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Mandi News: विकास और बदलते बारिश के मिजाज से दरक रहे पहाड़
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हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते भूस्खलन जोखिम पर विशेषज्ञों ने जताई चिंता
आईआईटी मंडी के एलएआरएएम कोर्स 2026 में किया मंथन
राकेश राणा
मंडी। देश और विदेश के विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्र, विशेषकर हिमाचल प्रदेश में बढ़ते भूस्खलन जोखिम पर चिंता जताई। विशेषज्ञों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार और बदलते वर्षा पैटर्न भूस्खलन जोखिम को बढ़ा रहे हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी में आयोजित छह दिवसीय लैंडस्लाइड रिस्क असेसमेंट एवं मिटिगेशन (एलएआरएएम) कोर्स 2026 के दौरान देश-विदेश के विशेषज्ञों ने मंथन किया।
आईआईटी मंडी के प्रोफेसर केवी उदय ने कहा कि मानव गतिविधियां भूस्खलन के प्रमुख कारणों में शामिल हो गई हैं। सड़कों, भवनों और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए बड़े स्तर पर पहाड़ी ढलानों की कटाई से उनकी प्राकृतिक स्थिरता कमजोर होती है और ढलान विफलता की संभावना बढ़ जाती है। बताया कि इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पहले से अस्थिर भूभाग पर अतिरिक्त दबाव डालता है। कई मामलों में प्राकृतिक भू-वैज्ञानिक कमजोरियां और मानव हस्तक्षेप मिलकर ढलानों को अधिक संवेदनशील बना देते हैं।
प्रो. उदय ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा पैटर्न में बदलाव आया है। पहले मानसून के दौरान वर्षा अपेक्षाकृत लंबे समय में होती थी, जिससे पानी धीरे-धीरे जमीन में समा जाता था। अब कम समय में अत्यधिक तीव्र वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे मिट्टी तेजी से संतृप्त होकर ढलानों को अस्थिर कर देती है और भूस्खलन की संभावना बढ़ जाती है। कहा कि पहले भूस्खलन लगातार कई दिनों की वर्षा के बाद होते थे, जबकि अब कम समय में अत्यधिक वर्षा के कारण अचानक भूस्खलन हो रहे हैं। बताया कि पहले टू लेन सड़कों के निर्माण में लगभग छह मीटर तक ढलान काटी जाती थी। जबकि अब फोरलेन सड़कों के लिए यह कटाव 10 से 12 मीटर तक पहुंच गया है, जिससे भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ सालेरनो इटली के प्रोफेसर सबातिनो कुओमो ने कहा कि भूस्खलन जोखिम आकलन के लिए अब ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन, रिमोट सेंसिंग और उन्नत कंप्यूटेशनल मॉडल का उपयोग किया जा रहा है, जिससे संभावित खतरों की बेहतर पहचान हो रही है। उन्होंने बताया कि कई देश क्वांटिटेटिव रिस्क असेसमेंट पद्धतियों को अपना रहे हैं, जिससे संभावित नुकसान का आकलन कर बेहतर रणनीतियां बनाई जा रही हैं।
इसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सेट्टिमियो फेरलिसी ने कहा कि भूस्खलन की सटीक भविष्यवाणी अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग से सुधार हुआ है, लेकिन विश्वसनीय पूर्वानुमान के लिए ढलानों की स्थिति और पर्यावरणीय कारकों की विस्तृत जानकारी आवश्यक है। कहा कि वैज्ञानिक अभी भी स्वीकार्य जोखिम स्तर और न्यूनीकरण उपायों के बाद बचने वाले जोखिम का आकलन करने पर काम कर रहे हैं।
कोर्स के दौरान विशेषज्ञों ने भूस्खलन अनुसंधान में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व पर जोर दिया। चर्चा के अंत में विशेषज्ञों ने सरकार से अपील की कि विकास योजनाओं में वैज्ञानिक अनुसंधान, जोखिम मानचित्रण और नियामक ढांचे को शामिल किया जाए, ताकि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते भूस्खलन जोखिम को कम किया जा सके।
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आईआईटी मंडी के एलएआरएएम कोर्स 2026 में किया मंथन
राकेश राणा
मंडी। देश और विदेश के विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्र, विशेषकर हिमाचल प्रदेश में बढ़ते भूस्खलन जोखिम पर चिंता जताई। विशेषज्ञों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार और बदलते वर्षा पैटर्न भूस्खलन जोखिम को बढ़ा रहे हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी में आयोजित छह दिवसीय लैंडस्लाइड रिस्क असेसमेंट एवं मिटिगेशन (एलएआरएएम) कोर्स 2026 के दौरान देश-विदेश के विशेषज्ञों ने मंथन किया।
आईआईटी मंडी के प्रोफेसर केवी उदय ने कहा कि मानव गतिविधियां भूस्खलन के प्रमुख कारणों में शामिल हो गई हैं। सड़कों, भवनों और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए बड़े स्तर पर पहाड़ी ढलानों की कटाई से उनकी प्राकृतिक स्थिरता कमजोर होती है और ढलान विफलता की संभावना बढ़ जाती है। बताया कि इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पहले से अस्थिर भूभाग पर अतिरिक्त दबाव डालता है। कई मामलों में प्राकृतिक भू-वैज्ञानिक कमजोरियां और मानव हस्तक्षेप मिलकर ढलानों को अधिक संवेदनशील बना देते हैं।
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प्रो. उदय ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा पैटर्न में बदलाव आया है। पहले मानसून के दौरान वर्षा अपेक्षाकृत लंबे समय में होती थी, जिससे पानी धीरे-धीरे जमीन में समा जाता था। अब कम समय में अत्यधिक तीव्र वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे मिट्टी तेजी से संतृप्त होकर ढलानों को अस्थिर कर देती है और भूस्खलन की संभावना बढ़ जाती है। कहा कि पहले भूस्खलन लगातार कई दिनों की वर्षा के बाद होते थे, जबकि अब कम समय में अत्यधिक वर्षा के कारण अचानक भूस्खलन हो रहे हैं। बताया कि पहले टू लेन सड़कों के निर्माण में लगभग छह मीटर तक ढलान काटी जाती थी। जबकि अब फोरलेन सड़कों के लिए यह कटाव 10 से 12 मीटर तक पहुंच गया है, जिससे भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ सालेरनो इटली के प्रोफेसर सबातिनो कुओमो ने कहा कि भूस्खलन जोखिम आकलन के लिए अब ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन, रिमोट सेंसिंग और उन्नत कंप्यूटेशनल मॉडल का उपयोग किया जा रहा है, जिससे संभावित खतरों की बेहतर पहचान हो रही है। उन्होंने बताया कि कई देश क्वांटिटेटिव रिस्क असेसमेंट पद्धतियों को अपना रहे हैं, जिससे संभावित नुकसान का आकलन कर बेहतर रणनीतियां बनाई जा रही हैं।
इसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सेट्टिमियो फेरलिसी ने कहा कि भूस्खलन की सटीक भविष्यवाणी अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग से सुधार हुआ है, लेकिन विश्वसनीय पूर्वानुमान के लिए ढलानों की स्थिति और पर्यावरणीय कारकों की विस्तृत जानकारी आवश्यक है। कहा कि वैज्ञानिक अभी भी स्वीकार्य जोखिम स्तर और न्यूनीकरण उपायों के बाद बचने वाले जोखिम का आकलन करने पर काम कर रहे हैं।
कोर्स के दौरान विशेषज्ञों ने भूस्खलन अनुसंधान में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व पर जोर दिया। चर्चा के अंत में विशेषज्ञों ने सरकार से अपील की कि विकास योजनाओं में वैज्ञानिक अनुसंधान, जोखिम मानचित्रण और नियामक ढांचे को शामिल किया जाए, ताकि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते भूस्खलन जोखिम को कम किया जा सके।