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Kullu Holi: त्योहारों को मनाने का रंग-ढंग बदला, नहीं बदली कुल्लू में रघुनाथ की होली
रोशन ठाकुर, कुल्लू।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Tue, 03 Mar 2026 02:52 PM IST
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सार
जिला कुल्लू के रघुनाथपुर में 366 साल पुरानी होली परंपरा आज भी निभाया जा रहा है। यहां वैरागी समुदाय के लोग सैकड़ों वर्षों से ब्रज की होली परंपरा को सहेजे हुए हैं।
वैरागी समुदाय के लोग
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
आधुनिकता के दौर में उत्सवों और त्योहारों का मनाने का रंग, ढंग बदल गया है, लेकिन नहीं बदला तो वह देवभूमि में भगवान रघुनाथ की होली परंपरा। आज भी रघुनाथपुर में 366 साल पुरानी होली परंपरा को कुल्लू में निभाई जा रही है।
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यहां वैरागी समुदाय के लोग सैकड़ों वर्षों से ब्रज की होली परंपरा को सहेजे हुए हैं। हालांकि कुल्लू जिला में भगवान रघुनाथ को आयोध्य से 1650 ई. में लाया गया था। लेकिन सुल्तानपुर में रघुनाथ 1660 को विराजे थे। तब से लेकर अयोध्या की तर्ज पर यहां भी होली उत्सव की परंपरा का भलि भांति निर्वहन किया जा रहा है। जिला में वसंत पंचमी से ब्रज की होली शुरू होती और 40 दिन तक इसे धूमधाम से मनाया जाता है। शहर में वैरागी समुदाय के लोग टोलियां बनाकर ब्रज भाषा में होली के गीत गाते हैं। खास बात है कि रघुनाथ की नगरी में होली पर्व को एक दिन पहले मनाया जाता है।
होलिका दहन के दूसरे दिन भगवान रघुनाथ मंदिर में विशेष कार्यक्रम में शामिल होते हैं। इसके साथ होली उत्सव का समापन होता है।
ब्रज की तर्ज पर मनाई जाती है सुजानपुर की ऐतिहासिक होली
उपमंडल सुजानपुर की ऐतिहासिक होली उत्तर भारत की उन विरासतपूर्ण परंपराओं में शामिल है, जिनमें रंग, भक्ति और रियासती दौर के वैभव का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यहां मनाया जाने वाला होली उत्सव ब्रज की तर्ज पर होता है। इसमें राधा-कृष्ण भक्ति की झलक, पारंपरिक लोक संस्कृति और रियासतों की गरिमा आज भी परंपराओं में झलकती है। इस ऐतिहासिक परंपरा की शुरुआत कटोच वंश के शासक महाराजा संसार चंद ने अपने शासनकाल के दौरान की थी। तब से लेकर आज तक यह परंपरा राजशाही काल की गरिमा को संजोए हुए निरंतर आगे बढ़ रही है। होली उत्सव का विधिवत शुभारंभ ऐतिहासिक मुरली मनोहर मंदिर में होता है। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सुजानपुर की सांस्कृतिक पहचान का भी प्रमुख केंद्र है। होली के दिन प्रातःकाल विशेष पूजा-अर्चना के साथ कार्यक्रम का आरंभ होता है।
उपमंडल सुजानपुर की ऐतिहासिक होली उत्तर भारत की उन विरासतपूर्ण परंपराओं में शामिल है, जिनमें रंग, भक्ति और रियासती दौर के वैभव का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यहां मनाया जाने वाला होली उत्सव ब्रज की तर्ज पर होता है। इसमें राधा-कृष्ण भक्ति की झलक, पारंपरिक लोक संस्कृति और रियासतों की गरिमा आज भी परंपराओं में झलकती है। इस ऐतिहासिक परंपरा की शुरुआत कटोच वंश के शासक महाराजा संसार चंद ने अपने शासनकाल के दौरान की थी। तब से लेकर आज तक यह परंपरा राजशाही काल की गरिमा को संजोए हुए निरंतर आगे बढ़ रही है। होली उत्सव का विधिवत शुभारंभ ऐतिहासिक मुरली मनोहर मंदिर में होता है। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सुजानपुर की सांस्कृतिक पहचान का भी प्रमुख केंद्र है। होली के दिन प्रातःकाल विशेष पूजा-अर्चना के साथ कार्यक्रम का आरंभ होता है।