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Rampur Bushahar News: चिलिंग ऑवर्स पूरा न होने की चिंता में अब बागवान फव्वारे से कर रहे भरपाई
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सेब के बगीचों में फव्यारे से जमाई जा रही बर्फ। संवाद
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लगातार सूखे के कारण बागवानों को सेब उत्पादन प्रभावित होने की चिंता
स्प्रिंकलर सिंचाई से बगीचों में बनी रहती है नमी
संवाद न्यूज एजेंसी
कोटखाई (रोहड़ू)। मौसम की बेरुखी ने इस बार बागवानों की चिंता बढ़ा दी है। लगातार सूखे के कारण सेब उत्पादन प्रभावित होने की चिंता बागवानों को सता रही है। इस कारण बगीचों में चिलिंग ऑवर्स पूरा न होने की आशंका में बागवानों ने फव्वारों का सहारा ले लिया है। बदलते मौसम, कम ठंड और बर्फबारी के अभाव के कारण इस वर्ष सेब के बगीचों में प्राकृतिक चिलिंग ऑवर्स प्रभावित हो रही है। ऐसे में जिन बागवानों के पास सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वे चिलिंग ऑवर्स की कमी की भरपाई के लिए स्प्रिंकलर (फव्वारा) का सहारा ले रहे हैं। बागवानों का कहना है कि स्प्रिंकलर सिंचाई से बगीचों में नमी बनी रहती है और तापमान में गिरावट का प्रभाव कुछ हद तक बनाए रखने में मदद मिलती है। इससे पौधों को आवश्यक ठंडक मिल सके, इसी उम्मीद के साथ वे नियमित अंतराल पर फव्वारे से सिंचाई कर रहे हैं। हालांकि, यह प्राकृतिक बर्फबारी का पूर्ण विकल्प नहीं है, फिर भी उपलब्ध संसाधनों से फसल को बचाने का यह एक प्रयास माना जा रहा है। बागवानों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों से मौसम में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। सर्दियों में तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहने और बर्फ न गिरने से सेब के पौधों की निष्क्रिय अवस्था प्रभावित होती है। इसका सीधा असर फूल आने, फल सेट होने और उत्पादन पर पड़ता है। इसी कारण इस बार भी आगामी फसल की गुणवत्ता और मात्रा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
सेब की अच्छी पैदावार के लिए 900 से 1400 चिलिंग ऑवर्स आवश्यक होती हैं। जब तापमान माइनस 6 डिग्री सेल्सियस से नीचे जाता है, तभी उसे प्रभावी चिलिंग ऑवर्स माना जाता है। यदि यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती है, तो फूल कम आ सकते हैं। फल झड़ने की समस्या बढ़ सकती है और उत्पादन घट सकता है। -नवीन, उद्यान विकास अधिकारी
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स्प्रिंकलर सिंचाई से बगीचों में बनी रहती है नमी
संवाद न्यूज एजेंसी
कोटखाई (रोहड़ू)। मौसम की बेरुखी ने इस बार बागवानों की चिंता बढ़ा दी है। लगातार सूखे के कारण सेब उत्पादन प्रभावित होने की चिंता बागवानों को सता रही है। इस कारण बगीचों में चिलिंग ऑवर्स पूरा न होने की आशंका में बागवानों ने फव्वारों का सहारा ले लिया है। बदलते मौसम, कम ठंड और बर्फबारी के अभाव के कारण इस वर्ष सेब के बगीचों में प्राकृतिक चिलिंग ऑवर्स प्रभावित हो रही है। ऐसे में जिन बागवानों के पास सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वे चिलिंग ऑवर्स की कमी की भरपाई के लिए स्प्रिंकलर (फव्वारा) का सहारा ले रहे हैं। बागवानों का कहना है कि स्प्रिंकलर सिंचाई से बगीचों में नमी बनी रहती है और तापमान में गिरावट का प्रभाव कुछ हद तक बनाए रखने में मदद मिलती है। इससे पौधों को आवश्यक ठंडक मिल सके, इसी उम्मीद के साथ वे नियमित अंतराल पर फव्वारे से सिंचाई कर रहे हैं। हालांकि, यह प्राकृतिक बर्फबारी का पूर्ण विकल्प नहीं है, फिर भी उपलब्ध संसाधनों से फसल को बचाने का यह एक प्रयास माना जा रहा है। बागवानों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों से मौसम में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। सर्दियों में तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहने और बर्फ न गिरने से सेब के पौधों की निष्क्रिय अवस्था प्रभावित होती है। इसका सीधा असर फूल आने, फल सेट होने और उत्पादन पर पड़ता है। इसी कारण इस बार भी आगामी फसल की गुणवत्ता और मात्रा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
सेब की अच्छी पैदावार के लिए 900 से 1400 चिलिंग ऑवर्स आवश्यक होती हैं। जब तापमान माइनस 6 डिग्री सेल्सियस से नीचे जाता है, तभी उसे प्रभावी चिलिंग ऑवर्स माना जाता है। यदि यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती है, तो फूल कम आ सकते हैं। फल झड़ने की समस्या बढ़ सकती है और उत्पादन घट सकता है। -नवीन, उद्यान विकास अधिकारी
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