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Sirmour News: हत्या के मामले में दोबारा जांच की मांग अदालत ने ठुकराई
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साल 2025 को पांवटा साहिब का मामला, मोबाइल, गवाहों और सीसीटीवी फुटेज की अनदेखी का लगाया आरोप
चार्जशीट के बाद शिकायतकर्ता के आवेदन पर आगे की जांच का आदेश नहीं : अदालत
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। हत्या के मामले में आगे की जांच (फर्दर इन्वेस्टिगेशन) की मांग को लेकर दायर शिकायतकर्ता की अर्जी को अदालत ने खारिज कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कपिल शर्मा ने स्पष्ट किया कि चार्जशीट (आरोपपत्र) दाखिल होने, संज्ञान लिए जाने और आरोपियों के न्यायालय में पेश हो जाने के बाद आवेदन पर आगे की जांच का आदेश देना कानूनन संभव नहीं है।
मामला वर्ष 2025 में पांवटा साहिब में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। इसमें मृतक अशरफ अली की हत्या का आरोप लगाया गया था। शिकायतकर्ता ने अदालत में दायर आवेदन में दावा किया था कि पुलिस ने मामले की निष्पक्ष जांच नहीं की। आरोप लगाया गया कि आरोपियों के मोबाइल फोन, जिनमें कथित तौर पर घटना का वीडियो रिकॉर्ड था, उन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया। साथ ही महत्वपूर्ण सीसीटीवी फुटेज और प्रत्यक्षदर्शी गवाह के बयान भी जांच में शामिल नहीं किए गए। अर्जी में यह भी कहा गया कि मृतक के रक्त के नमूने की रिपोर्ट पर संदेह है और नमूनों के अदला-बदली की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि बीएनएसएस की धारा 193(9) के तहत आगे की जांच का प्रावधान जरूर है। लेकिन यह अधिकार मुख्य रूप से जांच एजेंसी के पास होता है। अदालत ने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि आगे की जांच केवल विशेष परिस्थितियों और नए साक्ष्य मिलने पर जांच एजेंसी के आग्रह पर ही कराई जा सकती है। शिकायतकर्ता की ओर से दायर यह आवेदन तकनीकी रूप से स्वीकार्य नहीं पाया गया।
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चार्जशीट के बाद शिकायतकर्ता के आवेदन पर आगे की जांच का आदेश नहीं : अदालत
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। हत्या के मामले में आगे की जांच (फर्दर इन्वेस्टिगेशन) की मांग को लेकर दायर शिकायतकर्ता की अर्जी को अदालत ने खारिज कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कपिल शर्मा ने स्पष्ट किया कि चार्जशीट (आरोपपत्र) दाखिल होने, संज्ञान लिए जाने और आरोपियों के न्यायालय में पेश हो जाने के बाद आवेदन पर आगे की जांच का आदेश देना कानूनन संभव नहीं है।
मामला वर्ष 2025 में पांवटा साहिब में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। इसमें मृतक अशरफ अली की हत्या का आरोप लगाया गया था। शिकायतकर्ता ने अदालत में दायर आवेदन में दावा किया था कि पुलिस ने मामले की निष्पक्ष जांच नहीं की। आरोप लगाया गया कि आरोपियों के मोबाइल फोन, जिनमें कथित तौर पर घटना का वीडियो रिकॉर्ड था, उन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया। साथ ही महत्वपूर्ण सीसीटीवी फुटेज और प्रत्यक्षदर्शी गवाह के बयान भी जांच में शामिल नहीं किए गए। अर्जी में यह भी कहा गया कि मृतक के रक्त के नमूने की रिपोर्ट पर संदेह है और नमूनों के अदला-बदली की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
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अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि बीएनएसएस की धारा 193(9) के तहत आगे की जांच का प्रावधान जरूर है। लेकिन यह अधिकार मुख्य रूप से जांच एजेंसी के पास होता है। अदालत ने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि आगे की जांच केवल विशेष परिस्थितियों और नए साक्ष्य मिलने पर जांच एजेंसी के आग्रह पर ही कराई जा सकती है। शिकायतकर्ता की ओर से दायर यह आवेदन तकनीकी रूप से स्वीकार्य नहीं पाया गया।