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Kullu News: 650 किमी की शांति पदयात्रा पर निकले तिब्बती शरणार्थी कालसांग
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मनाली पहुंचे कालसांग का स्वागत करते स्थानीय तिब्बती लोग। संवाद
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मनाली। धर्मशाला निवासी तिब्बती शरणार्थी कालसांग थारचिन तिब्बती भाषा, संस्कृति, पहचान और मानवाधिकारों के संरक्षण का संदेश लेकर धर्मशाला से लेह-लद्दाख तक 650 किलोमीटर लंबी शांति पदयात्रा पर निकले हैं। 15 जुलाई से शुरू हुई यह यात्रा मंडी, कुल्लू, मनाली, केलांग, दारचा, सरचू और उपशी सहित विभिन्न पड़ावों से होते हुए लेह पहुंचेगी।
मंगलवार को मनाली पहुंचने पर भारत-तिब्बत मैत्री संघ, कुल्लू-मनाली के पदाधिकारियों, स्थानीय तिब्बती समुदाय और अन्य लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। इस अवसर पर भारत-तिब्बत मैत्री संघ, कुल्लू-मनाली के उपाध्यक्ष पनमा नमज्ञाल ने पदयात्रा के उद्देश्य और तिब्बत से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि इस यात्रा का उद्देश्य तिब्बती भाषा, संस्कृति और पहचान के संरक्षण के साथ-साथ लोगों को तिब्बत की वर्तमान परिस्थितियों के प्रति जागरूक करना है। कालसांग थारचिन ने कहा कि वर्ष 1950 से तिब्बत पर चीन का नियंत्रण है। आरोप लगाया कि हजारों बौद्ध मठों को नुकसान पहुंचाया गया। तिब्बती भाषा, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। वह तिब्बती भाषा, संस्कृति और मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए समर्थन की अपील कर रहे हैं। संवाद
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मंगलवार को मनाली पहुंचने पर भारत-तिब्बत मैत्री संघ, कुल्लू-मनाली के पदाधिकारियों, स्थानीय तिब्बती समुदाय और अन्य लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। इस अवसर पर भारत-तिब्बत मैत्री संघ, कुल्लू-मनाली के उपाध्यक्ष पनमा नमज्ञाल ने पदयात्रा के उद्देश्य और तिब्बत से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर जानकारी दी।
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उन्होंने कहा कि इस यात्रा का उद्देश्य तिब्बती भाषा, संस्कृति और पहचान के संरक्षण के साथ-साथ लोगों को तिब्बत की वर्तमान परिस्थितियों के प्रति जागरूक करना है। कालसांग थारचिन ने कहा कि वर्ष 1950 से तिब्बत पर चीन का नियंत्रण है। आरोप लगाया कि हजारों बौद्ध मठों को नुकसान पहुंचाया गया। तिब्बती भाषा, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। वह तिब्बती भाषा, संस्कृति और मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए समर्थन की अपील कर रहे हैं। संवाद
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