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Sirmour News: अदालत
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आपसी सहमति से तलाक में
6 माह की प्रतीक्षा अवधि खत्म
- फैमिली कोर्ट ने पति-पत्नी को दी राहत, पिछले दो वर्षों से रह रहे थे अलग
- अदालत ने माना कि सुलह की कोई संभावना नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। फैमिली कोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक लेने वाले दंपती को राहत देते हुए छह माह की अनिवार्य ‘कूलिंग पीरियड’ (प्रतीक्षा अवधि) समाप्त कर दी है। अदालत ने माना कि पति-पत्नी के बीच सुलह की कोई संभावना नहीं बची है और विवाह पूरी तरह टूट चुका है।
मामले में शालू और नरेंद्र ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया कि दोनों लंबे समय से अलग रह रहे हैं और परिवार तथा रिश्तेदारों के प्रयासों के बावजूद संबंध सामान्य नहीं हो सके। सुनवाई के दौरान पक्षकारों ने बताया कि वे अपने सभी विवाद आपसी सहमति से सुलझा चुके हैं। पत्नी ने भविष्य में भरण-पोषण एवं संपत्ति संबंधी किसी दावे से भी इन्कार किया। ऐसे में छह माह की प्रतीक्षा अवधि केवल उनकी मानसिक पीड़ा बढ़ाएगी।
फैमिली कोर्ट ने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि निर्धारित छह माह की अवधि अनिवार्य नहीं बल्कि निर्देशात्मक है। यदि अदालत को लगे कि पुनर्मिलन की कोई संभावना नहीं है और सभी विवाद सुलझ चुके हैं, तो इस अवधि को माफ किया जा सकता है। प्रधान न्यायाधीश योगेश जसवाल ने सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद आवेदन स्वीकार करते हुए छह माह की कूलिंग पीरियड समाप्त कर दी।
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6 माह की प्रतीक्षा अवधि खत्म
- फैमिली कोर्ट ने पति-पत्नी को दी राहत, पिछले दो वर्षों से रह रहे थे अलग
- अदालत ने माना कि सुलह की कोई संभावना नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। फैमिली कोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक लेने वाले दंपती को राहत देते हुए छह माह की अनिवार्य ‘कूलिंग पीरियड’ (प्रतीक्षा अवधि) समाप्त कर दी है। अदालत ने माना कि पति-पत्नी के बीच सुलह की कोई संभावना नहीं बची है और विवाह पूरी तरह टूट चुका है।
मामले में शालू और नरेंद्र ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया कि दोनों लंबे समय से अलग रह रहे हैं और परिवार तथा रिश्तेदारों के प्रयासों के बावजूद संबंध सामान्य नहीं हो सके। सुनवाई के दौरान पक्षकारों ने बताया कि वे अपने सभी विवाद आपसी सहमति से सुलझा चुके हैं। पत्नी ने भविष्य में भरण-पोषण एवं संपत्ति संबंधी किसी दावे से भी इन्कार किया। ऐसे में छह माह की प्रतीक्षा अवधि केवल उनकी मानसिक पीड़ा बढ़ाएगी।
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फैमिली कोर्ट ने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि निर्धारित छह माह की अवधि अनिवार्य नहीं बल्कि निर्देशात्मक है। यदि अदालत को लगे कि पुनर्मिलन की कोई संभावना नहीं है और सभी विवाद सुलझ चुके हैं, तो इस अवधि को माफ किया जा सकता है। प्रधान न्यायाधीश योगेश जसवाल ने सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद आवेदन स्वीकार करते हुए छह माह की कूलिंग पीरियड समाप्त कर दी।