Bee Venom Therapy: मधुमक्खी के डंक से होगा गठिया और साइटिका का इलाज, नौणी यूनिवर्सिटी शुरू करेगी खास कोर्स
नौणी विश्वविद्यालय सोलन मधुमक्खी पालन और एपिथेरेपी में एक वर्षीय पीजी डिप्लोमा शुरू करने जा रहा है। कोर्स में मधुमक्खी के विष, शहद, मोम, रॉयल जेली और अन्य उत्पादों के वैज्ञानिक उपयोग की ट्रेनिंग दी जाएगी। विश्वविद्यालय का कहना है कि यह कोर्स स्वरोजगार के अवसर भी देगा। हालांकि बी-वेनम थेरेपी हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं है और इसे केवल विशेषज्ञ की देखरेख में ही कराया जाना चाहिए।
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पुराने जमाने के देसी और प्राकृतिक इलाज के तरीकों को अब वैज्ञानिक मंजूरी मिल रही है। अब मधुमक्खी के डंक गठिया और साइटिका (नसों के दर्द) का इलाज किया जाएगा। इस इलाज को एपिथेरेपी कहते हैं। नौणी यूनिवर्सिटी सोलन इस क्षेत्र में युवाओं को ट्रेनिंग देने के लिए खास कोर्स शुरू कर रही है। इससे लोगों का इलाज तो होगा ही, साथ ही युवाओं को स्वरोजगार के नए मौके भी मिलेंगे। एपिथेरेपी में इंसान के शरीर को तंदुरुस्त रखने और बीमारियों को ठीक करने के लिए मधुमक्खी का डंक, शहद, मोम, रॉयल जेली और बी-पोलन, प्रोपोलिस का प्रयोग किया जाता है। नौणी विवि का कीट विज्ञान विभाग मधुमक्खी पालन और एपिथेरेपी में एक साल का पीजी डिप्लोमा शुरू कर रहा है। इसमें युवाओं को मधुमक्खी पालन, शहद व अन्य उत्पाद तैयार करने और इलाज के तरीके सिखाए जाएंगे। इस कोर्स में कुल 25 सीटें होंगी।
मधुमक्खी के डंक में मेलिटिन नामक एक अत्यंत प्रभावशाली मुख्य तत्व पाया जाता है, जिसमें प्राकृतिक रूप से शक्तिशाली सूजन रोधी (एंटी-इन्फ्लेमेटरी) गुण होते हैं। बी-वेनम थेरेपी के माध्यम से जब यह तत्व शरीर में प्रवेश करता है, तो यह प्रभावित हिस्सों की सूजन और दर्द को तेजी से कम करता है। यह गठिया (आर्थराइटिस), साइटिका, घुटनों के दर्द, पीठ दर्द और जोड़ों की जकड़न से पीड़ित मरीजों को तुरंत और दीर्घकालिक राहत प्रदान करने में बेहद असरदार साबित होता है।
शहद और प्रोपोलिस में प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-ऑक्सीडेंट और त्वचा को पुनर्जीवित करने वाले गुण पाए जाते हैं। ये त्वचा पर लगे कटे-फटे निशान, जले के घाव और किसी भी तरह के संक्रमण को तेजी से भरने में मदद करते हैं। इन्हीं कमाल के फायदों के कारण आजकल सौंदर्य उद्योग में एंटी-एजिंग प्रोडक्ट, झुर्रियां हटाने वाली क्रीमों और स्किन रिपेयर सीरम में इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है, जिससे त्वचा चमकदार बनती है। विटामिन्स, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर बी-पोलन और रॉयल जेली शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को मजबूत बनाने में मददगार होते हैं। यह थेरेपी नसों में रक्त के प्रवाह (ब्लड सर्कुलेशन) को बेहतर बनाती है। इससे माइग्रेन के पुराने दर्द और न्यूरोपैथी यानी नसों की कमजोरी या दर्द से पीड़ित मरीजों को काफी राहत मिलती है। यह शरीर को अंदर से ऊर्जावान बनाकर तंत्रिका तंत्र को पोषण देती है।
मधुमक्खियों की आवाज से उत्पन्न ध्वनि तरंगें मानसिक तनाव, चिंता और दिनभर की थकान को दूर करने में जादुई असर दिखाती हैं। यह आवाज दिमाग की शांत नसों को राहत पहुंचाती है।
विवि मधुमक्खी पालन और एपिथेरेपी में पीजी डिप्लोमा शुरू कर रहा है। इसमें युवाओं को मधुमक्खी पालन, शहद व अन्य सामान तैयार करने और इलाज के तरीके सिखाए जाएंगे। मधुमक्खी का डंक लगवाकर इलाज कराना हर किसी के लिए सही नहीं होता। कुछ लोगों को मधुमक्खी के जहर से गंभीर एलर्जी हो सकती है। -प्रो. हरमिंदर सिंह बवेजा, कुलपति, नौणी विश्वविद्यालय