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: शिव-पार्वती के दिव्य विवाहका सुनाया प्रसंग
Wed, 05 Aug 2026 11:51 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सोलन
संवाद न्यूज एजेंसी, सोलन
Updated Wed, 05 Aug 2026 11:51 PM IST
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कुनिहार में शिव महापुराण कथा में किया भगवान शिव के विवाह का वर्णन
संवाद न्यूज एजेंसी
कुनिहार(सोलन)। हर-हर गंगे कांवड़ सेवा संघ हाटकोट, कुनिहार के तत्वावधान में आयोजित शिव महापुराण कथा में कथा व्यास एवं राष्ट्रीय प्रचारक गोरक्षा दल शशांक कौशल ने भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया। कहा कि भगवान शिव का विवाह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि त्याग, तप, भक्ति और सनातन संस्कृति के आदर्शों का प्रतीक है।
उन्होंने बताया कि विवाह से पूर्व शिवगणों ने भगवान शिव का अद्भुत शृंगार किया। इसके बाद असंख्य भूत, प्रेत, गण, योगी और देवताओं के साथ भगवान शिव की अनोखी बारात हिमालय के लिए प्रस्थान करती है। भगवान शिव के विकराल स्वरूप को देखकर माता पार्वती की माता मैना भयभीत हो जाती हैं। तब देवताओं के आग्रह पर भगवान शिव मनोहर दूल्हे का दिव्य स्वरूप धारण करते हैं, जिसके बाद वैदिक विधि-विधान से भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न होता है। कथा व्यास ने बताया कि विवाह के दौरान जब भगवान शिव से उनका गोत्र पूछा गया तो उन्होंने अपना गोत्र ''नाद'' बताया। इसका अर्थ है कि भगवान शिव स्वयं अनादि, अनंत और संपूर्ण सृष्टि के मूल स्वरूप हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं को बताया कि शिव महापुराण के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह मार्गशीर्ष मास में हुआ था। उन्होंने कहा कि महाशिवरात्रि का संबंध भगवान शिव के विवाह से नहीं, बल्कि उनके अनंत ज्योतिर्मय स्वरूप के प्राकट्य से माना गया है। इसी अवसर पर ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच श्रेष्ठता का विवाद समाप्त करने के लिए भगवान शिव अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे।
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उन्होंने कहा कि महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना, तप, ध्यान, रुद्राभिषेक, व्रत और रात्रि जागरण का महान पर्व है। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान शिव-पार्वती के दिव्य विवाह प्रसंग का श्रवण कर धर्म, भक्ति और सदाचार का संदेश ग्रहण किया।
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कुनिहार(सोलन)। हर-हर गंगे कांवड़ सेवा संघ हाटकोट, कुनिहार के तत्वावधान में आयोजित शिव महापुराण कथा में कथा व्यास एवं राष्ट्रीय प्रचारक गोरक्षा दल शशांक कौशल ने भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया। कहा कि भगवान शिव का विवाह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि त्याग, तप, भक्ति और सनातन संस्कृति के आदर्शों का प्रतीक है।
उन्होंने बताया कि विवाह से पूर्व शिवगणों ने भगवान शिव का अद्भुत शृंगार किया। इसके बाद असंख्य भूत, प्रेत, गण, योगी और देवताओं के साथ भगवान शिव की अनोखी बारात हिमालय के लिए प्रस्थान करती है। भगवान शिव के विकराल स्वरूप को देखकर माता पार्वती की माता मैना भयभीत हो जाती हैं। तब देवताओं के आग्रह पर भगवान शिव मनोहर दूल्हे का दिव्य स्वरूप धारण करते हैं, जिसके बाद वैदिक विधि-विधान से भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न होता है। कथा व्यास ने बताया कि विवाह के दौरान जब भगवान शिव से उनका गोत्र पूछा गया तो उन्होंने अपना गोत्र ''नाद'' बताया। इसका अर्थ है कि भगवान शिव स्वयं अनादि, अनंत और संपूर्ण सृष्टि के मूल स्वरूप हैं।
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उन्होंने श्रद्धालुओं को बताया कि शिव महापुराण के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह मार्गशीर्ष मास में हुआ था। उन्होंने कहा कि महाशिवरात्रि का संबंध भगवान शिव के विवाह से नहीं, बल्कि उनके अनंत ज्योतिर्मय स्वरूप के प्राकट्य से माना गया है। इसी अवसर पर ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच श्रेष्ठता का विवाद समाप्त करने के लिए भगवान शिव अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे।
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उन्होंने कहा कि महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना, तप, ध्यान, रुद्राभिषेक, व्रत और रात्रि जागरण का महान पर्व है। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान शिव-पार्वती के दिव्य विवाह प्रसंग का श्रवण कर धर्म, भक्ति और सदाचार का संदेश ग्रहण किया।