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कर्मचारियों को न्यायालय जाने से रोकना, बंधुवा मजदूर बनाने के समान : डोगरा
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तबादलों और न्यायालय जाने के अधिकार पर प्रतिबंध को लेकर कर्मचारी संगठनों ने जताया रोष
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। प्रदेश सरकार की ओर से कर्मचारियों के तबादलों और न्यायालय जाने के अधिकार पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों को लेकर कर्मचारी संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है। राष्ट्रीय राज्य कर्मचारी महासंघ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष विपन कुमार डोगरा ने कहा कि सरकार कर्मचारी हितों पर लगातार कुठाराघात कर रही है और बदले की भावना से तबादले किए जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि कर्मचारी न्याय के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं, तो सरकार अब उन्हें ऐसा करने से भी रोकना चाहती है। जोकि कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का हनन है। डोगरा ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 और 21 प्रत्येक नागरिक को न्याय एवं समानता का अधिकार प्रदान करते हैं, लेकिन सरकार द्वारा व्यापक मार्गदर्शक सिद्धांत-2013 (सीजीपी-2013) में जोड़ा गया नया पैरा 22(अ) कर्मचारियों के अधिकारों पर सीधा हमला है। उन्होंने कहा कि नए प्रावधान के अनुसार कोई भी कर्मचारी सीधे न्यायालय नहीं जा सकेगा और यदि ऐसा करता है, तो उसके विरुद्ध केंद्रीय सिविल सेवा नियम-1965 और अन्य लागू नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। कर्मचारी संगठनों ने इसे पूरी तरह अनुचित बताते हुए तुरंत वापस लेने की मांग की है। डोगरा के साथ राष्ट्रीय मंत्री चमन लाल कलवान और हिमाचल प्रदेश राज्य कर्मचारी महासंघ के प्रदेश संगठन मंत्री बृज लाल शर्मा ने भी सरकार के इस निर्णय की आलोचना की। उन्होंने कहा कि सरकार कर्मचारियों की न्यायोचित मांगें पूरी करने के बजाय दमनकारी रवैया अपना रही है। प्रदेश में लंबे समय से राजनीतिक आधार पर तबादले किए जाते रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार न्यायसंगत स्थानांतरण नीति बनाने में विफल रही है और न्यायालय से कई बार फटकार मिलने के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने कर्मचारी विरोधी नीतियां वापस नहीं लीं, तो प्रदेश में व्यापक असंतोष का सामना करना पड़ सकता है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। प्रदेश सरकार की ओर से कर्मचारियों के तबादलों और न्यायालय जाने के अधिकार पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों को लेकर कर्मचारी संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है। राष्ट्रीय राज्य कर्मचारी महासंघ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष विपन कुमार डोगरा ने कहा कि सरकार कर्मचारी हितों पर लगातार कुठाराघात कर रही है और बदले की भावना से तबादले किए जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि कर्मचारी न्याय के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं, तो सरकार अब उन्हें ऐसा करने से भी रोकना चाहती है। जोकि कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का हनन है। डोगरा ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 और 21 प्रत्येक नागरिक को न्याय एवं समानता का अधिकार प्रदान करते हैं, लेकिन सरकार द्वारा व्यापक मार्गदर्शक सिद्धांत-2013 (सीजीपी-2013) में जोड़ा गया नया पैरा 22(अ) कर्मचारियों के अधिकारों पर सीधा हमला है। उन्होंने कहा कि नए प्रावधान के अनुसार कोई भी कर्मचारी सीधे न्यायालय नहीं जा सकेगा और यदि ऐसा करता है, तो उसके विरुद्ध केंद्रीय सिविल सेवा नियम-1965 और अन्य लागू नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। कर्मचारी संगठनों ने इसे पूरी तरह अनुचित बताते हुए तुरंत वापस लेने की मांग की है। डोगरा के साथ राष्ट्रीय मंत्री चमन लाल कलवान और हिमाचल प्रदेश राज्य कर्मचारी महासंघ के प्रदेश संगठन मंत्री बृज लाल शर्मा ने भी सरकार के इस निर्णय की आलोचना की। उन्होंने कहा कि सरकार कर्मचारियों की न्यायोचित मांगें पूरी करने के बजाय दमनकारी रवैया अपना रही है। प्रदेश में लंबे समय से राजनीतिक आधार पर तबादले किए जाते रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार न्यायसंगत स्थानांतरण नीति बनाने में विफल रही है और न्यायालय से कई बार फटकार मिलने के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने कर्मचारी विरोधी नीतियां वापस नहीं लीं, तो प्रदेश में व्यापक असंतोष का सामना करना पड़ सकता है।