला कांगड़ा के विकास खंड रैत, धर्मशाला, बैजनाथ व भवारना के ठंडे ऊंचाई वाले क्षेत्र इस फूल की खेती के लिए उपयुक्त हैं। इसलिए बेरोजगार युवा सिंबिडयम की खेती को स्वरोजगार के तौर पर अपना सकते हैं।- डॉ. कमलशील नेगी, संयुक्त निदेशक बागवानी विभाग धर्मशाला
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अपने जुनून को हकीकत में बदलने के लिए उन्होंने पालमपुर के राख क्षेत्र में जमीन लीज पर लेकर पॉलीहाउस स्थापित कर फूलों की खेती शुरू की। यह फूल मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत की पहचान माना जाता है। सिंबिडियम ऑर्किड को अपनी खूबसूरती और लंबे जीवन काल के लिए जाना जाता है। एक बार गमले से तोड़ने के बाद यह फूल 5 से 7 सप्ताह तक तरोताजा रहता है। शादी सहित अन्य समारोहों और होटल उद्योग में इन फूलों की अच्छी खासी मांग है। यूं तो यह हिमालयी क्षेत्र का फूल है, लेकिन अमूमन भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में ही फलता-फूलता और उगाया जाता है।
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डॉ. नरेंद्र ने इस चुनौती को स्वीकार किया और इसके कंद (बीज) नॉर्थ-ईस्ट से लेकर आए। आज पालमपुर के राख में उनके तीन अत्याधुनिक पॉलीहाउस में सिंबिडियम के फूलों की 50 से ज्यादा रंग बिरंगी प्रजातियां लहलहा रही हैं। लगभग 1000 वर्ग फीट में फैली यह खेती न केवल डॉ. नरेंद्र की मेहनत का परिणाम है, बल्कि उत्तर भारत में विविधतापूर्ण बागवानी का एक नया और अनूठा मॉडल भी है। विभाग की ओर से उन्हें पुष्प क्रांति योजना और अन्य योजनाओं की विभिन्न मदों में लगभग 18.50 लाख रुपये की सब्सिडी प्रदान की गई। डॉ. नरेंद्र पाठक का कहना है कि सही तकनीक और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाया जाए, तो हिमाचल का हर युवा आत्मनिर्भर बन सकता है। वह अन्य युवाओं और बागवानों को भी सिंबिडियम की खेती के गुर सिखाने के लिए तैयार हैं।
सिंबिडियम की खेती स्वरोजगार के द्वार खोलती है और कोई बागवान इस आधुनिक खेती को शुरू करना चाहता है, तो वह कांगड़ा जिले के बागवानी विभाग में संपर्क कर सकता है। - डॉ. सरिता शर्मा, विषय विशेषज्ञ उद्यान पालमपुर
विभाग पुष्प खेती के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत बागवानों की सहायता के लिए तत्पर है। डॉ. नरेंद्र पाठक ने इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है। - डॉ. अलक्ष पठानिया, उप निदेशक उद्यान जिला कांगड़ा
जिला कांगड़ा के विकास खंड रैत, धर्मशाला, बैजनाथ व भवारना के ठंडे ऊंचाई वाले क्षेत्र इस फूल की खेती के लिए उपयुक्त हैं। इसलिए बेरोजगार युवा सिंबिडयम की खेती को स्वरोजगार के तौर पर अपना सकते हैं।- डॉ. कमलशील नेगी, संयुक्त निदेशक बागवानी विभाग धर्मशाला
