Fact: 1988 से अब तक 42 MP गंवा चुके हैं सांसदी, 14वीं लोकसभा में सबसे ज्यादा 19 सदस्य अयोग्य करार दिए गए
Parliament Disqualification: भारत में एक संसद सदस्य (एमपी) को कई कानूनों के तहत अयोग्य घोषित किया जा सकता है। सबसे आम कानून जो एक सांसद की अयोग्यता का कारण बन सकता है, वह भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची है, जिसे दलबदल विरोधी कानून के रूप में भी जाना जाता है।दूसरा कानून जिसके तहत एक सांसद को अयोग्य घोषित किया जा सकता है उनमें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 शामिल है।
विस्तार
मोदी सरनेम पर टिप्पणी मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सदस्यता जाने के बाद जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 पर खासी चर्चा शुरू हो गई है। इस कानून के आधार पर वर्ष 1988 से अब तक 42 सांसदों की सदस्यता जा चुकी है। इस कानून के तहत सबसे अधिक 19 सदस्यों की सदस्यता 14वीं लोकसभा के दौरान गई। इन सांसदों की सदस्यता पैसे लेकर सवाल पूछने और क्रॉस वोटिंग के कारण गई थी। सांसदों को अयोग्य घोषित करने का आदेश विभिन्न आधारों पर दिया गया है जैसे राजनीतिक निष्ठा बदलना, एक सांसद का आचरण अनुचित व्यवहार करना और दो साल या उससे अधिक की जेल की सजा वाले अपराधों के लिए अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद।
राहुल गांधी और अफजाल अंसारी ने हाल ही में गंवाई सांसदी
जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत हाल के दिनों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, राकांपा नेता मोहम्मद फैजल पीपी और बसपा नेता अफजाल अंसारी की सदस्यता गई है। इन नेताओं को विभिन्न अदालतों की ओर से दो साल से अधिक की जेल की सजा सुनाए जाने के बाद अपनी सांसदी गंवानी पड़ी है। यह अधिनियम किसी आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने और दो साल या उससे अधिक की सजा पाए जाने पर सांसदों और राज्य के विधायकों को स्वत: अयोग्य ठहराने से संबंधित है। हालांकि लोकसभा में लक्षद्वीप का प्रतिनिधित्व करने वाले फैजल की अयोग्यता को केरल उच्च न्यायालय की ओर से हत्या के प्रयास के मामले में दोषसिद्धि और सजा पर रोक प्राप्त करने के बाद रद्द कर दिया गया है।
गांधी ने 'मोदी उपनाम' से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले में सूरत की एक अदालत की ओर से दो साल जेल की सजा सुनाए जाने के बाद गुजरात उच्च न्यायालय का रुख किया है। पहली बार किसी लोगसभा सदस्य को साल 1985 में अयोग्य ठहराया गया था। उस समय दलबदल विरोधी कानून लागू होने बाद कांग्रेस के सांसद लालदुहोमा की लोकसभा सदस्यता चली गई थी। कांग्रेस सांसद ने उस समय मिजोरम विधानसभा चुनाव के लिए मिजो नेशनल यूनियन के उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन पत्र दाखिल किया था। इसके बाद उनकी लोकसभा की सदस्यता चली गई थी।
नौंवी लोकसभा के दौरान नौ सांसदों को दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य ठहराया गया
नौवीं लोकसभा के दौरान तत्कालीन जनता दल के नेता वीपी सिंह ने गठबंधन सरकार बनाई थी उस दौरान नौ लोकसभा सदस्य दल-बदल विरोधी कानून के उल्लंघन में फंस गए थे, जिसके कारण उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था। जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत 14वीं लोकसभा के दौरान सबसे अधिक 19 सांसदों को अयोग्य ठहराया गया था। उस दौरान 10 सांसदों को पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी थी। वहीं नौ सांसदों की सदस्यता यूपीए-1 सरकार के लिए जुलाई 2008 में हुए विश्वासमत के दौरान क्रॉस वोटिंग करने के कारण चली गई थी। उसके बाद वाम दलों ने अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील के खिलाफ सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।
वर्ष 2005 में भाजपा के छह, बीएसपी के दो और कांग्रेस व आरजेडी के एक-एक लोकसभा सांसदों को सवाल पूछने के लिए पैसा लेने के आरोप में अयोग्य ठहराया गया था। इस दौरान बहुजन समाज पार्टी के एक राज्यसभा सांसद की भी सदस्यता चली गई थी। लोकसभा के पूर्व संयुक्त सचिव देवेंद्र सिंह असवाल के अनुसार, 'इन सांसदों के निष्कासन को उच्चतम न्यायालय ने बरकरार रखा था। इनमें से किसी भी सांसद के निष्कासन को मंजूरी देने के लिए राष्ट्रपति के पास नहीं भेजा गया था क्योंकि विधायिका खुद ऐसा करने के लिए सक्षम है। 10वीं लोकसभा के दौरान जब प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव गठबंधन सरकार चला रहे थे उस दौरान दल बदल विरोधी कानून के तहत चार सांसदों को अयोग्य ठहराया गया था।
मुफ्ती मोहम्मद सईद, सत्यपाल मलिक और शरद यादव जैसे दिग्गज भी गंवा चुके हैं सांसदी
दल बदल विरोधी कानून के तहत राज्यसभा के भी कई सांसदों की सदस्यता गई है। इनमें मुफ्ती मोहम्मद सईद (1989), सत्यपाल मलिक (1989), शरद यादव (2017) और अली अनवर (2017) शामिल हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन और समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन को क्रमशः 2001 और 2006 में राज्यसभा से अयोग्य ठहरा दिया गया था। उनकी सदस्यता लाभ के दोहरे पद पर रहने के मामले में गई थी। सोरेन राज्यसभा के सदस्य रहते हुए झारखंड एरिया ऑटोनोमस काउंसिल (JAC) के सदस्य थे जबकि जया बच्चन राज्यसभा सदस्य के अलावे उत्तर प्रदेश फिल्म डेवलपमेंट काउंसिल के अध्यक्ष पद पर थीं।
पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अयोग्यता की याचिका आने के बाद दिया था इस्तीफा
राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष का पद धारण करने के लिए तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ भी अयोग्यता याचिका लाई गई थी पर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर मामले को खत्म कर दिया था। संभावित राजनीतिक उथल-पुथल से बचने के लिए(i) संसद (अयोग्यता निवारण) अधिनियम, 1959 को वर्ष 2006 में पूर्व की तिथि से संशोधित किया गया था। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य असवाल ने कहा कि चार अप्रैल 1959 की तिथि से इसी तरह की याचिकाएं निरर्थक हो गईं।
भारत में इन कानूनों के तहत संसद सदस्यों को अयोग्य ठहराया जा सकता है
भारत में एक संसद सदस्य (एमपी) को कई कानूनों के तहत अयोग्य घोषित किया जा सकता है। सबसे आम कानून जो एक सांसद की अयोग्यता का कारण बन सकता है, वह भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची है, जिसे दलबदल विरोधी कानून के रूप में भी जाना जाता है। यह कानून उन सांसदों की अयोग्यता के नियम निर्धारित करता है जो वोट पर अपनी पार्टी के व्हिप का उल्लंघन करते हैं। यह कानून सांसदों को स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ने, मतदान करने या पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान करने से बचने या किसी अन्य पार्टी में शामिल होने से रोकता है।
कोर्ट से दो साल या उससे अधिक की सजा सुनाए जाने के बाद स्वतः चली जाती है संसद सदस्यता
दूसरा कानून जिसके तहत एक सांसद को अयोग्य घोषित किया जा सकता है उनमें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 शामिल है। यह कानून संसद की सदस्यता के लिए योग्यता और अयोग्यता निर्धारित करता है। इन कानूनों के अलावा, एक सांसद को दिवालियापन, नैतिक अधमता, मानसिक अस्वस्थता, या सरकार के तहत लाभ का पद धारण करने वाले अपराध के लिए दोषी ठहराया जा सकता है। बता दें कि जनप्रतिनिधित्व कानून के मुताबिक किसी भी सांसद या विधायक को अगर किसी मामले में दो या दो साल से ज्यादा की सजा सुनाई जाती है तो उनकी सदस्यता रद्द हो जाएगी। साथ ही वह छह साल तक चुनाव लड़ने के लिए भी अयोग्य हो जाते हैं। यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 102 (1) (e) के प्रावधानों और जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा आठ के तहत लिया जाता है।