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Rampur Bushahar News: अब न उगती है सरसों, न गूंजते हैं लोकगीत, बाजार के अनुसार बदली रीत
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ब्रह्मखाड़ा, कौड़ी पूरी रात गाते थे और नाटी लगाते थे लोग, महाशिवरात्रि पर पाजा की पत्तियों से बनता था चंदुआ
लोग किल्टे में बाबर, बड़े, मीठी रोटी जैसे पकवान डालकर जाते थे रिश्तेदारों के घर
संवाद न्यूज एजेंसी
कोटखाई (रोहड़ू)। महाशिवरात्रि पहाड़ों में केवल पर्व नहीं, बल्कि परंपरा, रिश्तों और सामूहिक संस्कृति का उत्सव रहा है, लेकिन समय के साथ इसका स्वरूप बदलता जा रहा है। बुजुर्गों के अनुसार पहले महाशिवरात्रि की तैयारियां एक महीने पहले से शुरू हो जाती थीं, जबकि अब अधिकतर लोग बाजार पर निर्भर हो गए हैं। पहले महाशिवरात्रि के लिए खेतों में सरसों उगाई जाती थी और कोहलू पर ले जाकर तेल निकाला जाता था। उसी तेल से पकवान बनाए जाते थे। अब सरसों की खेती खत्म हो गई है और तेल बाजार से खरीदकर लाया जाता है। महाशिवरात्रि पर्व के लिए अब न उगती है सरसों, न गूंजते हैं लोकगीत, बाजार के अनुसार रीत बदल गई है। महाशिवरात्रि की रात हर गांव में लोग एकत्रित होकर शिव के लोकगीत ब्रह्मखाड़ा, कौड़ी पूरी रात गाते थे और नाटी लगाते थे। महाशिवरात्रि के दिन पाजा की पत्तियों से चंदुआ बनाया जाता था, जिसे शिव का स्वरूप मानकर पूजा जाता था। सुबह 4 बजे इसे नाच-गाकर घर के कोने में स्थापित किया जाता था। आज यह परंपरा कम हो गई है। हालांकि, कुछ गांवों में अब भी यह परंपरा निभाई जाती है। दूसरे दिन लोग किल्टे में बाबर, बड़े, मीठी रोटी जैसे पकवान डालकर रिश्तेदारों के घर जाते थे। खासकर, वहां जहां बेटी का विवाह हुआ हो या किसी घर में अनहोनी हुई हो। पहले लड़की के मायके की ओर से पांच किलो गुड़ की डली देने का भी रिवाज था, जो अब अधिकांश क्षेत्राें में समाप्त हो चुका है और उसकी जगह पैसे दिए जाने लगे हैं। कुल मिलाकर पहले महाशिवरात्रि आत्मनिर्भरता और गांव की एकता का पर्व था, जबकि अब यह धीरे-धीरे बाजार आधारित बनता जा रहा है। फिर भी शिवरात्रि की श्रद्धा और आस्था आज भी लोगों के दिलों में वैसी ही बनी हुई है।
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लोग किल्टे में बाबर, बड़े, मीठी रोटी जैसे पकवान डालकर जाते थे रिश्तेदारों के घर
संवाद न्यूज एजेंसी
कोटखाई (रोहड़ू)। महाशिवरात्रि पहाड़ों में केवल पर्व नहीं, बल्कि परंपरा, रिश्तों और सामूहिक संस्कृति का उत्सव रहा है, लेकिन समय के साथ इसका स्वरूप बदलता जा रहा है। बुजुर्गों के अनुसार पहले महाशिवरात्रि की तैयारियां एक महीने पहले से शुरू हो जाती थीं, जबकि अब अधिकतर लोग बाजार पर निर्भर हो गए हैं। पहले महाशिवरात्रि के लिए खेतों में सरसों उगाई जाती थी और कोहलू पर ले जाकर तेल निकाला जाता था। उसी तेल से पकवान बनाए जाते थे। अब सरसों की खेती खत्म हो गई है और तेल बाजार से खरीदकर लाया जाता है। महाशिवरात्रि पर्व के लिए अब न उगती है सरसों, न गूंजते हैं लोकगीत, बाजार के अनुसार रीत बदल गई है। महाशिवरात्रि की रात हर गांव में लोग एकत्रित होकर शिव के लोकगीत ब्रह्मखाड़ा, कौड़ी पूरी रात गाते थे और नाटी लगाते थे। महाशिवरात्रि के दिन पाजा की पत्तियों से चंदुआ बनाया जाता था, जिसे शिव का स्वरूप मानकर पूजा जाता था। सुबह 4 बजे इसे नाच-गाकर घर के कोने में स्थापित किया जाता था। आज यह परंपरा कम हो गई है। हालांकि, कुछ गांवों में अब भी यह परंपरा निभाई जाती है। दूसरे दिन लोग किल्टे में बाबर, बड़े, मीठी रोटी जैसे पकवान डालकर रिश्तेदारों के घर जाते थे। खासकर, वहां जहां बेटी का विवाह हुआ हो या किसी घर में अनहोनी हुई हो। पहले लड़की के मायके की ओर से पांच किलो गुड़ की डली देने का भी रिवाज था, जो अब अधिकांश क्षेत्राें में समाप्त हो चुका है और उसकी जगह पैसे दिए जाने लगे हैं। कुल मिलाकर पहले महाशिवरात्रि आत्मनिर्भरता और गांव की एकता का पर्व था, जबकि अब यह धीरे-धीरे बाजार आधारित बनता जा रहा है। फिर भी शिवरात्रि की श्रद्धा और आस्था आज भी लोगों के दिलों में वैसी ही बनी हुई है।